मानवता के गुरु : श्री गुरु नानक देव जी

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October 28, 2025

श्री गुरु नानक देव जी का धरती पर आना अर्थात् जन्म लेना विश्व के धार्मिक इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है. क्योंकि इस प्रकाश पंज ने संसार में जिन सिद्धांतों, रीति-रिवाजों, उसूलों तथा औपचारिकताओं का प्रचार किया, वे समूचे मानव समाज के कल्याण के साथ जुड़ी हई हैं। गुरु साहिब ने अपनी मीठी बाणी के द्वारा और प्यार भरे शब्दों से लोगों के मन को निर्मल और स्वच्छ किया। यह भी कहा जा सकता है कि उनका सर्व मानवीय मिशन एक सुंदर फूल की तरह संसार में खिला, जिसने अपनी मनमोहक सुगंध के द्वारा सारे वातावरण को सुगंधित बनाकर रख दिया। उन्होंने अपनी अलौकिक बाणी द्वारा दलीलें (तर्क) देकर जनता को अंधविश्वास, भ्रमजाल आदि के कुप्रभावों से जागरूक करते हुए मात्र एक परमात्मा की पूजा करने का उपदेश दिया। एक ओर तो मनुष्य का सम्बंध अकाल पुरख के साथ जोड़ा, दूसरी ओर समाज में बराबरी के आधार पर समानता और एकता लाने का उपदेश देकर मानव समाज में एक मनुष्य को दूसरे मनुष्य के करीब लाने के लिए ठोस प्रयत्न किए, ताकि समाज में बिना किसी भेदभाव के भाईचारे की भावना पैदा हो जाये तथा आपसी स्नेह और भी बढ़ता रहे। सबसे अधिक इस भावना की उस समय आवश्यकता इसलिए भी थी क्योंकि उस समय समाज में धर्म

की मूल भावना लुप्त हो चुकी थी : कलि काती राजे कासाई धरमु पंख करि उड़रिआ ॥
कूड अमावस सचु चंद्रमा दीसै नाही कह चड़िआ ॥
(१४५)

बाबर के आक्रमण के समय जो अत्याचार हुए उन्होंने मानवीय जीवन को खौफनाक ढंग में बदलकर पशु जीवन में बदल दिया। प्रशासनिक लोग जनसाधारण से घूस लेकर उनके अधिकारों को नष्ट करने में तनिक भी नहीं झिझकते थे। यही नहीं, जात-पात में बंटे लोग कई प्रकार की ज्यादतियों का शिकार हो रहे थे। हर ओर जुल्म, अत्याचार और अन्याय के प्रहार होना एक साधारण-सी बात समझी जाने लगी थी। ऐसे घिनौने और डरावने वातावरण की पृष्ठभूमि में किसी पूर्ण मनुष्य की ओर से कौम को दोबारा जीवित करना, उसके मनोबल को कायम करना, बेहतरीन मानव-मूल्यों को जनसमूह में संचित करके मनुष्य-मात्र को धर्म की छत्र-छाया में लाना एक ऐसा कारनामा था, जिसे पूरा करना खाला जी का वाड़ा नहीं था, परंतु बलिहारे जायें श्री गुरु नानक देव जी पर, जिन्होंने यह बीड़ा उठाया और इसमें हैरानकुन सफलता प्राप्त की। उन्होंने सबको बांटकर खाना, धर्म की कमाई करना, परिश्रम करना, नाम का जाप करना और सबका भला मांगना आदि उपदेश ही नहीं दिये, बल्कि स्वयं इन बातों का आचरण कर एक आदर्श कायम करके दिखाया। जात-पात के अहंकार से भरे लोगों को चेतावनी दी कि इस बात का कोई महत्त्व नहीं कि तुम ‘उच्च जाति’ या ‘ऊंचे खानदान’ में पैदा हुए हो, फैसला तो तुम्हारे किये कामों के

अनुसार ही होगा :

सा जाति सा पति है जेहे करम कमाइ ॥
जनम मरन दुख काटीऐ नानक छूटसि नाइ ॥
(१३३०)

गुरु जी ने समझाया है कि धन प्राप्त करने के लिए मनुष्य घटिया हरकतों तक आ जाता है; इखलाक, सदाचार और धार्मिक उपदेशों को ताक पर रखकर धन प्राप्ति हेतु नीच हथकंडे अपनाता है, जबकि यह धन साथ नहीं जाता, यहीं धरा रह जाता है :

इसु जर कारणि धणी विगुती इनि जर घणी
खुआई ॥
पापा बाझहु होवै नाही मुझ्आ साथि न जाई ॥
(४१७)

मनुष्य द्वारा की गई कमाई नेक तौर पर किये परिश्रम और सच्चाईपूर्ण व्यवहार पर निर्भर करती है। ऐसी कमाई में से फिर बांटकर खाना है, ताकि कोई भूखा न रहे :

घालि खाइ किछु हथहु देइ॥
नानक राहु पछाणहि सेइ॥
(१२४५)

धन-प्राप्ति के काम में लूट-खसूट तथा दूसरों के अधिकारों को निगल जाने और उनसे दूर रहने के लिए सख्त चेतावनी देते हुए गुरु

जी ने फरमाया है:

हकु पराइआ नानका उसु सूअर उसु गाइ ॥ गुरु पीरु हामा ता भरे जा मुरदारु न खाइ ॥ ( १४१)

