– डॉ. राजेंद्र सिंघ साहिल
धर्मों के संदर्भ में अक्सर यह देखने में आया है कि कुछ स्थान ऐसे होते हैं जो अपनी विशेष और महत्त्वपूर्ण स्थिति के कारण उस धर्म-विशेष के केंद्रीय स्थान के रूप में विकसित हो जाते हैं। ये स्थान उस धर्म के महापुरुषों, पैगंबरों, गुरु साहिबान, भक्त साहिबान आदि के साधन -स्थल होते हैं । ये स्थान वे होते हैं जहां उन्होंने अपनी ‘कौतुक – लीला’ प्रदर्शित करते हुए विचरण किया होता है । इसी तरह ही सिक्ख धर्म में अतुलनीय महिमा श्री अनंदपुर साहिब को प्राप्त है।
श्री अनंदपुर साहिब सिक्खों की धार्मिक राजनीतिक और सामरिक राजधानी रहा है। इसे पांच गुरु साहिबान– श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब, श्री गुरु हरिराय जी, श्री गुरु हरिक्रिशन जी, श्री गुरु तेग बहादर जी और श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी ने अपनी चरण रज से पवित्र किया है। यहां का ज़र्रा – ज़र्रा ज़ालिमों के खिलाफ़ जूझ कर शहादत पाने वाले शहीदों के आत्म बलिदान की अज़ीम यादगार है । पग-पग पर सिक्ख- इतिहास के अविस्मरणीय क्षणों को साकार करती श्री अनंदपुर साहिब की यह पावन भूमि मुझे सदैव आकर्षित करती रही है ।
श्री अनंदपुर साहिब का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान है — तख़्त श्री केसगढ़ साहिब। सन् १६९९ ई. में वैसाखी वाले दिन श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी ने यहीं पर खालसा पंथ की सृजना की थी । तख़्त श्री केसगढ़ साहिब में माथा टेकते समय ‘पांच प्यारों’ के चयन का वह दृश्य मेरे सामने आ जाता है जब दशमेश पिता हाथ में ‘श्री साहिब’ लिए एकत्र संगत में से ‘पांच शीश’ की मांग कर रहे हैं और पांच सिक्ख — भाई दया राम, भाई धरम दास, भाई हिम्मत चंद, भाई मोहकम चंद और भाई साहिब चंद एक-एक करके शीश भेंट करने के लिए सामने आ खड़े हुए हैं :
जउ तर प्रेम खेलण का चाउ ॥
सिरु धरि तली गली मेरी आउ ॥
इतु मारग पैरु धरीजै ॥
सिरु दीजै काणि न कीजै ॥ ( पन्ना १४१२ )
इसी तरह जब मैं गुरुद्वारा ‘थड़ा साहिब’ में प्रवेश करता हूं तो अब भी यही प्रतीत होता है कि जैसे पंडित किरपा राम अपने साथी ब्राह्मणों के साथ नवम् पातशाह श्री गुरु तेग बहादर जी से गुहार कर रहे हैं कि हे पातशाह ! हम आपकी हजूरी में आये हैं, ज़ालिम औरंगज़ेब से हिंदू धर्म की रक्षा करो … हम मज़लूमों को सिर्फ श्री गुरु नानक देव जी के घर से ही मदद की उम्मीद है।
हाथ जोर कहियो किरपा राम ।
दत्त बराहमण मटन ग्राम ॥
हमरो बल अब रहयो नहि काई ।
हे गुरू तेग बहादर राई ॥
सेवा हरी इम अरज़ गुज़ारी ।
तुम कलजुग के क्रिशन मुरारी ॥
( शहीद बिलास : भाई मनी सिंघ)
गुरु नवम् पातशाह ने शरणागत की लाज रखी और कश्मीरी पंडितों के मानवाधिकारों की रक्षा हेतु दिल्ली के चांदनी चौंक में पावन बलिदान दिया :
तिलक जंझू राखा प्रभ ता का।
को बडू कलू हि साका ॥ . धरम हेत साका जिनि कीआ ।
सीसु दीआ पर सिररु न दीआ ॥
(बचित्र नाटक )
इसी तरह मुझे लगता है कि किला अनंदगढ़ जैसे आज भी ‘रणजीत नगाड़े’ की ध्वनि से गूंज रहा है। यहां सहसा याद आ जाती है दिसंबर सन् १७०४ ई की वह भयानक सर्द रात जब श्री गुरु गोबिंद सिंघ, माता गुजरी जी, साहिबज़ादे और कुछ सिंघ किला अनंदगढ़ से बाहर निकलते हैं कि शत्रु सेना झूठे वादे एवं कस्में भुलाकर टूट पड़ती है। जूझते – जूझते जैसे-तैसे सरसा नदी पार होती है । गुरु-परिवार पर कहर बरताने वाली यह रात चमकौर की जंग में बड़े साहिबज़ादों की शहादत, छोटे साहिबजादों की नीवों में चिनवाकर और माता गुज़री का बलिदान लेकर शांत होती है ।
यही नहीं… मैं श्री अनंदपुर साहिब के किसी भी गुरुधाम में चला जाऊं.. ‘गुरु के लाहौर’, ‘गुरु के महल’, ‘अकाल बुंगा’, ‘भोरा साहिब’, ‘मंजी साहिब’, ‘दमदमा साहिब’, ‘शीश गंज’, ‘दुमालगढ़’ सभी जगह मुझे गुरु-परिवार के अस्तित्व का अनुभव होता है। सिक्ख – इतिहास के अनगिनत क्षण मेरी आंखों के आगे साकार होने लगते हैं। तख़्त श्री केसगढ़ साहिब में सुरक्षित दशमेश पिता एवं सिंघों के शस्त्र जब रात्रि में प्रदर्शित किए जाते हैं तो मुझे लगता है कि जैसे मैं खुद मैदान-ए-जंग में पहुंच गया हूं। तन में स्फूर्ति आ जाती है कि कभी गुरु जी ने इन शस्त्रों का संचालन किया होगा… जैसे इनमें उनका स्पर्श आज भी समाया हुआ है।
