जिस तरह से भारत के सौंदर्य स्थलों और पर्वतीय नगरों में तेजी से प्रदूषण फैल रहा है, यह बहुत ही चिंतनीय बात है। उत्तर हिमालय में धर्मशाला, डलहौजी, शिमला, कुल्लू-मनाली, अल्मोड़ा, रानीखेत और मसूरी से लेकर पूर्व में कलिंपौंग और दार्जिलिंग तक वे सभी स्थान जो हवा और स्वास्थ्यवर्धक जलवायु के लिए प्रसिद्ध थे, ये सब अपना पुराना स्वरूप निरंतर खोते चले जा रहे हैं। इन पर्वतीय नगरों में शहरीकरण, आबादी दबाव, वृक्षों के अंधाधुंध कटान, बेहिसाब कंक्रीट भवनों का निर्माण, भूस्खलन, वाहनों और चिमनियों के धुएं, पहाड़ियों के खदान व गंदगी आदि के करण रमणीक स्थलों का सौंदर्य प्रतिदिन नष्ट होता जा रहा है। लेकिन हमारी सरकार इस ओर से आंखें-मूदे हुई है, जबकि दूसरी ओर सटोरियों व प्रापर्टी डीलर इन रमणीक स्थलों में जगह खरीदकर फ्लैट की कतारें, बंगले, ढाबे, रेस्तरां, शराब और फ्रूट जूस की दूकानें खोलकर दिन-रात पैसा बटोरने में लगे हुए हैं। अगर यह सब इसी तरह चलता रहा तो बहुत जल्द हमारी इन खूबसूरत वादियों व पहाड़ी नगरों का प्राकृतिक व अनुपम सौंदर्य नष्ट हो जाएंगा। मुख्य सवाल अपनी अमूल्य विरासत की रक्षा करने का है न कि उसे हमेशा के लिए नष्ट कर देने का(1993)
लेखक – राजेश शर्मा
