श्री गुरु ग्रंथ साहिब के प्रति सत्कार 

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August 25, 2025

मानव मात्र के सर्वपक्षीय कल्याण हेतु अकाल पुरख परमात्मा की अपार कृपा से पंचम पातशाह श्री गुरु अरजन देव जी के महानतम संपादन के प्रयत्नों ने इस संसार के चिंतित लोगों को युग-युगांतर तक अटल रहने वाले और शबद – गुरु के रूप में सन् १६०४ ई. को लासानी ‘ग्रंथ साहिब’ का ईश्वरीय वरदान दिया, जिसे प्रारंभ में ‘आदि ग्रंथ साहिब’ का नाम दिया गया। श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में ६ सिक्ख गुरु साहिबान के अतिरिक्त भारत के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों, धर्मों, संप्रदायों, भाषाओं और संस्थानों से सम्बंधित परमात्मा की स्तुति में लीन १५ भक्तों, ११ भट्टों और गुरु-घर के निकट – प्रेमियों की बाणी भी शोभायमान है, जो ३१ रागों की एक क्रमबद्ध और ५८७२ शब्दों के आकार रूप में, “धुर की बाणी” के रूप में संसार में विद्यमान हुई । श्री गुरु ग्रंथ साहिब का भाईचारक और आध्यात्मिक फलसफा, किसी एक फिर्के, जाति, बिरादरी या भाईचारे की मलकियत नहीं। श्री गुरु अरजन देव जी के बताए अनुसार श्री गुरु ग्रंथ साहिब नामक थाल में पड़ी चार अमूल्य वस्तुएं सत्य, संतोष, विचार और नाम ऐसी वस्तुएं हैं जो मानवता के प्रकाश का आधार हैं, इसलिए श्री गुरु ग्रंथ साहिब की सर्वव्यापकता, सर्वांगता, सरप्रस्ती, मज़हबो-मिलल्त और देशकाल की सारी सीमाएं लांघकर हर समय के सर्व प्रकार के जीवों के लिए सदा-सर्वदा के लिए अगुवाई करती हैं। ऐसा संरक्षण हमारे सौभाग्य का परिचारक है। किसी को नाम लेकर आवाज़ दो तो वह आगे से ज़रूर बोलता है । श्री गुरु ग्रंथ साहिब में भी अकाल पुरख के नामों, गुणों प्रशंसा और शक्तियों का भिन्न-भिन्न प्रकार से वर्णन किया गया है। यदि हम एकाग्र मन होकर श्री गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ करें और बाणी में दिए उपदेशों पर चलें तो यह भी ईश्वर का नाम लेकर पुकारने वाली ही बात है । हमारा निश्चय सच्चे दिल से पुकारने का होना चाहिए, फिर वह मधुरभाषी सज्जन हमारी आवाज़ सुनकर अवश्य बोलेगा, हमारे साथ बातें करेगा और अपना सहारा देकर हमें अपना आशीर्वाद प्रदान करेगाबस हमें अपने अंत:करण का निरीक्षण करके यही देखना है कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब से जुड़ते समय क्या हम उपरोक्त कही श्रद्धापूर्ण, सत्कारित – भावना वाली अवस्था में होते हैं? बहुत अवस्थाओं में दुख से यही कहना पड़ता है कि नहीं, क्योंकि सांसारिक पदार्थों की लालसा में हमारी सारी शक्तियों, विकारों और रुचियों को ऐसे लगता है जैसे भगवान से बेमुख कर दिया हो, जिसके परिणामस्वरूप धर्म और ईश्वर के प्रति हमारा निश्चय बहुत कम हो गया है और जो थोड़ा बहुत है भी वो भी बस, व्यापारिक ढंग का ही है उसमें भी अंदर ही अंदर प्रायः यही लालसा काम कर रही होती है कि गुरु का दरवाज़ा खटखटा कर नाम का दान मांगने के स्थान पर नाशवान परंतु 

