– डॉ. सत्येंद्रपाल सिंघ
भक्त रविदास जी सामाजिक-आध्यात्मिक यथार्थ के बड़े सशक्त पैरोकार और प्रवक्ता थे, जिन्होंने तमाम दबावों और विरोधाभासों के बावजूद भी सच कहने का साहस दिखाया । कदाचित इसी कारण उनकी बाणी को श्री गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान मिला । सच के जिस धरातल को तलाश कर गुरु साहिबान ने समाज की सदियों से स्थापित मान्यताओं और भ्रमों को धराशायी किया उसी धरातल पर भक्त रविदास जी भी खड़े दिखते हैं। गुरु साहिबान ने लोगों से सीधा संवाद स्थापित किया और भक्त रविदास जी एवं अन्य भक्तों ने भी, जिनकी बाणी श्री गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित की गयी है। भक्त रविदास जी ने मनुष्य की सारी व्यथाओं के मूल में उसके अहम की पहचान की और कहा कि यही बात मनुष्य की समझ में नहीं आती। उसके दुखों का कारण उसका दंभ ही है:
तुझहि सुझता कछू नाहि ॥
पहिरावा देखे ऊभि जाहि ॥
गरबवती का नाही ठाउ ॥
तेरी गरदनि ऊपरि लवै काउ ॥१॥
तू कां गरबहि बावली ॥
जैसे भादउ खुंबराजु तू तिस ते खरी उतावली ॥
(पन्ना १९९६)
भक्त रविदास जी ने कहा कि मनुष्य के सिर पर काल मंडरा रहा है मगर उसे ख़बर नहीं है। वह बाहर के दिखावों में ही व्यस्त है। कुछ पा लेने पर वह शीघ्र ही गुमान करने लगता है किंतु उसे पता नहीं है कि उसका अहंकार भादों के महीने में उगने वाली खुंबों की तरह अल्प समय में ही नष्ट हो जायेगा। ऐसे मनुष्य को भक्त रविदास जी ने महा अज्ञानी कहा है जो निरर्थक कार्यों में ही व्यस्त है।
माटी को पुतरा कैसे नचतु है ॥
देखे देखै सुनै बोलै दउरिओ फिरतु है ॥१॥ रहाउ ॥
जब कछु पावै तब गरबु करतु है ॥
माइआ गई तब रोवनु लगतु है ॥
(पन्ना ४८७)
ऐसे अज्ञानी मनुष्य की अवस्था का वर्णन करते हुए भक्त जी ने कहा कि वह तो नष्ट होने वाले पुतले की तरह है और जीवन की भागदौड़ में फंसा हुआ है। जब उसके अनुकूल हो जाता है तो अहंकार करने लगता है, जब अनुकूल नहीं होता तो विलाप करता है। इस तरह वो अपने जीवन को गंवा देता है। मनुष्य की स्थिति तो पशु-पक्षियों से भी गई गुज़री है :
म्रिग मीन चिंग पतंग कुंचर एक दोख बिनास ॥
पंच दोख असाध जा महि ता की केतक आस ॥१॥
माधो अबिदिआ हित कीन ॥
बिबेक दीप मलीन ॥१॥ रहाउ ॥
त्रिगद जोनि अचेत संभव पुंन पाप असोच ॥
मानुखा अवतार दुलभ तिही संगति पोच ॥
(पन्ना ४८६)
