– डॉ. दिलप्रीत कौर *
विख्यात संतों एवं भक्तों में भक्त रविदास जी का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है । आ जन्म संवत् १४३३ बिक्रमी में श्री राघव (रघु) के घर बनारस (वाराणसी) में हुआ था। आपके जन्म संबंधी यह दोहा प्रचलित है:
संवत चौदह सौ तैंतीस, माघ सुदी पंद्रास ।
दुखियों के कल्याण हित, प्रगटे श्री रविदास ।
भक्त रविदास जी के समय भारत राजनैतिक दृष्टि से तो गुलाम था ही यहां के लोग मानसिक गुलामी की जंज़ीरों में भी जकड़े हुए थे। इसके अलावा समाज ऊंच-नीच, जात-पात, वर्ग-विभाजन और धार्मिक संकीर्णता के जाल में भी फंसा हुआ था। आपने इन कुरीतियों से समझौता नहीं किया, बल्कि आदर्श समाज बनाने का संकल्प लिया ।
विलक्षण प्रतिभा के धनी भक्त रविदास जी ने पराधीनता को पाप कहा है। आप स्वाधीनता को सुख और पराधीनता को दुख का मूल कारण मानते हैं । युगदृष्टा भक्त रविदास जी के समय समाज की स्थिति अति शोचनीय थी। समाज ऊंच और नीच वर्ग में विभाजित हो गया था। चमार, नाई, जुलाहा और कसाई आदि तथाकथित जाति के लोगों को हेय तथा अछूत समझा जाता था । भक्त रविदा जी ने समानता का पाठ पढ़ाते हुए फरमाया कि सभी प्राणी ईश्वर की ही संतान हैं। प्रभु के यहां कोई जात-पात नहीं है। संसार में आकर जो व्यक्ति जैसा कर्म करता है, उसे उसी के आधार पर पहचान मिलती है। :
कहि रविदास जो जपै नामु ॥
तिसु जाति जनमु न जो॥
( पन्ना १९९६)
आपने काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार पर विजय प्राप्त कर खुशहाल समाज की परिकल्पना की। आपने ऐसे समाज की परिकल्पना की जहां कोई छोटा-बड़ा न हो, चारों ओर खुशहाली ही हो । ऐसा आदर्श समाज भक्त रविदास जी के अनुसार बेगम पुरा ( जहां कोई गम नहीं ) था । उसकी रूप- रेखा इस प्रकार दी गई :
बेगम पुरा सहर को नाउ ॥
दुखु अंदोह नही तिहि ठाउ ॥
नां तसवीस खिराजु न मालु ॥
खउफु न खता न तरसु जवालु ॥१॥
अब मोहि खूब वतन ह पाई ॥
ऊहां खैरि सदा मेरे भाई ॥१॥ रहाउ ॥
काइमु दाइमु सदा पातिसाही ॥
दोम न सेम एक सो आही ॥
आबादानु सदा मसहूर ॥
ऊहां गनी बसहि मामूर ॥२॥
तिउतिउ सैल करहि जिउ भावै ॥ महरम महल न को अटकावै ॥ कहि रविदास खलास चमारा ॥
जो हम सहरी सुमीतु हमारा ॥३॥ ( पन्ना ३४५)
भक्त रविदास जी फरमान करते हैं कि जिस आत्मिक अवस्था वाले ‘शहर’ (माहौल, समाज) में मैं बसता हूं उसका नाम ‘बेगम पुरा’ है। वहां न कोई दुख है, न कोई चिंता और न ही कोई घबराहट है। वहां किसी को कोई पीड़ा नहीं है। वहां कोई जायदाद नहीं है और न ही कोई कर लगता है । वहां ऐसी सत्ता है जो सदा रहने वाली है। वहां कोई श्रेणी-भेद नहीं है। भक्त रविदास जी फरमान करते हैं कि ऐसी खुशनुमा आबोहवा वाले ‘शहर’ में जो रहेंगे वही हमारे मित्र हैं । तात्पर्य यह कि प्रभु-मिलाप वाली आत्मिक अवस्था में सदैव आनंद ही आनंद बना रहता है ।
भक्त रविदास जी जीवन भर एक ऐसे आदर्श समाज की संरचना एवं संभाल में संलग्न रहे जहां घृणा, भेदभाव और वैमनस्य नहीं था, समता और एकता का ही बोलबाला था ।
