बनसपति मउली चड़िआ बसंतु

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February 04, 2026

गुरबाणी में दिन, वार, तिथियां, ऋतुएं, महीनों का जिक्र आया है तथा इनके माध्यम से मनुष्य को आत्मिक ज्ञान प्रदान किया गया है। यहां कुदरत का वर्णन किसी प्रकार की सगुण पूजा नहीं है बल्कि कुदरत में कादर का जलवा देखकर मनुष्य की अंदरूनी विस्माद अवस्था का निरूपण किया गया है। कुदरत का आनंद मन को प्रेरणा देने वाला बताया गया है। यहां हमने मात्र बसंत ऋतु का वर्णन करना है। गुरबाणी में बसंत ऋतु मानव के आत्मिक आनंद से सम्बंधित है।

मानवीय जीवन का उद्देश्य आत्मिक आनंद प्राप्त करना है। यह प्राप्ति नाम-सिमरन द्वारा हो सकती है, अन्य किसी कर्म अर्थात् तप, तीर्थाटन आदि कर्मों के कमाने से नहीं। इस तरह बसंत का समय आने पर प्रकृति में हरियाली, सुगंधी एवं बहार आती है। इसी तरह नाम जपने वाला मनुष्य सदैव बसंत की तरह खिला रहता है। संगत में गुरु का उपदेश कमाने वाला साधक तो हमेशा ही आत्मिक आनंद में रहता है। बसंत ऋतु वर्ष में केवल दो महीने ही रहती है, जबकि नाम सिमरने वाला जीव सब ऋतुओं में खिला रहता है। उसके आत्मिक आनंद से अभिप्राय प्रभु का असल चिंतन होता है। प्रभु सदा बसंत की भांति अर्थात् सदा खिला रहता है। गुरबाणी का उद्देश्य मुरझाए हुए मनों को पुनः खिलाना और उनके अंदर प्यार की सुगंध पैदा करना है :

माहा रुती महि सद बसंतु ॥
जितु हरिआ सभु जीअ जंतु॥ (पन्ना ११७२)

बसंत ऋतु प्रकृति में हर तरफ से आनंद लेकर आती है। यह आनंद मनुष्य के लिए एक प्रेरणा है जो मनुष्य अहं के कारण प्रभु से दूर होकर आत्मिक सूखे का मारा हुआ होने के कारण आत्मिक पक्ष से मुरझाकर निराश हो गया है। गुरमुखों की संगत करके वह पुनः हरा-भरा हो सकता है। गुरबाणी का यही मंतव्य है कि मनुष्य का यह मन हर्षित हो जाए। गुरबाणी सीधे तौर पर मनुष्य की आत्मिक जागृती से सम्बंधित है। गुरबाणी में बसंत ऋतु को मुबारकबाद कहा गया है, क्योंकि इसके द्वारा मनुष्य को एक ऐसी आंतरिक प्रेरणा मिलती है कि वह प्रभु-नाम में रंगा हुआ रहने के लिए विह्वल होता है। मनुष्य आध्यात्मिक पक्ष पर चलने से ही अंदर से हर्षित हो सकता है :

बनसपति मउली चड़िआ बसंतु ॥
इहु मनु मउलिआ सतिगुरू संगि ॥ (पन्ना ११७६)

मउली धरती मउलिआ अकासु ॥
घटि घटि मउलिआ आतम प्रगासु ॥
(पन्ना ११९३)

गुरमुखों की संगत मनुष्य के हृदय में नाम की लगन पैदा करती है। नाम-सिमरन से ही मन में आनंद व व्यवहारिक जीवन में हुल्लास आता है। प्रभु की ज्योति का अतः करण में अनुभव करने से ही मानव जीवन में आनंद (बसंत) आ सकता है। संसार के जीव तृष्णा की अग्नि में जलकर नष्ट हो रहे हैं। उनके मन में समाए माया के भ्रमों एवं दुविधाओं ने जीवन को रूखा तथा शुष्क कर रखा है। यह ऋतु अर्थात् यह मानव जीवन का समय नाम
जपने तथा हरे-भरे होने अर्थात् आनंद प्राप्त करने का है। गुरबाणी आत्म-मार्ग है, जो बाहर के भटकाव का त्याग करने के लिए ही बराबर प्रेरणा दे रही है। मन में जब विचारों का अंत हो जाता है तो सुरति नाम-सिमरन में टिक जाती है। फिर बसंत की ऋतु में सदीवी आनंद, जो अमृत फल की तरह होता है की प्राप्ति होती है। यह आनंद सदाबहार, सदीवी हर्ष की भांति होता है। मनुष्य अपनी कमज़ोरियों से मुक्त होकर दैवी गुणों का मालिक बन जाता है। गुरु साहिबान वाहिगुरु को अनुभव करके अपनी पावन बाणी द्वारा सूखे हुए सांसारिक लोगों को हरा-भरा करने के लिए उपदेश दृढ़ करवा रहे हैं:

हरि का नामु धिआइ कै होहु हरिआ भाई ॥ करमि लिखतै पाइए इह रुति सुहाई ॥ वणु त्रिणु त्रिभवणु मउलिआ अंम्रित फलु पाई ॥ मिलि साधू सुखु ऊपजै लथी सभ छाई ॥

नानकु सिमरै एकु नामु फिरि बहुड़ि न धाई ॥
(पन्ना ११९३)

प्रकृति का आनंद तो सब हरि के आनंद के कारण ही है। हरि तो सदैव खिला रहता है। बसंत ऋतु के आनंद से हमें हरि की याद आनी चाहिए, लेकिन हम हरि को औपचारिक रूप से पाठ-पठन द्वारा ही याद करते हैं। प्रभु के साथ मिलाप शारीरिक नहीं, आत्मिक होता है। यही मिलाप आत्मिक आनंद का साधन है। इसी साधन द्वारा ही आंतरिक आत्मिक शौहर (परमात्मा) का निवास मिल सकता है :

— पहिल बसतै आगमनि पहिला मउलिओ सोइ ॥
जित मउलिऐ सभ मउलीऐ तिसहि न मउलिहु कोइ ॥
– नानक तिना बसंतु है जिन्ह घरि वसिआ कंतु ॥ जिन के कंत दिसापुरी से अहिनिसि फिरहि जलंत ॥(पन्ना ७९१)

गुरबाणी आत्म-जिज्ञासुओं को बाहरी आनंद
तथा बाहरी मिलाप से ऊपर उठाकर आंतरिक-आत्मिक मिलाप के लिए प्रेरणा प्रदान करती है।

इसके अनुभवी वचनों ने बहुत सारे लोगों को बाहरमुखता से आंतरिकमुखता की ओर प्रेरणा की है। आंतरिक आत्मा का मिलाप कभी वियोग का कारण नहीं बनता :

मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ ॥
अंतर आतमै जो मिलै मिलिआ कहीऐ सोइ ॥
(पन्ना ७९१)

प्रभु बसंत ऋतु से पहले का है अर्थात् सदैवकालीन है। वही पहला खिला हुआ है। उसके खिलने से ही सारी सृष्टि खिलती है। प्रभु के खिलने का कारण कोई अन्य शक्ति नहीं है, वह अपने आप से ही खिलता है तथा सारी प्रकृति में आनंद का कारण भी वही है। गुरु साहिब उपदेश करते हैं कि उस प्रभु के गुणों की विचार करो जो हमेशा खिला रहता है। उस प्रभु का सिमरन करना चाहिए जो सब का सहारा है। सारा जगत उसके सहारे आनंदित होता है। गुरु साहिब ने बसंत ऋतु का आत्मीकरण किया है। जिन जीव-स्त्रियों का प्रभु-पति उनके हृदय रूपी घर में बसता है, उनके लिए सदैव बसंत है, उनके हृदय में हमेशा आनंद है। जिनके पति घर पर नहीं, परदेस गए हुए हैं अर्थात् जिनके हृदय में वाहिगुरु नहीं बसा, उनके लिए हमेशा पतझड़ है, निराशा है।

गुरबाणी ने कुदरत में कादर का जलवा

देखने तथा इसको प्यार करने का उपदेश दिया है। कुदरत के आनंद से मनुष्य की मानसिक अवस्था में जो विकास की भावना है, उसका प्रकटावा किया है। यह प्रकटावा अलग-अलग ऋतुओं के वर्णन के साथ-साथ, आत्मिक आनंद, संतुष्टि तथा प्रेरणा का स्रोत है। कुदरत को देखने-वाचने के उपरांत मन की स्थिरता एक अहम प्राप्ति है।

-डॉ. शमशेर सिंह (पटियाला)