भक्त रविदास जी उपरोक्त वचन में मनुष्य की स्थिति का बड़ा ही सूक्ष्म और सटीक विश्लेषण करते हैं। वे कहते हैं कि हिरन, मछली, भंवरा, पतंगा और हाथी इन सभी के पतन का कारण इनका एक-एक दोष बनता है। हिरन को नाद का रस है जिसके पीछे भागते-भागते उसकी मृत्यु तक हो जाती है। मछली का पानी से मोह उसके जीवन का हरण कर लेता है । भंवरा फूल की सुगंध के कारण उसमें बंद होकर मारा जाता है और पतंगा दीपक – लौ में जल मरता है। काम का रस हाथी की जान ले लेता है । मनुष्य तो पांच विकारों से घिरा हुआ है, उसका क्या हाल होगा ? अज्ञानता के कारण उसकी बुद्धि मलिन हो गयी है। अन्य जीव तो विवेक, चेतना के अभाव में सुमार्ग पर नहीं चल पाते किंतु बुद्धि वाला मनुष्य कुसंग के कारण अपने दुर्लभ मानव जीवन को निष्काम कर देता है। वह कुएं में घिरे हुए मेंढक की तरह हो जाता है जिसे सत्-असत् में कोई भेद नहीं जान पड़ता :
कूपु भरिओ जैसे दादिरा कछु देसु बिदेसु न बूझ ॥
ऐसे मेरा मनु बिखिआ बिमोहिआ कछु आरा पारु न सूझ ॥१॥
सगल भवन के नाइका इकु छिनु दरसु दिखाइ जी ॥१॥ रहाउ ॥
मलिन भई मति माधवा तेरी गति लखी न जाइ ॥
करहु क्रिपा भ्रमु चूकई मै सुमति देहु समझाइ ॥२॥
जोगीसर पावहि नही तुअ गुण कथनु अपार ॥
प्रेम भगति के कारण कहु रविदास चमार ॥
(पन्ना ३४६)
भक्त रविदास जी ने कहा कि मनुष्य का मन विषय विकारों में ऐसा रम जाता है कि उसे कुछ भी उचित-अनुचित नहीं सूझता । उसकी मलिन बुद्धि उसे परमात्मा से दूर कर देती है । परमात्मा की कृपा ही उसे विकारों से ऊपर उठा सकती है और ज्ञान की राह दिखा सकती है। परमात्मा को पाने के लिए किसी बड़े जप-तप की आवश्यकता नहीं है। उसकी कृपा तो बस प्रेम-भाव से ही प्राप्त हो जाती है।
अनिक जतन निग्रह कीए टारी न टरै भ्रम फास ॥
प्रेम भगति नही ऊपजै ता ते रविदास उदास ॥
( पन्ना ३४६)
जिसने परमात्मा से प्रेम नहीं किया उसे जीवन में निराश ही होना पड़ता है। परमात्मा का संग करने में ही उद्धार है :
तुम चंदन हम इरंड बापुरे संगि तुमारे बासा ॥
रूख ते ऊच भए है गंध सुगंध निवासा ॥१॥
माधउ सतसंगति सरनि तुम्हारी ॥
हम अउगन तुम्ह उपकारी ॥१॥ रहाउ ॥
तुम मखतूल सुपेद सपीअल हम बपुरे जस कीरा ॥
सतसंगति मिल रहीऐ माधउ जैसे मधुप मखीरा ॥
( पन्ना ४८६)
परमात्मा से प्रेम किस तरह की भावना धारण करके किया जाए इसका संकेत उपरोक्त वचन में भक्त रविदास जी ने दिया है। वे कहते हैं कि परमात्मा का संग चाहिए तो अपने अवगुणों को स्वीकार करके विनम्र-भाव से उसकी शरण में जाना चाहिए। वह उबार लेता है; हमारे अवगुणों को क्षमा कर देता है । उसकी शरण में ही हित है। उससे प्रेम करके ही जीवन सफल है ।
प्रेम की जेवरी बाधिओ तेरो जन ॥
कहि रविदास छूटिबो कवन गुन ॥
( पन्ना ४८७)
परमात्मा के प्रेम के बंधन में बंधे रहने में ही हित है। इस बंधन से छूटने में कोई लाभ नहीं है । बंधन में वही बंधता है जो स्वयं को दीन जान लेता है और शक्तिशाली का दासत्व स्वीकार कर लेता है । दीनता का भाव ही मनुष्य को उच्चता की ओर ले जाता है। दीन होकर मनुष्य को याचना करनी चाहिए कि परमात्मा उसे सत् के मार्ग पर चलने की पूर्ण सामर्थ्य प्रदान करे :
