गुरबाणी शब्द विचार

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February 13, 2026

कलिजुग का धरमु कहहु तुम भाई
किव छूटह हम छुटकाकी ॥ हरि हरि जपु बेड़ी हरि तुलहा हरि जपिओ तरै तराकी ॥१॥
हरि जी लाज रखहु हरि जन की ॥
हरि हरि जपनु जपावहु अपना
हम मागी भगति इकाकी ॥रहाउ॥
हरि के सेवक से हरि पिआरे जिन जपिओ हरि बचनाकी ॥
लेखा चित्र गुपति जो लिखिआ सभ छूटी जम की बाकी ॥२॥
हरि के संत जपिओ मनि हरि हरि
लगि संगति साघ जना की॥
दिनीअरु सूरु त्रिसना अगनि बुझानी
सिव चरिओ चंदु चंदाकी ॥३॥
तुम वड पुरख वड अगम अगोचर तुम आपे आपि अपाकी ॥
जन नानक कउ प्रभ किरपा कीजै
करि दासनि दास दसाकी ॥४॥(अंग ६६८)

चौथे पातशाह श्री गुरु रामदास जी धनासरी राग में उच्चारण किए गए उपरोक्त शबद की प्रथम पंक्ति में अश्न रूप में फरमान कर रहे हैं कि हे भाई! मुझे ऐसा धर्म बताओ जिससे जगत के विकारों के झमेलों से बचा जा सके। मैं इन विकारों के झमेलों से बचना चाहता हूं। अगली पंक्तियों में उत्तर रूप में फरमान है कि इन सब झमेलों के सागर से पार लगने के लिए परमात्मा का नाम-सिमरन नाव है, पुल है। जिस मनुष्य ने पार लगने की चाह की वे नाम-सिमरन द्वारा संसार-समुद्र से पार लग गए। प्रभु के आगे विनती स्वरूप गुरु जी फरमान कर रहे हैं कि हे प्रभु! अपने जन की लाज रख लीजिए। मुझे नाम-जाप की सामर्थ्य प्रदान कीजिए। मैं आपसे आपकी भक्ति की मांग करता हूं।

आगे गुरु जी का फरमान है कि वही हरि के सेवक हरि को प्यारे लगते हैं जिन्होंने उसके नाम का जाप किया है। चित्रगुप्त ने इनके कर्मों का जो लेखा-जोखा लिख रखा था, धर्मराज ने वो सब बराबर कर दिया है। जिन संत-जनों ने साधसंगत में बैठकर अपने मन में हरि-नाम-जाप किया है, उनके हृदय को शांति पहुंचाने वाले प्रभु रूपी चांद प्रकाशित हो गए हैं और उसने हृदय में प्रज्वलित सूर्य रूपी तृष्णाओं की अग्नि को ठंडा कर (बुझा) दिया है, शांत कर दिया है।

अंतिम पंक्तियों में फरमान है कि हे प्रभु! आप सबसे बड़े हो! आप अपहुंच हो! आप अगोचर हो! हर जगह आप ही आप हो! अपने दास पर कृपा कीजिए और अपने दासों के दास का दास बना लीजिए!