गुरु साहिबान मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के साथ-साथ उसके आर्थिक-सामाजिक विकास को भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानते थे । इस लिए गुरु साहिबान ने नए-नए नगर बसाने में विशेष रुचि ली। जिस प्रकार श्री गुरु नानक देव जी ने श्री करतारपुर साहिब, श्री गुरु अमरदास जी ने गोइंदवाल साहिब, श्री गुरु रामदास जी ने श्री अमृतसर साहिब, श्री गुरु अरजन देव जी ने तरनतारन साहिब और श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब ने कीरतपुर साहिब आदि नगरों को बसाया उसी प्रकार श्री गुरु तेग बहादर साहिब जी ने १६६५ ई में कीरतपुर साहिब के पास ‘चक्क नानकी’ बसाया। बाद में श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी ने १६८९ ई में एक नए नगर की नींव रखी। भाई चउपत ने ‘श्री अनंद साहिब’ का पाठ किया। गुरु जी ने नये नगर का नाम रखा — ‘अनंदपुर’ कालांतर में ‘अनंदपुर’ और ‘चक्क नानकी’ दोनों को मिलाकर ‘श्री अनंदपुर साहिब’ कहा जाने लगा ।
श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी ने यहां पांच किले भी बनवाए — अनंदगढ़, होलगढ़, तारागढ़, अगमगढ़ और फ़तहिगढ़। धीरे-धीरे श्री अनंदपुर साहिब सिक्खों की राजनीतिक एवं सामरिक राजधानी बन गया। फिर यहां और इसके आस-पास अनेक जंगें लड़ीं गईं जिनसे हर बार सिक्खों की फ़तह हुई ।
श्री अनंदपुर साहिब की उन्नति और खालसे की बढ़ती जा रही शक्ति ने मुगलों और पहाड़ी राजाओं की नींद उड़ा दी। फिर ‘खालसे’ को परास्त करने के लिए एक बड़ा गठबंधन बना जिसने मार्च १७०४ ई में श्री अनंदपुर साहिब को आ घेरा । सिक्ख संघर्ष करते रहे। धीरे-धीरे घेरा आठ महीने तक खिंच गया। अंततः सिक्खों के आग्रह पर गुरु जी को सपरिवार श्री अनंदपुर साहिब छोड़ दिया। इसके बाद की घटनाएं तो जैसे मेरे दिल को झिंझोड़ कर रख देती हैं– ‘परिवार – विछोड़ा’, ‘चमकौर की जंग’, ‘छोटे साहिबज़ादों का सरहिंद में नीवों में चिनवाया जाना’, ‘माता गुजरी का बलिदान’, ‘खिदराणे की ढाब – मुक्तसर की जंग’. गुरु जी दमदमा साहिब – तलवंडी साबो होते हुए दक्षिण चले गये ।
१९४७ के बाद स्वतंत्र भारत में श्री अनंदपुर साहिब का विकास अत्यंत तेज गति से हुआ है। पांच पवित्र तख़्तों में से एक-तख़्त श्री केसगढ़ साहिब, अनेक ऐतिहासिक गुरुद्वारे और दशमेश पिता द्वारा स्थापित पांच किले अब यहां सुशोभित है । गुरु जी के शस्त्र, वस्त्र समेत अनेक ऐतिहासिक महत्त्व की वस्तुएं यहां सुरक्षित रूप से संरक्षित की गई हैं।
चौड़ी स्वच्छ सड़कें .. शिवालिक की हरी-भरी पहाड़ियों की गोद में सुशोभित सुंदर-धवल गुरुद्वारा.. दूर से ही मन को मोहना शुरू कर देते हैं ।गुरुद्वारा साहिबान में अटूट वितरित होता लंगर और ‘माता गुजरी निवास’ जैसे ठहरने के विशाल सर्व-सुविधा सम्पन्न स्थान मुझे सदैव याद रहेंगे।
आज श्री अनंदपुर साहिब विश्व के नक्शे पर एक विशेष स्थान रखता है । १९९९ ई में खालसा पंथ के तीन सौ साला सृजना दिवस यहां बड़े पैमाने पर आयोजित किया गया था। ‘निशान-ए-खालसा’ और ‘सिक्ख हेरीटेज सेंटर’ श्री अनंदपुर साहिब को एक महान ऐतिहासिक केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं। शहीदों के रक्त से रंजित यह सरजमीं गुरु की नगरी . आज सिक्ख धर्म की गतिविधियों का महत्त्वपूर्ण केंद्र है। ‘होला महल्ला’ और ‘वैसाखी’ के अवसर पर यहां बड़ी संख्या में संगत एकत्र होती है। यहां की पवित्र वायु में मुझे आज भी श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी के ये वचन गूंजते सुनाई देते हैं : देह सिवा बर मोहि इहै सुभ करमन ते कबहूं न टरों ॥ ना डरों अरि सो जब जाइ लरों निसचै कर अपनी जीत करों ॥ अरु सिख हों आपने ही मन कौ इह लालच हउ गुन उ उचरों ॥ जब आव की अउध निदान बनै अत ही रन मैं तब जूझ मरों ॥
