– प्रिं: तेजा सिंघ, डॉ. गंडा सिंघ
श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब के बाबा गुरदित्ता जी, सूरज मल, अणी राय, बाबा अटल राय तथा श्री (गुरु) तेग बहादर साहिब पांच सुपुत्र थे । बाबा अटल राय, अणी राय तथा बाबा गुरदित्ता जी अपने पिता जी के जीते-जी ही परलोक गमन कर गये थे। सूरज मल सांसारिक मामलों में जरूरत से ज्यादा खचित रहने वाला था तथा श्री (गुरु) तेग बहादर साहिब सांसारिक मामलों में दिलचस्पी नहीं लेते थे। बाबा गुरदित्ता जी के धीरमल तथा श्री (गुरु) हरिराय साहिब दो सुपुत्र थे । धीरमल चाहे उम्र में बड़ा था किंतु वफादार नहीं था और गुरु-घर के विरोधियों से मिलकर साजिशें रचता रहता था । मात्र श्री (गुरु) हरिराय साहिब ने ही उन कष्टदायक दिनों में अपने आप को सिक्ख कौम के नेतृत्व के योग्य सिद्ध किया था।
श्री गुरु हरिराय साहिब का जन्म ३० जनवरी १६३० ई (१९ माघ, संवत् १६८६ ) को कीरतपुर साहिब में हुआ था। शुरू से ही उन्होंने अपने अंदर शक्ति तथा कोमलता का एक अच्छा सुमेल दर्शाया था। वे एक शिकारी थे तथा साथ ही इतने दयावान भी कि जिन जानवरों का वे पीछा करते थे या जिनको पकड़ लेते थे, उनको मारते नहीं थे। वे उनको पकड़कर घर ले आते, उनको आवश्यकतानुसार खुराक देते तथा अपने चिड़ियाघर में संभालकर रखते । बाल्यावस्था में एक दिन जब वे बाग में से गुजर रहे थे तो उनके खुले चोगे में फंसकर फूलों की कुछ पत्तियां टूटकर जमीन पर गिर गईं। यह दृश्य वे सहन न कर सके तथा उनकी आंखों में आंसू आ गये। वे बाबा फरीद जी की ये पंक्तियां बड़े शौक से गाया करते थे:
सभना मन माणिक ठाणु मूलि मचांगवा ॥
जे तउ पिरीआ दी सिक हिआउ न ठाहे कही दा ॥
( पन्ना १३८४)
अर्थात् सभी के दिल अमोलक हैं । अगर तुझे (मनुष्य को ) परमात्मा से मिलने की इच्छा है तो किसी का दिल न दुखाना ।
उन्होंने कहा, “मंदिर या मस्जिद की मुरम्मत हो सकती है या पुनर्निर्माण किया जा सकता है परंतु टूटा हुआ दिल मुरम्मत नहीं हो सकता।” वे दर्शन के लिए आने वाले सिक्खों को यही पूछते कि क्या वे लंगर चलाते हैं तथा भोजन बांटकर छकते हैं? दूसरों का भला करने वाली बात पर वे अन्य सब बातों से अधिक खुश होते थे।
यह सब कुछ होते हुए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि श्री गुरु हरिराय साहिब एक सिपाही भी थे। उन्होंने २२०० घुड़सवार सैनिक अपने पास रखे, जिनको जरूरत पड़ने पर एकदम इस्तेमाल किया जा सकता था, परंतु गुरु जी अमन की नीति पर चलने के लिए दृढ़ थे। जब शाहजहां के पुत्र दिल्ली त के लिए लड़ रहे थे तो गुरु जी अपनी सेना को मैदान में लाने के लिए मजबूर हो गये, किंतु उन्होंने इस बात का ख्याल रखा कि खून-खराबा न किया जाये । दाराशिकोह बहुत-से अन्य सूफियों की तरह सिक्ख मत का प्रशंसक था तथा लगता है कि गुरु जी के प्रति उसके दिल में सम्मान था । गुरु जी ने एक बार उसको एक दुर्लभ औषधि भेजकर उसकी जान बचाई थी । औरंगजेब की फौज के आगे-आगे भागता हुआ दाराशिकोह गोइंदवाल साहिब पहुंचा तथा उसने गुरु जी को विनती की कि वे उसको पकड़े जाने से बचायें। गुरु जी ने पीछा कर रही फौज के विरुद्ध दरिया ब्यास का रास्ता रोकने के लिए अपने आदमी भेजे ताकि शरणार्थी शहजादा बच निकलने में सफल हो जाये ।
औरंगजेब को यह बात नहीं भूली । तख्त पर बैठते ही उसने गुरु जी को अपने सामने हाजिर होने के लिए बुलावा भेजा। गुरु जी खुद नहीं गए। उन्होंने अपने पुत्र रामराय को भेजा। औरंगजेब इस बा की तसल्ली करना चाहता था कि सिक्ख मत में इसलाम के विरुद्ध कोई बात तो नहीं है। बादशाह ने रामराय से बहुत सारे प्रश्न पूछे। उनमें से एक प्रश्न श्री गुरु नानक देव जी की बाणी में से एक पंक्ति थी जो मुसलमानों के इस विश्वास से संबंधित थी कि जिन मृतक शरीरों को मृत्यु के पश्चात जला दिया जाता है, वे दोजख (नरक) में जाते हैं। वो पंक्ति इस प्रकार है :
मिटी मुसलमान की पेड़े पई कुम्हिआर ॥
घड़ि भांडे इटा कीआ जलदी करे पकार ॥
( पन्ना ४६६ )
बादशाह ने रामराय को पूछा कि “श्री गुरु ग्रंथ साहिब में इस तरह मुसलमानों की निंदा क्यों की गई है?” रामराय ने उक्त पंक्ति में एक शब्द बदलकर मौका बचा लिया। उसने कहा कि “मुसलमान शब्द कातिब की गलती से लिखा गया है । वास्तव में यह शब्द ‘बेईमान’ है ।” बादशाह खुश हो गया तथा उसने रामराय को दून की वादी में जागीर दे दी।
गुरु जी को अपने इस पुत्र में सच्चाई एवं हौसले की कमी की खबर सुनकर बहुत दुख हुआ । उन्होंने उसको गुरिआई के जिम्मेवार पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया और इस बात के लिए मन बना लिया कि रामराय की जगह गुरगद्दी श्री (गुरु) हरिक्रिशन साहिब को दी जायेगी।
श्री गुरु हरिराय साहिब के समय सिक्ख मत ने अच्छी उन्नति की। उन्होंने एक सन्यासी भक्त भगवान, जो सिक्ख हो गया था, को पंजाब से बाहर पूरब दिशा में सिक्ख मत के प्रचार के लिए भेजा। कैथल तथा बागड़ियां, दो भाई परिवारों को यमुना तथा सतलुज दरियाओं के मध्य वाले इलाके में प्रचार का काम सौंपा गया। ब्यास तथा रावी के मध्य ‘लंमां’ क्षेत्र में भाई फेरू गुरु जी के मसंद के रूप में काम कर रहा था ।
श्री गुरु हरिराय साहिब पूरी योग्यता के साथ लगभग सत्रह वर्ष तक गुरिआई निभाने के उपरांत ६ अक्तूबर, १६६१ ई (५ कार्तिक, संवत् १७१८) को कीरतपुर साहिब में ज्योति जोत समा गये। (“सिक्ख इतिहास’ पुस्तक से सधन्यवाद” )
