जा कउ हरि रंगु लागो इसु जुग महि…

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February 28, 2026

जा कउ हरि रंगु लागो इसु जुग महि सो कहीअत है सूरा ॥ आतम जिणै सगल वसि ता कै जा का सतिगुरु पूरा ॥१॥
ठाकुरु गाईए आतम रंगि॥ सरणी पावन नाम घिआवन सहजि समावन संगि ॥१॥रहाउ॥ जन के चरन वसहि मेरै हीअरै सगि पुनीता देही ॥ जन की धूरि देहु किरपा निधि नानक कै सुखु एही ॥२॥४॥३५॥

(अंग६७९-८०)

धनासरी राग के इस पावन दुपदे अथवा शबद में पंचम पातशाह श्री गुरु अरजन देव जी अपना समस्त जीवन प्रभु-नाम चिंतन, मनन को समर्पित करके इसको सफल करने वाले गुरमुख का चित्रण करते हुए मनुष्य-मात्र को मनुष्य-जन्म का सुअवसर सफल करने का गुरमति मार्ग बख्शिश करते हैं।

गुरु जी फरमान करते हैं कि हे भाई! जिसको परमात्मा के नाम का रंग लग गया है इस संसार में उसी मनुष्य को ‘शूरवीर’ कहना चाहिए। वह पावन नाम के साथ स्वयं को ओत-प्रोत कर अपने आप पर विजय प्राप्त कर लेता है अथवा काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार जैसे विकारों से बच जाता है। सभी उसके वश में हो जाते हैं जिसका मार्गदर्शक पूर्ण गुरु हो जाए। इसलिए हे भाई! आत्मिक प्रेम भावना के साथ उस मालिक अकाल पुरख का गुण गायन करो। उस परमात्मा की शरण में सदैव लगे रहने से, उसके नाम को स्मरण करने से आत्मिक अडोलता की मनोस्थिति प्राप्त होती है जो मनुष्य-जन्म का मूल उद्देश्य है। श्री गुरु नानक देव जी महाराज ने योगियों और सिद्धों के साथ विचार-गोष्टि करते हुए उनको बताया कि संसार का परित्याग नहीं करना चाहिए बल्कि संसार में रहते हुए ही अत्यधिक इच्छाओं को वश में करते हुए सहज-भाव जीवन का आत्मिक आनंद का स्तर प्राप्त किया जा सकता है:

अंतरि सबदु निरंतरि मुद्रा हउमै ममता दूरि करी । कामु क्रोधु अहंकारु निवारै गुर कै सबदि सु समझ परी ॥
(अंग ९३९)

नम्रता की मूरत सतिगुरु जी कथन करते हैं कि यदि मन को वश में करने वाले तेरे दासों के चरण मेरे हृदय में बस जाएं तो उनकी संगत में मेरा यह शरीर भी पवित्र हो जाए। हे कृपा के खजाने प्रभु! ऐसे गुरमुखों की ही चरण-धूल प्रदान करो। यही सबसे बड़ा सुख-आनंद है।