वैसाखि धीरनि किउ वाढीआ जिना प्रेम बिछोहु॥
हरि साजनु पुरखु विसारि कै लगी माइआ धोहु॥
पुत्र कलत्र न संगि धना हरि अविनासी ओहु॥
पलचि पलचि सगली मुई झूठे धंधै मोहु॥
इकसु हरि के नाम बिनु अगै लई अहि खोहि॥
दयु विसारि विगुचणा प्रभ बिनु अवरु न कोइ॥
प्रीतम चरणी जो लगे तिन की निरमल सोइ॥
नानक की प्रभ बेनती प्रभ मिलहु परापति होइ॥
वैसाखु सुहावा तां लगै जा संतु भेटै हरि सोइ॥३॥
(पन्ना १३३)
पंचम पातशाह श्री गुरु अरजन देव जी बारह माहा मांझ की इस पावन पउड़ी में वैसाख मास के वातावरण एवं मौसम तथा इसमें की जाने वाली क्रियाओं की सांकेतिक पृष्ठभूमि में मनुष्य जीवन रूपी इस कालखंड को प्रभु नाम सिमरन द्वारा उपयोग में लाने तथा सफल करने का गुरमति मार्ग बख्शिश करते हैं।
गुरु जी फरमान करते हैं कि वैसाख मास में भले ही जनसाधारण की ख्वाहिशें उमंगें फलीभूत होती हों परंतु इस मास में भी उन जीव-स्त्रियों का हृदय धैर्य धारण नहीं कर सकता जो कि प्रभु-भक्ति अथवा प्रभु-प्रेम से दूर हैं। परमात्मा ही आत्मा का मित्र है और अज्ञानतावश उसी एकमात्र मित्र को भुला देने से धैर्य आ भी नहीं सकता, क्योंकि उसको सांसारिक माया ने अपनी तरफ खींच लिया है।
सतिगुरु जी कथन करते हैं कि न पुत्र, न स्त्री और न धन ही मनुष्य का साथ देता है। साथ देने वाला तो सदैव स्थिर प्रभु ही है, लेकिन दुखदायक स्थिति यह है कि कुछ एक चुनिंदा गुरमुखों को छोड़कर समस्त संसार मोह या सांसारिक लगाव के व्यवसाय में खचित होकर आत्मिक मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं। वे इस रहस्य को समझते नहीं कि मात्र प्रभु नाम ही आगामी जीवन में काम आता है, शेष सांसारिक कार्य यहीं रह जाते हैं अर्थात् वे आत्मिक जीवन का अंग नहीं बन पाते। प्रेम-स्वरूप प्रभु को भुलाकर सब कुछ बर्बाद होना निश्चित है, क्योंकि उसके बिना कुछ भी स्थिर रहने वाला नहीं है।
पंचम पातशाह चुनिंदा गुरमुखजनों की स्थिति दर्शाते हुए कथन करते हैं कि जो जन प्यारे प्रभु के चरणों के साथ जुड़ गए हैं अथवा उसकी प्रेमा-भक्ति में रत हो गए हैं उनकी शोभा निर्मल है। विनती है कि हे प्रभु! हमें अपने साथ मिला लो, क्योंकि वैसाख रूपी जीवन-खंड सुहावना तभी है जब पूर्ण संत अथवा सतिगुरु के साथ भेंट हो जाए और वह प्रभु के साथ मिलाप का सबब बना दे।