श्री गुरु नानक देव जी का उपदेश किसी एक ही जाति, धर्म के लिए नहीं बल्कि हिंदू-मुसलमान सबके लिए है। वे हिंदुओं को अच्छा हिंदू बनने के लिए और मुसलमानों को अपने विश्वास के अनुसार जीवन व्यतीत करने का संदेश देते हैं। मक्का के हाजियों द्वारा यह पूछने पर कि हिंदू अच्छे हैं या मुसलमान, तो आपने फरमाया :

बाबा आले हाजीआ सुभि अमला बाझहु दोनो रोई। हिंदू मुसलमान दुइ दरगह अंदरि लहनि न ढोई।
(वार १:३३)

उनकी दृष्टि में अकाल पुरख को प्राप्त करने के लिए मानव-व्यवहार का शुद्ध होना जरूरी है। सच्चाई का मेल सच्चाई से ही हो सकता है। सदाचार, शुभ कर्म अच्छे मानवीय जीवन की मुख्य आवश्यकताएं हैं। इस विषय पर गुरु जी ने फरमाया है– “सचहु ओरै सभु को उपरि सचु आचारु ॥”

असलियत यह है कि श्री गुरु नानक देव जी का मार्ग सच्चाई का मार्ग है, प्रेम का मार्ग है। आचार में सच्चाई, व्यवहार में सच्चाई, सदाचार में सच्चाई, किरदार में सच्चाई, इंसाफ में सच्चाई वार्तालाप में सच्चाई, राजनीति में सच्चाई, तात्पर्य यह कि सच्चाई के बिना सब कार्य फोकट अथवा अधूरे होते हैं। उन्होंने सच बोलना और सच पर आधारित जीवन-यापन का तरीका स्वयं सच्चा जीवन व्यतीत करके बताया, भले ही ऐसा करने से मलिक भागो नाराज़ हुआ या बाबर गुस्से हुआ। सच के साथ सुमेल करके जीवन की तलखिओं और बुराइयों को गहरी चोट मारी है और उनमें से मूल गुणों के सुमेल वाले जीवन-सिद्धांत के कारण ऐसे मनुष्य का निर्माण आरंभ हो गया जिसे श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी के समय पूर्णता प्राप्त हुई।

श्री गुरु नानक देव जी ने जीवन के हर पहलू पर लामिसाल प्रवचन हमारे समक्ष रखकर मानव जीवन को इखलाकी तौर पर मालामाल कर दिया। जीवन में सदियों से फैले भ्रमों, गलत रीति-रिवाजों, व्यर्थ के कर्मकांडों को दूर करने के लिए उन्होंने इंकलाबी कार्य किये। अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए ‘प्रेम’ और ‘नाम’ की महिमा का संदेश देने के लिए उन्होंने लंबी-लंबी प्रचार यात्राएं कीं, भिन्न-भिन्न धर्मों के तीर्थ-स्थानों पर गये, बड़े-बड़े ऋषियों-मुनियों के साथ विचार-विमर्श करके उन्हें अपने विचारों के साथ सहमत किया। उन्होंने मनुष्य-मात्र को समझाया कि यह संसार सच्चे प्रभु की धर्मशाला है, जिसमें मनुष्य को कर्मयोगी की भूमिका निभाने के लिए भेजा गया है, अतः अपने कर्त्तव्य और मूल की पहचान करके अपने मूल स्रोत के साथ एक होने के लिए नेक कमाई करते हुए सेवा और प्रभु का नाम जपने का कर्म करो। सुच्चे मोतियों जैसे अपने अनमोल विचारों को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाने के लिए उन्होंने दो साथी- भाई मरदाना जी और भाई बाला जी अपने साथ रखे।

संक्षेप में कहा जा सकता है श्री गुरु नानक देव जी के संसार में आने से मानवता को अच्छा जीवन व्यतीत करने का ढंग आया, क्योंकि उन्होंने मानवीय जीवन के हर क्षेत्र को अपनी अद्वितीय विचारधारा, व्यवहारिक शिक्षा, लाभदायक उपदेश और आध्यात्मिक दौलत से भरपूर किया। यही कारण है कि उनके पवित्र वचन धर्मों और जातियों की सीमाओं को पार करके हर मनुष्य के मन पर प्रभाव डालने वाले बन गये। गुरु साहिब के लामिसाल जीवन-सिद्धांतों को भली प्रकार समझकर ही एक प्रसिद्ध शायर सर इकबाल ने उनके बारे में एक लंबी कविता लिखकर उनके प्रति अपना सत्कार प्रकट किया है। कविता का अंतिम पद इस प्रकार है : फिर उठी आखिर सदा तौहीद की पंजाब से। हिंद को एक मर्द-ए-कामिल ने जगाया ख़्वाब से।

श्री गुरु नानक देव जी की सारी अलौकिक बाणी श्री गुरु ग्रंथ साहिब में शोभायमान है, जो भिन्न-भिन्न रागों में दर्ज है। गुरु जी की बाणी असंख्य प्राणियों को मन की गरीबी, अहंकार की निवृत्ति, बुद्धि व्यवहार की स्वच्छता और मन की एकाग्रता निवाजती हुई आत्मिक शांति और आनंद प्रदान करके उनको अकाल पुरख के साथ जोड़ती है :
“गुरु नानक सभ के सिरताजा ।
जिस सिमरे सरे सभ काजा ।”

-डॉ. सरूप सिंघ