डिठे सभे थाव नही तुधु जेहिआ
डिठे सभे थाव नही तुधु जेहिआ॥ बधोहु पुरखि बिधातै तां तू सोहिआ ॥ वसदी सघन अपार अनूप रामदास पुर ॥ हरिहां नानक कसमल जाहि नाइऐ रामदास सर ॥ (अंग १३६२) पंचम सतिगुरु श्री गुरू अरजन देव जी श्री गुरू ग्रंथ साहिब में ‘फुनहे महला ५’ के शीर्षक तले अंकित इस पावन शब्द में आत्मिक स्नान […]
