इतिहास में जब कभी भारत की महान महिलाओं का उल्लेख किया जाएगा तो शेरे पंजाब महाराजा रणजीत सिंघ की महारानी जिंद कौर की संपूर्ण भूमिका का वर्णन भी गौरवमय शब्दों में किया जाएगा। उन्हें पंजाबी प्यार से ‘महरानी जिंदां’ पुकारते देखे-सुने जा सकते हैं। अपने जीवन के अंतिम दशक में तो वे हमारे स्वाधीनता संग्राम का प्रतीक बन गई थीं। महारानी जिंदां के कार्य कलापों को देखकर अंग्रेज रेजिडेंट हेनरी लारेंस ने कहा था कि महारानी जिंदां संपूर्ण भारत में अंग्रेजों की सबसे बड़ी कारगर शत्रु है और इससे हमें पूरी तरह सावधान रहना चाहिए। यदि उस पर कठोर अंकुश न लगाए गए तो उसके आवाहन पर किसी भी समय हमारे खिलाफ जन-विद्रोह हो जाएगा।
पंजाब पर अपना अधिपत्य स्थापित करने के लिए राजमाता जिंदां के प्रति अंग्रेजी सरकार का व्यवहार बेहद निंदनीय रहा। उन पर तरह-तरह के झूठे आरोप लगाकर उन्हें अपमानित करने की कोशिश की गई। महारानी के चरित्र के बारे में अनेक बातें फैलाने की चेष्टा की गयी। हां, महारानी का इतना ही दोष था कि वे पंजाब की जनता में अत्यधिक लोकप्रिय थीं। उनके हृदय में जबरदस्त आकांक्षा मचल रही थी कि किसी भी तरह फिरंगियों को देश से बाहर निकाला जाए, पंजाब की अखंडता की रक्षा की जाए। अपने इस उद्देश्य को पाने के लिए अवश्य ही उन्होंने अनेक प्रयास किए, अपने लोगों को संगठित किया, अपने दूतों के द्वारा देश के अन्य शासकों के पास संदेश भिजवाए।
महाराजा रणजीत सिंघ के जीवन काल में महारानी जिंदां शासन-व्यवस्था में समय-समय पर अपना सहयोग देती रहती थीं। महाराजा के निधन के कुछ समय बाद जब बालक राजकुमार दलीप सिंघ पंजाब का महाराजा हुआ तो राजमाता जिंदां उनके संरक्षक के रूप में कार्य करती रहीं। चूंकि महाराजा दलीप सिंघ अभी अबोध बालक ही था इसलिए राज्य की वास्तविक बागडोर महारानी के हाथों में ही थी। अपने पति की तरह महारानी भी पूरी तरह धर्मनिष्ठ थीं। उन्होंने अनेक बार मंदिरों, मस्जिदों व गुरुद्वारों के लिए दान दिए थे। धार्मिक व सामाजिक सभाओं में वे प्रायः अपने विचार जनता के सामने प्रस्तुत करती थीं। गरीबों व असहाय लोगों की सहायता करना वे अपना पुनीत कर्त्तव्य मानती थीं। वे अपने देश के रीति-रिवाजों व परंपराओं से भली प्रकार परिचित थीं। उनके ऐसे ही गुणों के कारण पंजाब की जनता उन्हें बहुत आदर-मान देती थी। जनता उनके आदेश पर कुछ भी करने को तैयार रहती थी।
दिनों-दिन बढ़ रही उनकी लोकप्रियता अंग्रेजों को सहन नहीं हो पा रही थी। वे तो उनकी शक्ति को एकदम कुचल देना चाहते थे। वे तरह-तरह के बहानों से उसे परेशान करने की कोशिश कर रहे थे। अंग्रेज रेजिडेंट हेनरी लारेन्स ने महारानी को पत्र में लिखा-‘आप पंद्रह-बीस सरदारों से एक ही समय में मिलती हैं… महारानी की अपनी मर्यादा होती है। उसे कुछ नियमों के अंतर्गत ही व्यवहार करना होता है, लेकिन आप ऐसा नहीं कर रही हैं। आप खुले रूप से राजकीय शिष्टाचार तथा परंपराओं का अनादर कर रही हैं।
आप हर माह की प्रथम तिथि को ही दान-पुण्य किया करें, प्रतिदिन नहीं। अधिक अच्छा तो यही रहेगा कि आप राज्यों की रानियों की तरह पर्दे में ही रहा करें।’
लेकिन महारानी को इस प्रकार के उपदेशों की आवश्यकता नहीं थी। वे अच्छी तरह जानती थीं कि हजारों मील दूर से आए ये फिरंगी भारतीय महिलाओं की परंपराओं को क्या जानें? भारतीय महिला की मर्यादा क्या होती है? उसको शिक्षा देने का अधिकार इन लोगों को किसने दिया है? फिर ये हमारी व्यक्तिगत बातें हैं। वे कौन होते हैं हमारी बातों में दखल देने वाले। महारानी ने अपने पत्र में हेनरी लारेंस को लिखा- ‘आपके हित में यही उचित है कि आप अपने कार्य-कलापों को ही देखें, बेजा दूसरों के मामलों में दखल देने का आपको अधिकार नहीं है। जब तक महाराजा दलीप सिंघ इस राज्य का शासक है तब तक मैं उसकी सरपरस्त हूं, मैं उसकी माता हूं और मैं वैसे ही स्वतंत्र रूप में कार्य करूंगी जैसे कोई राजा करता है। मैं यह समझने में असमर्थ हूं कि आपको मेरे निजी मामलों में दखल देने का अधिकार किसने दिया हैं?’
