प्राणी एको नामु धिआवहु

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February 25, 2026

खाणा पीणा हसणा सउणा विसरि गइ‌आ है मरणा ॥ खसमु विसारि खुआरी कीनी धिगु जीवणु नहीं रहणा ॥१॥ प्राणी एको नामु धिआवहु ॥ अपनी पति सेती घरि जावहु ॥१॥रहाउ तुघनो सेवहि तुझु किआ देवहि मांगहि लेवहि रहहि नही ॥ तू दाता जीआ सभना का जीआ अंदरि जीउ तुही ॥२॥ गुरमुखि धिआवहि सि अम्रितु पावहि सेई सूचे होही ॥ अहिनिसि नामु जपहु रे प्राणी मैले हछे होही ॥३॥ जेही रुति काइआ सुखु तेहा तेहो जेही देही ॥ नानक रुति सुहावी साई बिनु नावै रुति केही ॥४॥
(अंग१२५४)

मलार राग में उच्चरित उपरोक्त शबद में श्री गुरु नानक देव जी नाम-सिमरन की महिमा का बखान करते हुए पावन फरमान करते हैं कि जन्म लेने के बाद मात्र खाने, पीने, हंसने, सोने में ही जीव अपना जीवन गुजार देता है। जीव जीवन को स्थाई समझकर मृत्यु को भूल जाता है। यह सत्य है कि जिसे मृत्यु याद नहीं रहती उसे परमात्मा भी याद नहीं रहता। खसम (प्रभु) को भुलाकर जीव अपना जीवन ख्वार कर लेता है, उसके पल्ले में हमेशा ख्वारी ही पड़ती है। प्रभु को भूल जाने से जीव का जीवन किसी काम का नहीं, निंदनीय है। गुरु जी ज़ोर देकर कहते हैं कि हे प्राणी! एक ही नाम (प्रभु का) सिमरन कर और प्रभु का नाम-सिमरन करते हुए इज्जत सहित प्रभु-घर (दर) में जा। जो प्रभु का नाम-सिमरन करते हैं उन्हें यह समझ आ जाती है कि देने वाला एक परमात्मा ही है, इसलिए वे सदा (परमात्मा से नाम-दान) मांगते ही रहते हैं और यह (नाम-दान) मांगने से वे चूकते नहीं। हे प्रभु! तू ही सब जीवों का दाता है और सब जीवों में एक तू ही निवास करता है। गुरु जी आगे फरमान करते हैं कि गुरमुख प्राणी ही प्रभु का नाम-सिमरन करते हैं, वही प्रभु का नाम-अमृत हासिल करते हैं और वही सच्चे जीवन वाले बनते हैं। हे प्राणी! दिन-रात प्रभु का नाम-सिमरन किया कर, क्योंकि नाम-सिमरन द्वारा बुरे आचरण वाले इंसान भी अच्छे बन जाते हैं।

गुरमुखों ने मानव-जीवन के लिए दो ऋतुएं मानी है- एक, प्रभु-नाम-सिमरन वाली ऋतु तथा दूसरी, बिना प्रभु-नाम-सिमरन वाली ऋतु। इसी संदर्भ में जिक्र करते हुए गुरु जी कथन करते हैं कि जिस ऋतु में जीव रहता है उसके शरीर को वैसा ही सुख मिलता है और उसका शरीर भी वैसा ही हो जाता है अर्थात् यदि जीव प्रभु-नाम-सिमरन वाली (ऋतु की) अवस्था में जीता है तो उसे सुख मिलते हैं; यदि बिना प्रभु-नाम-सिमरन वाली (ऋतु की) अवस्था में रहता है तो उसे दुखों का सामना करना पड़ता है। शबद की अंतिम पंक्ति में गुरु जी का फरमान है कि प्रभु-नाम-सिमरन वाली ऋतु ही अच्छी है, इसके विपरीत कोई भी ऋतु आ जाए उसका जीव के जीवन में कोई प्रभाव नहीं रहता है। गुरु जी के कहने से तात्पर्य है कि मनुष्य को अपने जीवन में प्रभु-नाम-सिमरन करते हुए सदा इसी अवस्था में बने रहना चाहिए।