लोभायमान माया के सुखों की प्राप्ति के लिए ही प्रार्थना की जाए। यदि लगन और निष्ठा के अनुसार इस बात को अपने ऊपर घटित करके देखें तो हम देखेंगे कि युग-युगांतर तक अटल श्री गुरु ग्रंथ साहिब के बारे में भी (कुछेक निष्ठावान सिक्खों को छोड़कर) हमारा स्नेह, प्यार, सत्कार बिलकुल रस्मी और व्यापारिक किस्म का ही बनकर रह गया है । प्रायः अरदास में प्रार्थना की भावना कम होती है और बार-बार यही कहा जाता है कि सच्चे पातशाह जी, हमारा काम निर्विघ्नता सहित समाप्त हो जाये, यह बात पूरी हो जाये, बीमार स्वस्थ हो जाये आदि । श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी ने श्री गुरु ग्रंथ साहिब को नांदेड़ में १७०८ ई में गुरु-पद सौंपते हुए यह भी फरमाया है कि मेरी आत्मा श्री गुरु ग्रंथ साहिब में और शरीर पंथ में विलीन हो गया है, इसलिए श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी सन्मुख होते समय यह सोचना चाहिए कि हम महानतम शक्ति के समक्ष खड़े हैं। छोटे-से हाकिम के सामने खड़ा होना हो तो हम हाथ जोड़ लेते हैं, हमें नम्रता के, सम्मान करने के सारे ढंग आ जाते हैं, खुशामदें करनी आ जाती हैं परंतु श्री गुरु ग्रंथ साहिब जैसे ईश्वरीय प्रकाश के सत्कार में कई बार हम अनजान और गैर-जिम्मेदार लगने लग जाते हैं चार सौ साल से युगों-युग अटल गुरु की शरण में होने के बावजूद भी हमें गुरु को सत्कार देने का ढंग नहीं आया। हम कुछ धन गुरु के आगे अर्पित करके समझते हैं कि हमने उसे खुश कर दिया है यह हमारी गलतफहमी है यदि हमने सचमुच वाहिगुरु की शरण में आकर आत्मिक आनंद प्राप्त करना है तो हमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब की भावना से ही जुड़ना पड़ेगा, व्यर्थ के वहमों, रीति-रिवाज़ों से कोई प्राप्ति नहीं हो सकती। इस प्रकार या तो हमारी नास्तिकता बढ़ती है या अहंकार और यह अहंकार ही हमें मूल स्रोत का ज्ञान नहीं होने देता। अपने अहंकार को मारकर गुरु की शरण में जाना आवश्यक है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब का हर शब्द हमारे जीवन में से काम, क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह जैसे दुष्ट प्रभावों को नष्ट करके नाम का जाप, सेवा, संतोष आदि की ओर आकर्षित करता है। इस सब कुछ के लिए हमें श्री गुरु ग्रंथ साहिब के आत्मिक अनुभव के साथ एकरस होना पड़ेगा, नेक कमाई के लिए संघर्ष करना पड़ेगा, बांटकर खाना, दूसरे की सहायता करना, मानवता को भगवान का अपना स्वरूप समझकर उसकी सेवा के लिए सदैव तत्पर रहना पड़ेगासरोवर के किनारे पर खड़े होकर परछाई के माध्यम से रस्मी स्नान करने के स्थान पर सरोवर में उतरने से ही बात बनेगी। इसलिए यदि हम परमात्मा के दरबार में पहुंचना चाहते हैं तो हमें गुरबाणी के पाठ और विचार के अनुसार व्यवहार और प्यार करना सीखना होगा । श्री गुरु अरजन साहिब का फरमान है 

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हउ वारिआ अपणे गुरू कउ जिनि मेरा हरि सजणु मेलिआ सैणी ॥ (पन्ना 

हमें बाणी मन से पढ़नी चाहिए। एक श्रद्धालु भक्त की यही रुचि होती है। इस भावना वाले मनुष्य से गुरु दूर नहीं हो सकता, बल्कि वह तो उसके अंगसंग रहता है, चतुराई से उसे कोई प्राप्त नहीं कर सका, गुरबाणी के अर्थ अपनी सोच और आवश्यकता के अनुसार निकालने उचित नहीं हैं। परमात्मा ने तो हमारा वैराग्य देखना है, जो अंतर – मन की तरंग हैदुनिया हमारे बाहरी प्रताप को देखती है, जिसका धर्म से कोई सरोकार नहीं । 

श्री गुरु ग्रंथ साहिब की रचना एक योजनाबद्ध कार्यक्रम का सार्थक रूप है। शब्द – गुरु सारी मानवता का गुरु और पथ-प्रदर्शन है। इसके सृजन में ३६ महापुरुषों का योगदान है जो भारत के भिन्नभिन्न क्षेत्रों, धर्मों संप्रदायों, भाषाओं, और समाजों का प्रतिनिधित्व करते हैं । श्री गुरु नानक देव जी की इच्छा थी कि मानवता को ‘शबद – गुरु’ की छत्रछाया और संपर्क में लाया जाये क्योंकि शबद-गुरु ही ‘पूर्ण गुरु’ है‘धुर की बाणी’ वाला शब्द वास्तव में गुरु का आत्मिक स्वरूप है। यह शबद-गुरु ही हमारा शिक्षा – दाता है, जिसमें गुरु की हस्ती विराजमान हैश्री गुरु नानक साहिब ने भी शब्द को ही अपना गुरु बताया है, जो प्रभु की हस्ती की तर्ज़मानी में साक्षात विराजमान है। शब्द के रूप में ही श्री गुरु नानक साहिब के लिए गुरु की भूमिका स्वयं अकाल पुरख ने निभाई तभी उनमें और अकाल पुरख में किसी प्रकार का भी भेद-भाव नहीं है । गुरु साहिब का यही प्रकाश दस गुरु साहिबान में प्रकाशमान होता हुआ अंत में श्री गुरु ग्रंथ साहिब में विलीन हो गया, इसलिए श्री गुरु ग्रंथ साहिब वाहिगुरु का शाब्दिक स्वरूप हैं। ऐसे परमात्मा रूपी गुरु की संगत करना हमारा पल-पल का कर्म अथवा धर्म है

– डॉ. सरूप सिंघ अलग*