गुरबाणी विचार : चेति गोविंदु अराधीऐ

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March 17, 2025

चेति गोविंदु अराधीऐ होवै अनंदु घणा ॥
संत जना मिलि पाईऐ रसना नामु भणा ॥
जिनि पाइआ प्रभु आपणा आए तिसहि गणा ॥
इकु खितिसु बिनु जीवणा बिरथा जनमु जणा ॥
जलि थलि महीअलि पूरिआ रविआ विचि वणा ॥
प्रभु चिति न आवई कितड़ा दुखु गणा ॥
सो प्रभु जिनी राविआ सो प्रभू तिंना भागु मणा ॥
हरि दरसन कंउ मनु लोचदा नानक पिआस मना ॥ मिलाए सो प्रभू तिस कै पाइ लगा ॥२॥ (पन्ना १३३)

पंच सतिगुरु श्री गुरु अरजन देव जी महाराज बारह माहा मांझ की इस पावन पउड़ी में चैत्र मास की ऋतु और इससे संबंधित क्रियाओं के बारे में सांकेतिक वर्णन करते हुए मनुष्य – मात्र को मनुष्य जीवन रूपी वर्ष के इस काल-खंड को प्रभु – नाम – सिमरन द्वारा सफल करने का निर्मल उपदेश देते हुए गुरमति मार्ग बख्शिश करते हैं।

सतिगुरु जी कथन करते हैं कि चैत्र मास में मालिक परमात्मा को स्मरण किया जाए तो बहुत ही गहरी प्रसन्नता मिलती है। यदि इस समय अच्छे मनुष्यों की संगत करते हुए जिह्वा से प्रभु-नाम जपा जाए तो मालिक स्वामी प्राप्त हो जाते हैं । जिसने ऐसा सुकर्म कर प्रभु को पा लिया है उसी मनुष्य का इस संसार में आना सफल गिना जाए, चूंकि मनुष्य-जीवन का मूल प्रयोजन यही है :
भई परापति मानुख देहुरीआ ॥
गोबिंद मिलण की इह तेरी बरीआ ॥
अवरि काज तेरै कितै न काम ॥
मिलु साधसंगति भजु केवल नाम ॥
(पन्ना १२)

गुरु पातशाह प्रत्येक क्षण प्रभु नाम को समर्पित करने का दिशा-निर्देश बख्शिश करते हुए बाणी में फरमान करते हैं कि परमात्मा की पावन स्मृति के बगैर यदि एक पल भी जीया जाए तो सारा जीवन ही व्यर्थ हो जाता है । जो परमात्मा जल में, आकाश में, धरती पर व्याप्त हो रहा है, यदि ऐसा मालिक मनुष्य को याद ही न आए तो उसका कितना दुर्भाग्य होगा ! दूसरी

ओर जिन्होंने परमात्मा को याद किया है वे बहुत ही भाग्यशाली अथवा महान हैं। हे नानक ! ऐसे सुजनों को देखकर मन परमात्मा के दीदार की कामना करता है, मन में उसके दीदार की प्यास बनी रहती है। चेत्र मास में जो मुझे परमात्मा से मिला दे मैं उसके चरण छू लूँ! बारह माहा मांझ की पहली पावन पउड़ी, जिससे यह पावन बाणी प्रारंभ होती है, इस प्रकार है:
किरति करम के वीछुड़े करि किरपा मेलहु राम ॥
चारि कुंट दह दिस भ्रमे थकि आए प्रभ की साम ॥
धेनु दुधै ते बाहरी कितै न आवै काम ॥
बिनु साख कुलावती उपजहि नाही दाम ॥
हरि नाह न मिलीऐ साजनै कत पाई ऐ बिसराम ॥
जितु घरि हरि कंतु न प्रगटई भठि नगर से ग्राम ॥
ब सीगार तंबोल रस सणु देही सभ खाम ॥
प्रभ सुआमी कंत विहूणीआ मीत सजण सभि जाम ॥
नानक की नंती कर किरपा दीजै नामु ॥
हरि मेलहु सुआमी संगि प्रभ जिस का निहचल धाम ॥१॥
(पन्ना १३३)

अर्थात् हे परमात्मा! हम अपने कर्मों की कमाई के अनुसार अर्थात् सुकर्मों को निभाने में कुछ कमी रह जाने के कारण आपसे बिछड़े हुए हैं। सनम्र विनती है कि आप अपनी कृपा कर हमें अपने साथ मिला लो । चारों दिशाओं में भटकने के उपरांत हम अंत में आपकी शरण में आए हैं। दूध देने से रहित गाय किसी काम नहीं आती। जल न मिले तो वृक्ष अथवा पौधा सूख जाता है। यदि असल मित्र – प्रभु का नाम ही न मिल पाया तो आराम कहां? जिस हृदय रूपी घर में प्रभु-पति प्रकट नहीं होते वह हृदय रूपी घर भट्ठी जैसा दुखदायक प्रतीत होता है । प्रभु मालिक के बिना मनुष्य रूपी स्त्री का सारा शृंगार व्यर्थ है अर्थात् बाहरी दिखावे के सभी प्रयास निष्फल हैं । मालिक के बिना बाहरी रूप से मित्र दिखने वाले सभी जन शत्रु हैं। ऐसी स्थिति में हृदय से एक ही विनती निकलती है कि हे नानक ! कृपा कर अपना नाम प्रदान कर दो! हे मालिक ! मुझे अपने साथ मिला लेना, क्योंकि एक आप ही का नाम सदैव स्थिर है !