वैसाखि धीरनि किउ वाढीआ
वैसाखि धीरनि किउ वाढीआ जिना प्रेम बिछोहु॥ हरि साजनु पुरखु विसारि कै लगी माइआ धोहु॥ पुत्र कलत्र न संगि धना हरि अविनासी ओहु॥ पलचि पलचि सगली मुई झूठे धंधै मोहु॥ इकसु हरि के नाम बिनु अगै लई अहि खोहि॥ दयु विसारि विगुचणा प्रभ बिनु अवरु न कोइ॥ प्रीतम चरणी जो लगे तिन की निरमल सोइ॥ […]