हम सरि दीनु दइआलु न तुम सरि अब पतीआरु किआ कीजै ॥
बचनी तोर मोर मनु मान जन कउ पूरनु दीजै ॥
( पन्ना ६९४)
भक्त रविदास जी ने परमात्मा के प्रेम की विधि बताते हुए कहा कि चेतना में परमात्मा का स्मरण हो, आंखों में सदैव उसका स्वरूप हो, कानों से बस, उसकी महिमा सुनें और मन भंवरा बनकर उसके चरण-कमलों के पास मंडराता रहे, जिह्वा पर सदैव उसके गुणों का ज्ञान रहे :
चित सिमरन कर नैन अविलोकनो स्रवन बानी सुजसु पूरि राखउ ॥
मनु सु मधुकरु करउ चरन हिरदे धरउ रसन अम्रित राम नाम भाख ॥१॥
मेरी प्रीति गोबिंद सिउ जिनि घटै ॥
उ मोलि महगी लई जीअ सटै ॥
( पन्ना ६९३)
जिस प्रेम की बात भक्त रविदास जी ने की उसे बहुत ही अमूल्य बताया और कहा कि इतनी महंगी पायी हुई इस प्रीति को कैसे गंवा दें? गुरु साहिबान ने जिस तरह प्रचलित धार्मिक आडंबरों और कर्मकांडों पर गहरी चोट करते हुए परमात्मा से मिलने की सरल राह दिखाई, जिस पर हर कोई चल सकता था, भक्त जी ने भी ठीक वैसी ही बात की ।
प्राचीन काल में आरती परमात्मा की उपासना का एक विशेष अंग थी जिसे बड़ी ही विधि से किया जाता था और हर कोई इसे कर भी नहीं सकता था। आरती में विशेष सामग्री का प्रयोग होता था जिसे पवित्र माना जाता था । आरती का प्रचलन आज भी है। भक्त रविदास जी ने इस विधि और इसे करने के विशेषाधिकार को भी तोड़ने की बात की, जैसा कि गुरु नानक साहिब ने किया था। उन्होंने आरती का आधार परमात्मा के नाम को बनाया ।
नामु तेरो आरती मजनु मुरारे ॥
हरि के नाम बिनु झूठे सगल पासारे ॥१॥ रहाउ ॥
नामु तेरो आसनो नामु तेरो उरसा नामु तेरा केसरो ले छिटकारे ॥
नामु तेरा अंभुला ना तेरो चंदनो घसि जपे नामु ले तुझहि कउ चारे ॥१॥
नामु तेरा दीवा नामु तेरो बाती नामु तेरो तेलु ले माहि पसारे ॥
नाम तेरे की जोति लगाई भइओ उजिआरो भवन सगलारे ॥
नामु तेरो तागा नामु फूल माला भार अठारह सगल जुठारे ॥
( पन्ना ६९४)
परमात्मा का स्मरण ही उसकी आरती है। उसके नाम का ही आसन बनाकर स्थान धारण करें। नाम का ही केसर बनाकर छींटें दें। नाम के जल में ही नाम के चंदन को घिसें और नाम का दीया – बाती कर नाम का ही तेल डालें। नाम को ही फूल-माला बनायें। भक्त रविदास जी ने प्रचलित आरती को निपट ढोंग बताया और कहा कि परमात्मा के स्मरण से ही आरती सम्पन्न हो जाती है अर्थात् मन में परमात्मा को धारण करना ही सच्ची विधि है परमात्मा की उपासना की ।
समाज के हर वर्ग को समान रूप से परमात्मा के साथ जोड़कर भेदभाव मिटाना और निम्न माने जाने वालों को बराबर का सम्मान दिलाना, वह भी नितांत सरल और सहज रूप से, एक महान लक्ष्य था, जिसे भक्त रविदास जी ने प्राप्त किया। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में सम्मिलित भक्त रविदास जी की बाणी आज के संदर्भ में भी पूर्णत: प्रासंगिक है।
