डिठे सभे थाव नही तुधु जेहिआ॥
बधोहु पुरखि बिधातै तां तू सोहिआ ॥
वसदी सघन अपार अनूप रामदास पुर ॥
हरिहां नानक कसमल जाहि नाइऐ रामदास सर ॥
(अंग १३६२)
पंचम सतिगुरु श्री गुरू अरजन देव जी श्री गुरू ग्रंथ साहिब में ‘फुनहे महला ५’ के शीर्षक तले अंकित इस पावन शब्द में आत्मिक स्नान उपलब्ध कराने की क्षमता वाले अमृत सरोवर और इस अमृत सरोवर के इर्द-गिर्द स्थापित मनोहर स्थल ‘रामदासपुर’ की महिमा का गुणगान करते हुए मनुष्य-मात्र के लिए कल्याणकारी आत्मिक शुद्धता एवं रुहानी मंजिलों के विकास की ओर प्रेरित करने का परोपकार करते हैं।
गुरू जी फरमान करते हैं कि हे राम (प्रभु) के दासों के सरोवर ! मैंने सभी स्थान इन आँखों से देख लिये हैं, जिससे मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि इस संसार में कोई अन्य स्थान तेरे जैसा नहीं है। तुझको विधाता ने स्वयं रचित किया है इसीलिए तो तू शोभा दे रहा है, सुंदर दिखाई दे रहा है।
गुरू जी फरमान करते हैं कि हे राम (अकाल पुरख परमात्मा) के दासों के नगर ! तुझ में बहुत सघन जनसंख्या का वासा है। तू सुंदरता में कोई किनारा, कोई सीमा नहीं रखता। तू बेहद अनुपम है। सतिगुरु जी अंत में फरमान करते हैं कि हे राम (अकाल पुरख) के दासों के सरोवर! तुझ पर परमात्मा की ऐसी बख्शिश है कि तुझ में आत्मिक स्नान करने से सभी पाप-विकार स्वतः ही दूर हो जाते हैं भाव मन निर्मल हो जाता है और आत्मा परमात्मा से साक्षात्कार की विस्मादी अनुभूति करती है। कहने से भाव यह कि आत्मिक स्नान प्रदान करने के कारण रामदास सर एवं रामदासपुर अपार महिमा के पात्र हैं।
