ज्ञान ही दिव्यता है, जिसे प्रकृति ने प्रत्येक प्राणी को दे रखा है। एक व्यक्ति ‘पढ़ा-लिखा’ होता है, एक ‘पढ़ा-गुणा’ होता है। ‘पढ़ा-लिखा’ व्यक्ति लिखना-पढ़ना जानता है, इससे आगे वह नहीं बढ़ता, लेकिन ‘पढ़ा-गुणा’ अपने पढ़े हुए को, अपनी जानकारी को, अपने विवेक के साथ गुणा कर लेता है तो जानकारी ज्ञान में परिवर्तित हो जाती है। अतः केवल भगव्द-भजन किए जाने से या केवल उसका नाम जपते रहने से ब्रह्म-ज्ञान की प्राप्ति संभव नहीं है, इसके लिए चिंतन-मनन परमावश्यक है। चिंतन-मनन करना ही जानकारी को विवेक के साथ गुणा करना है।
गुरबाणी कहती है “ब्रहम गिआनी परउपकार उमाहा ॥” ब्रह्मज्ञानी को परोपकार का उत्साह होता है। कारण यह कि उसका चिंतन-मनन उसे बताता है कि सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के साथ उसका एक सम्बंध है, एक रिश्ता है, क्योंकि उसके भीतर भी वही दिव्य-अंश अर्थात् आत्मा मौजूद है जो मेरे अंदर मौजूद है। इस नाते से सृष्टि का प्रत्येक प्राणी मेरा सगा है। अपनों की भलाई के लिए, अपनों के कल्याणार्थ, अपनों की सहायता के लिए कुछ भी करना मानव-प्रकृति है। ब्रह्मज्ञान हो जाने पर परोपकार उसके लिए दिखावा-मात्र या कर्मकांड भी नहीं रहता। किसी दूसरे के लिए कुछ करने का उत्साह उसे परमार्थ में प्रवृत्त करता है तथा परमार्थ का प्रत्येक प्रयास उसे परम-आनंद देता
है। यही उसके ‘उमाह’ का प्रेरक तत्व है।
ज्ञान किसी को दिया नहीं जा सकता, केवल शिक्षा या विद्या दी जा सकती है। विद्या ज्ञान तब बनती है जब स्वानुभूत हो जाती है। किसी के द्वारा ब्रह्म विषय में कुछ भी बताया जाए, बताने वाला अपना ब्रह्म विषयक ज्ञान ही क्यों न बता दे, यह देने वाले का ज्ञान ही रहेगा, लेने वाले का नहीं। लेने वाले का ज्ञान तब बनेगा जब वह इसका अनुभव स्वयं कर लेगा। गुरु केवल मार्गदर्शन करता है, रास्ते पर चलने की विधि बताता है, लेकिन चलना शिष्य को स्वयं ही होता है। शिष्य जब पूरी निष्ठा के साथ, पूर्ण समर्पण-भाव के साथ, ब्रह्म-मार्ग का पथिक बनता है तो उसका मस्तिष्क उसके मन या विवेक के साथ उलझना छोड़ देता है। स्वानुभव गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान का सत्यापन करता है, तब शिष्य ज्ञानी बनता है। गुरबाणी ब्रह्मज्ञानी को परिभाषित करती है किः मनि साचा मुखि साचा सोइ ॥
अवरु न पेखै एकसु बिनु कोइ ॥
नानक इह लछण ब्रहम गिआनी होइ ॥(पन्ना २७२)
जिसके मन में केवल सत्य बसता है, जिसकी बाणी सदा सत्य बोलती है, जो ब्रह्म (प्रभु) के अतिरिक्त किसी अन्य को नहीं जानता, वही ब्रह्मज्ञानी है।
सत्य क्या है? जो ब्रह्मज्ञानी के हृदय में बसता है। यही कि समस्त आत्माएं परमात्मा का अंश हैं, जिन्हें विभिन्न प्रकार के शरीर प्रदान करके कर्म के बंधन में बांध दिया गया है। व्यक्ति जिस प्रकार के कर्म करता है उसी के आधार पर उसके अगले जन्म का निर्धारण होता है। इन समस्त आत्माओं को ब्रह्म एक दिन पुनः अपने में समेट लेगा, वापिस बुला लेगा। जिस दिन यह होगा उसी दिन का नाम महाप्रलय, कयामत, डूम्सडे आदि रखा गया है। जो आत्माएं प्रबुद्ध हैं, वे कर्मबंध नहीं बनाती हैं और शरीर के रहते ही ब्रह्म के साथ अपना तादात्म्य बना लेती हैं, उसके साथ संवाद रचा लेती हैं और प्रलय की प्रतीक्षा करने के स्थान पर नश्वर भौतिक शरीर का परित्याग करते ही ब्रह्म में लीन हो जाती हैं। ध्यान के द्वारा साधक अपनी आत्मा को वायवी से तेज रूप में परिवर्तित करता है और छोटी ज्योति (आत्मा) बड़ी ज्योति (परम-आत्मा) में जाकर विलीन हो जाती है।
-डॉ. नरेश (पंचकूला)