राजमाता के इस उत्तर से हेनरी लारेंस खीझ उठा। उसकी शिकायत पर कुछ समय बाद अंग्रेजी सरकार ने षड़यंत्र रचकर महारानी को लाहौर से कोई तीस मील दूर स्थित शेखूपुरा नगर के किले में नज़रबंद कर दिया। कुछ महीनों बाद राजमाता जिंदां को फिरोजपुर में नजरबंद रखने के बाद बनारस के समीप चुनार के किले में कैद कर दिया गया। गंगा नदी के तट पर निर्मित इस प्राचीन किले में उसे अनेक प्रकार से परेशान किया गया। रानी की यह दशा देखकर किले के कतिपय भारतीय रक्षकों के मन में उनके प्रति सहानुभूति उत्पन्न हो गई और आखिर एक दिन उन्हीं लोगों के सहयोग से महारानी किले से भाग निकलने में सफल हो गईं। वहां से निकल कर
कुछ समय के लिए वे गुप्त रूप में इलाहाबाद में रहीं। वहां के कुछ प्रभावशाली नागरिकों तथा सैनिक अधिकारियों के संपर्क व सहयोग से वे नेपाल की राजधानी काठमांडू पहुंचने में सफल हो गईं।
अंग्रेजी सरकार को लिखे अपने पत्र में महारानी ने लिखा- ‘मेरे रोते-बिलखते बच्चे दलीप सिंघ को जबरदस्ती मुझसे अलग कर दिया गया। मेरी मान-मर्यादा को आघात पहुंचाकर आप लोगों ने अपने वचन को तोड़ा। मेरे केश खींचकर मुझको अपमानित किया। यदि आप में तनिक भी ईमानदारी होती, नैतिक साहस होता तो आप खुली अदालत में मुझ पर मुकद्दमा चलाते, लेकिन आपने ऐसा नहीं किया। आप लोगों को डर था कि ऐसा करने से आपके पाप संसार के सामने आ जाएंगे, आपकी कलई खुल जाएगी।’
अंग्रेजी सरकार ने किसी तरह चालाकी से महारानी को पुनः बंदी बना लिया। महारानी के हीरे-जवाहरात और आभूषण आदि तथा नौ लाख रुपये मूल्य की अन्य संपत्ति जब्त कर ली। बाद में उसे अपने पुत्र महाराजा दलीप सिंघ के पास इंग्लैंड भेज दिया गया। अंग्रेजी सरकार को यह आशंका थी कि यदि महारानी व उनके पुत्र को पंजाब अथवा भारत के किसी अन्य भाग में रहने दिया गया तो भविष्य में किसी भी समय विद्रोह होने की संभावना हो सकती है। कुछ वर्षों बाद अपने प्यारे वतन से हजारों मील दूर इंग्लैंड में महारानी का निधन हो गया। मृत्यु से कुछ समय पूर्व उसने अपने पुत्र को कहा था कि ‘मेरे अवशेषों को इस देश में सड़ने के लिए न रहने देना, मेरे अवशेषों को भारत ले जाना।’ महारानी की अंतिम इच्छा पूर्ण हो गई। उनके अवशेष भारत लाकर पूरे सम्मान के साथ गोदावरी नदी के जल में प्रवाहित किए गए थे।
-डॉ. तिलकराज गोस्वामी
