जैतो का मोर्चा

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February 19, 2025

श्री दलजीत राय कालिया *

सिक्ख कौम का इतिहास कुर्बानियों और शहादतों का इतिहास है। शहीदों के सिरताज श्री गुरु अरजन देव जी, हिंद की चादर श्री गुरु तेग बहादर साहिब और सरवंशदानी श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी की अद्वितीय कुर्बानी की विलक्षण मिसाल है। समय-समय पर मेहनती सिंघों ने शहीदी परंपरा को आगे बढ़ाया है। बहादुर सिंघ आरों से चीरे गए, उबलते पानी की देगों में उबाले गए, बंद बंद कटवा गए, चरखड़ियों पर चढ़े, मगर परमात्मा के हुक्म को मीठा करके मानते रहे। समय के हाकिमों ने सिक्खों का खुरा-खोज मिटाने के लिए घल्लूघारों का दौर चलाया, लेकिन सिक्ख हमेशा चढ़दी कला में रहे। अपने धार्मिक स्थानों की आन-बान-शान और श्री गुरु ग्रंथ साहिब के मान-सम्मान के प्रति सिक्ख हमेशा सुचेत रहते हैं, इसलिए बड़ी से बड़ी कुर्बानी करने के लिए तैयार रहते हैं ।

गुरुद्वारा साहिबान के प्रबंध में सुधार लाने और इनको दुराचारी तथा अंग्रेज पिट्ठू महंतों के कब्ज़े से मुक्त करवाने के लिए गुरुद्वारा प्रबंध सुधार लहर चली । गुरुद्वारा प्रबंध सुधार लहर के अंतर्गत कई गुरुद्वारा साहिबान को पंथक प्रबंध में लाया गया। इस समय लगे मोर्चों के दौरान जैतो का ऐतिहासिक मोर्चा सबसे लंबा समय चला । नाभा रियासत के महाराजा रिपुदमन सिंघ ने अपनी ताजपोशी के समय सिक्ख रीति-रिवाजों को अपनाया, जो कि अंग्रेज सरकार को अच्छा नहीं लगा । वह महाराजा रिपुदमन सिंघ को बागी समझने लगी । ५ अप्रैल, १९२१ ई के दिन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा सिक्ख संगत को साका गुरुद्वारा श्री ननकाणा साहिब के शहीदों की याद में सिर पर काली दसता और दुपट्टे सजाने तथा जगह-जगह पर दीवान सजाने एवं श्री गुरु ग्रंथ साहिब के श्री अखंड पाठ साहिब करवाए जाने की अपील की। सिक्ख महाराजाओं में से महाराजा रिपुदमन सिंघ ने ही इस अपील पर पूरी शालीनता और समर्पण के साथ अमल किया। अंग्रेज़ सरकार पहले ही महाराजा के विरुद्ध थी। नाभा और पटियाला के महाराजा के अक्सर घेरलू झगड़े चलते रहते थे । अंग्रेज़ सरकार ने नाभा और पटियाला के राजाओं से फैसला करने के हक प्राप्त कर लिए। १९२२ ई के अंत में इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज ने महाराजा नाभा के विरुद्ध फैसला दे दिया। अंग्रेज़ सरकार ने ९ जुलाई, १९२३ ई को महाराजा नाभा को गद्दी से उतार दिया । सरकार की इस कार्यवाही से सिक्ख पंथ में भारी आक्रोश फैल गया । शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने महाराजा के साथ हमदर्दी प्रकट की और ५ अगस्त को एकत्रता कर ९ सितंबर को सभी स्थानों पर ‘नाभा दिवस’ मनाने की अपील की ।

२५, २६ और २७ अगस्त को इलाके की संगत द्वारा गुरुद्वारा गंगसर साहिब जैतो में दीवान सजाया गया और महाराजा की बहाली के लिए प्रस्ताव पारित किए गए । २७ अगस्त को भरे दीवान में से श्री गुरु ग्रंथ साहिब की हजूरी में बैठे ज्ञानी इंदर सिंघ को गिरफ्तार कर लिया गया। इस समय नाभा रियासत का प्रबंध अंग्रेज़ सरकार द्वारा नियुक्त मिस्टर विलियम जानस्टन के हाथों में था । ९ सितंबर को दूसरे स्थानों की तरह जैतो मंडी में भी जुलूस निकाला गया और गुरुद्वारा गंगसर साहिब में दीवान सजाया गया । ९ सितंबर के जुलूस में शामिल अकाली गिरफ्तार कर लिए गए । १४ सितंबर को जब गुरुद्वारा गंगसर साहिब के अंदर दीवान सजा हुआ था और संगत गुरबाणी श्रवण कर रही थी तो अंग्रेज हकूमत के हथियारबंद बावर्दी सिपाहियों ने गुरुद्वारा साहिब के अंदर दाखिल होकर संगत और सेवकों को गिरफ्तार कर लिया। जो सिंघ श्री गुरु ग्रंथ साहिब की हजूरी में बैठा पाठ कर रहा था, उसे घसीट लिया और श्री अखंड पाठ साहिब खंडित कर दिया। इस घटना के बाद १४ सितंबर, १९२३ ई. से गुरुद्वारा प्रबंध सुधार लहर का सबसे बड़ा मोर्चा ‘जैतो का मोर्चा’ बाकायदा शुरू हो गया।

शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने २५-२५ सिंघों का जत्था रोज़ाना जैतो भेजने का फैसला कर लिया। पहला जत्था १५ सितंबर को श्री अकाल तख़्त साहिब से पैदल रवाना हुआ। इस जत्थे ने चलने से पहले ही शांतमयी रहने का प्रण लिया हुआ था । जत्था विभिन्न स्थानों पर पड़ाव करता हुआ जैतो पहुंचा, परंतु गुरुद्वारा साहिब के अंदर दाखिल होने से पहले ही जत्थे को गिरफ्तार कर लिया गया। २५ सिंघों का एक जत्था रोज़ाना श्री अकाल तख़्त साहिब से शांतमयी रवाना होता और जैतो पहुंच कर गिरफ्तारी देता रहा। इन गिरफ्तारियों की चर्चा समूचे देश में फैल गई और जैतो का मोर्चा समूचे भारत की नज़र में चढ़ गया ।

२९ सितंबर, १९२३ ई को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने नाभा के अधिकारियों की तरफ से १४ सितंबर को गुरुद्वारा गंगसर साहिब के अंदर श्री अखंड पाठ साहिब खंडित करने की कार्यवाही और अकालियों के साथ किए जा रहे भेदभाव की कड़ी निंदा की और सिक्खों के धार्मिक मामलों में अंग्रेज़ हकूमत के दखल को बर्दाश्त न करने के लिए प्रस्ताव पारित किया । अंग्रेज़ सरकार ने १३ अक्तूबर को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और अकाली दल दोनों को कानून के विरोधी करार दे दिया। सरकार ने शिरोमणि गु. प्र. कमेटी के प्रधान सहित सदस्यों और सक्रिय अकाली नेताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। अब फैसला हुआ कि ५००-५०० सिंघों के जत्थे भेजे जाएं। ९ फरवरी, १९२४ ई. को ५०० सिंघों का पहला जत्था शांतमयी रहने का प्रण लेकर श्री अकाल तख़्त साहिब से अरदास करके चला। रास्ते में भिन्न-भिन्न स्थानों पर पड़ाव करता हुआ यह जत्था २० फरवरी को फरीदकोट के गांव बरगाड़ी पहुंच गया । २१ फरवरी को जत्था प्रातः काल ‘आसा की वार’ के कीर्तन की समाप्ति के बाद जैतो की तरफ रवाना हुआ। जत्थे में बड़ी मात्रा में संगत शामिल थी। नाभा राज्य की सीमा में दाखिल होने पर जत्थे को वहां रोक लिया गया। जत्थे के आगे पांच सिंघ निशान साहिब लेकर चल रहे थे और मध्य में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की पालकी थी । गुरुद्वारा गंगसर साहि जाने वाले रास्ते पर तारें लगी हुई थीं और मशीनगनें तैनात थीं । विल्सन जानस्टन द्वारा गोली चलाने का हुक्म दे दिया गया। गोली बंद बोने तक सारी संगत गुरुद्वारा टिब्बी साहिब पहुंच चुकी थी । जत्थे के सैकड़ों सिंघ और साथ जा रही संगत बड़ी संख्या में शहीद तथा जख़्मी हो चुकी थी । जत्थे के बचे हुए सिंघ गुरुद्वारा टिब्बी साहिब से गुरुद्वारा गंगसर साहिब की तरफ बढ़े, परंतु घुड़सवार फौजी दस्ते ने उनका रास्ता रोक लिया। बची हुई संगत और सिंघों को गिरफ्तार कर लिया गया । जैतो में घटित इस दुखदायी कांड की खबर चारों तरफ जंगल की आग की तरह फैल गई ।

जैतो के मोर्चे के दौरान घटी इस भयानक घटना ने सिक्खों के मन में जोश और भी प्रचंड कर दिया। २१ फरवरी के साके के बाद शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की तरफ से दूसरा ५०० सिंघों का जत्था भेजने का एलान किया गया। दूसरा जत्था २८ फरवरी, १९२४ ई. को श्री तख़्त साहिब से पैदल रवाना हुआ और १३ मार्च को जैतो के नज़दीक पहुंच गया। इस जत्थे ने १४ मार्च को गुरुद्वारा साहिब के अंदर दाखिल होना था। इस जत्थे पर पहले की तरह गोलियों की बारिश नहीं की गई बल्कि जत्थे की गिरफ्तारी का हुक्म दिया गया। सभी सिंघों ने शांतमयी ढंग के साथ अपने आप को गिरफ्तारी के लिए पेश किया। तीसरा ५०० सिंघों का जत्था २२ मार्च को श्री अकाल तख़्त साहिब से रवाना हुआ और ७ अप्रैल, १९२४ ई को जैतो पहुंचा। इनको गिरफ्तार कर किले के अंदर बंद कर दिया गया। इस तरह ५००-५०० सिंघों के जत्थे तब तक जैतो की तरफ रवना होते रहे, जब तक सरकार ने सिंघों को श्री अखंड पाठ साहिब आरंभ करने की इजाज़त न दे दी। जैतो का मोर्चा १४ सितंबर, १९२३ ई. से शुरू होकर जुलाई, १९२५ ई. तक चलता रहा । अंततः सरकार को झुकना पड़ा। खालसे की जीत हुई। जब सरकार को दृढ़ विश्वास हो गया कि सिक्खी प्रेम को कोई दबा नहीं सकता तो उसने ७ जुलाई, १९२५ ई. को ‘गुरुद्वारा एक्ट’ पारित कर एक नवंबर से इसे लागू कर दिया। इस एक्ट के अधीन सभी गुरुद्वारा साहिबान का प्रबंध सिक्ख पंथ के पास आ गया।