रेडक्रास सोसायटी की आधारशिला: भाई घनईया जी

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May 02, 2026

सन १६४८ में चिनाब नदी की सहायक चंद्रभागा नदी के तट पर बसे कसबा सोधरा (सोहदरा, सौद्धारा), ज़िला वज़ीराबाद (अब पाकिस्तान में ज़िला गुज्जरांवाला) में एक सम्पन्न खत्री (क्षत्रिय) परिवार में श्री नत्थूराम जी के घर माता सुंदरी की कोख से जन्मे इस बालक का नाम घनईया रखा। भाई घनईया जी बचपन से ही सीधी-सादी और धार्मिक प्रवृत्ति के थे, संसार की मोहमाया से दूर। वे साधु-संतों की संगत में रहकर सतसंग सुनते, सेवा करते और प्राणीमात्र की भलाई को ही अपना परम कर्त्तव्य मानते। जब उन्हें सिक्खों के ९वें गुरु श्री गुरु तेग बहादर साहिब के विषय में जानकारी मिली तो वे सोधरा से श्री अनंदपुर साहिब उनके दर्शन करने आये। चरण-स्पर्श करते ही उन्हें लगा कि जिस के लिए वे जन्म-जन्मांतर से भटक रहे हैं, वो वस्तु उन्हें यहीं से मिल सकती है। थोड़े ही समय में श्री गुरु तेग बहादर साहिब उनकी लगन, सेवा और भक्ति-भाव से बड़े प्रसन्न हुए।

गुरु जी का आशीर्वाद प्राप्त कर वे अनेक स्थानों की यात्रा करते हुए जब लाहौर से पेशावर की ओर जा रहे थे तब वर्तमान पाकिस्तान के जिला अटक के एक गांव काब्हा में रात गुजारने रुके। उन्हें वहां पता चला कि गांववासी पानी की किल्लत से बड़े परेशान हैं। महिलाएं मीलों दूर पैदल जाकर, सिर पर बर्तन रखकर पानी भरकर लाती हैं। भाई जी ने उन लोगों को इस संकट से उबारने के लिए तथा सेवा-भाव अपनाने के लिए विचार किया। लोगों में जागृति लाने के लिए वे स्वयं मशक में पानी भरकर लाते और जरूरतमंदों में बांटते, परंतु यह उस समस्या का स्थाई और आसान हल न था। आने-जाने वाले राहगीरों तथा गांव के निवासियों की सहूलियत के लिए उन्होंने एक उचित स्थान पर कुआं खोदना आरंभ किया। पूरे गांववासी सहायता के लिए जुट गये। मेहनत रंग लाई। चंद दिनों में ही पानी का कुआं तैयार हो गया और पास ही यात्रियों के ठहरने योग्य धर्मशाला भी बनवा दी गई। दोनों यादगारें आज भी वहां मौजूद हैं। वहां से गुजरने वाले यात्री दो घूंट पानी प्रसाद के रूप में ग्रहण करना अपना सौभाग्य समझते हैं।

इधर भाई जी सेवा के साथ-साथ धर्म प्रचार में भी लगे रहे। नवम गुरु जी की शहादत की खबर से विह्वल होकर वे तुरंत श्री अनंदपुर साहिब पहुंचे। उस समय श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी मात्र ९ वर्ष के थे। उन्हें दसवें गुरु के रूप में गुरगद्दी पर विराजमान किया गया। भाई घनईया जी गुरु जी की खालसा सेना में शामिल होकर युद्ध-क्षेत्र में घायल सिपाहियों को पानी पिलाया करते थे।

एक बार युद्ध में भाई घनईया जी घायल सिक्ख सिपाहियों को पानी पिलाने के साथ-साथ
घायल मुगल सिपाहियों को भी पानी पिलाने लगे। उन्हें उनमें अपने-पराए का कोई भेद न लगा। सिक्खों ने इस बात की गुरु जी से शिकायत की। गुरु जी के चेहरे पर चिर-परिचित मुस्कान उभर आई। गुरु जी ने शंका का निवारण करने के लिए भाई जी को बुलाकर पूछा। भाई जी ने निवेदन किया, “सिक्ख सच कह रहे हैं, परंतु सच्चे पातशाह, जब मैं मैदाने-जंग में दर्द से कराह रहे घायल सिपाहियों को देखता हूं तो मुझे अपने-पराये, शत्रु-मित्र का कोई एहसास नहीं रहता। मुझे तो सब में आपका नूरानी चेहरा ही दिखाई देता है।”

गुरु जी ने भाई जी की पीठ थपथपाई और उन्हें मरहम-पट्टी देते हुए गले लगाकर बोले, “भाई जी, आप महान हैं। हमारी लड़ाई
किसी व्यक्ति विशेष में नहीं बल्कि जुल्म के खिलाफ है। हम धर्म और सच्चाई के लिए युद्ध कर रहे हैं। भाई जी, आप पानी पिलाने के साथ-साथ बिना भेद-भाव के घायलों की मरहम-पट्टी भी किया करो।”

भाई घनईया जी ने सेवा-भाव के वास्तविक नियम को मूर्तिमान करते हुए सिक्ख इतिहास में विलक्षण स्थान ग्रहण किया। सन १८६४ ई में जिनेवा सम्मेलन में ‘अतर्राष्ट्रीय रेडक्रास सोसायटी’ की स्थापना हुई। विश्व स्तर पर भाई घनईया जी को रेडक्रॉस सोसायटी का संस्थापक माना जाता है। भाई घनईया जी के सेवा-भाव से प्रेरित श्री हेनरी ड्यूनेट ने रेडक्रास सोसायटी की स्थापना की।

– रणवीर सिंह