आत्मा और परमात्मा क्योंकि समान रूप से अदृश्य वायबी हैं और आत्मा क्योंकि ब्रह्म ऊर्जा का एक अंश ही है, इसलिए आत्मा की पहचान होते ही परम-आत्मा की पहचान का रास्ता प्रशस्त हो जाता है। जिस प्रकार आत्मा रूपी लघु अदृश्य तत्त्व के शरीर में रहने से ही शरीर चलता है, पैदा होता है, बड़ा होता है, हँसता-खेलता है, क्रोध करता है, डराता-धमकाता है, सुत-ऐश्वर्य भोगता है, उसी तरह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड परम-आत्मा की विद्यमानता के कारण गतिशील है। जिस प्रकार आत्मा के भिन्न होते ही शरीर का अवसान अवश्यंभावी है, उसी प्रकार परमात्मा के भिन्न होते ही ब्रह्माण्ड का अस्तित्वहीन होना भी अनिवार्य है।
प्रकृति का अटल नियम है कि हर चीज अपने मूल की ओर लौटना चाहती है, फिर से वही बनना चाहती है, जो थी। पानी का मूल धरती के नीचे है, इसलिए पानी को कहीं भी गिराया जाए, वह नीचे की ओर बहेगा। जहां जगह तनिक सी भी नीची होगी, उधर को ही दौड़ पड़ेगा। गर्मी या तेज का मूल सूर्य है, ऊपर है। आग कहीं भी जलाई जाए, ऊपर की ओर ही जाएगी। जितना अधिक ईंधन मिलेगा, उतनी ही अधिक ऊर्ध्वमुख होती जाएगी। जैसे-जैसे सर्दी का प्रकोप मानव शरीर पर होता है, वह अपने में मुड़ता-तुड़ता रहता है और अन्ततः वह रूप धारण कर लेता है जो रूप उसे माँ के गर्भ में प्राप्त था। दुख या विषाद के क्षणों में भी मानव-शरीर इसी अवस्था को लौट पड़ता है। लोग घुटनों में सिर देकर बैठ जाते है। वह लौटता है अपने मूल की ओर, जो या उसकी ओर। आत्मा का मूल परमात्मा है, इसलिए आत्मा लालायित रहती है परमात्मा से मिलने के लिए, उसके पास लौटकर अपने मूल को प्राप्त होने के लिए। लेकिन शरीर रूपी पिंजरे में कैद यह आत्मा रूपी पक्षी अपने पंख फड़फड़ा कर रह जाता है। माया के मोह में ग्रसित शरीर उसकी फड़फड़ाहट पर व्याकुल नहीं होता अपितु उसे बहला-फुसलाकर उसकी व्यग्रता समाप्त करने में लग जाता है। साधारण व्यक्ति यही तो करता है दिन-रात। उसे ब्रह्म की याद में रोने से बचाने के लिए बार-बार माया में उलझाता है।
जो लोग आत्मा को बहला-फुसलाकर माया में उलझाने के स्थान पर उसके रुदन को सुनते हैं, वे साधारण व्यक्तियों से भिन्न होते हैं। ऐसे व्यक्तियों को ‘प्रबुद्ध’ कहते हैं। प्रबुद्ध व्यक्ति आत्मा को फुसलाने के स्थान पर उसकी मुक्ति का मार्ग खोजता है, उन साधनों की तलाश करता है, जिनके द्वारा आत्मा अपने मूल तत्त्व अर्थात् परमात्मा से मिल सके।
ब्रह्म को उसके रूप या आकार के माध्यम से, विशेषकर उस रूप या आकार के माध्यम से जो मानव की कल्पना-शक्ति ने अपने भौगोलिक सामाजिक परिवेष के प्रभावाधीन दे रखा है। देखने का प्रयास बुनियादी तौर पर रेत की दीवार खड़ी करने के समान है। उसे खोजने के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं, अपने अंदर उत्तरने की आवश्यकता है, क्योंकि हमारे अंदर उसका स्वरूप, उसका अंश, उसका प्रतिरूप मौजूद है। यही एकमात्र सूत्र है, जिसे पकड़कर हम उस तक पहुँच सकते हैं।
यह शरीर तो प्रकृति के पंच महाभूतों से विनिर्मित माटी का खिलौना मात्र है। प्रभु के दिव्य अंश का सुंदर कारावास है। इसका ब्रह्म तक पहुँच पाना, इसका अपने स्थूल मांसल नेत्रों से ब्रह्म को देख पाना संभव नहीं है। दिव्य तत्त्व को दिव्य तत्त्व ही देख सकता है। दिव्य तत्त्व में दिव्य तत्त्व ही विलिन हो सकता है, अन्य कुछ नहीं। शरीर को महत्त्व देना कैदी के स्थान पर कारावास की इमारत को महत्त्व देना है।
आवश्यक यह जान लेना है कि ब्रह्म ऊर्जा रूप है, इसलिए वह अदृश्य है, निराकार है, निरंजन है। ऊर्जा को हम अपनी अन्तर्दृष्टि द्वारा ही देख सकते हैं, बाध्य नेत्रों द्वारा नहीं। यह ऊर्जा रूप भी उसी अवस्था में अन्तर्दृष्टि
पकड़ में आता है, जब अन्तर्दृष्टि पूर्णतया अभयस्त होकर, ऊर्जा को प्रकाश-रूप में, ज्योति-रूप में देखने के योग्य हो जाती है। ज्योति-रूप का दर्शन भी ज्योति में परिवर्तित हुई आत्म-ऊर्जा ही कर सकती है। यहां पहुंचकर ही समझ आता है कि गुरू नानक साहिब के जाति महि जोति जोति महि जाता का क्या अर्थ है।
ब्रह्म यद्यपि अदृश्य है लेकिन उसे देख पाना असम्भव नहीं है, कठिन भी नहीं है। मिर्जा गालिब कहते हैं:
“मिलना तेरा अगर नहीं आसाँ तो सहल है, दुश्वार तो यही है कि दुश्वार भी नहीं।”
क्योंकि सरल काम में श्रम-साधना बहुत कम होती है, इसलिए उसका महत्त्व भी न्यून हो जाता है। गला खराब होने पर हर डॉक्टर नमक के पानी के गरारे करने को कहता है, जो कोई नहीं करता। दवाई कितनी भी महेंगी क्यों न हो, सब खा लेते हैं। नमक घर में पड़ा है, खरीदना नहीं है, इसलिए नमक का महत्त्व भी नहीं है। दवा खरीदनी है, इसलिए महत्त्वपूर्ण है।
-डॉ नरेश
