सुखमनी साहिब की सार्थकता, उपलब्धि और मनुष्य-जीवन में इसकी उपयोगिता

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December 29, 2025

श्री गुरु ग्रंथ साहिब का संपादन करने वाले सिक्ख मत के पंचम गुरु श्री गुरु अरजन देव जी का जन्म १५ अप्रैल, १५६३ ई को गोइंदवाल साहिब, जिला तरनतारन में हुआ।

आपके पिता जी का नाम श्री गुरु रामदास जी और माता का नाम माता भानी जी था।

आपको फारसी, संस्कृत, पंजाबी और ब्रज भाषा का ज्ञान था। आप में आध्यात्मिकता के साथ-साथ जनसाधारण को उचित एवं सुदृढ़ विचार प्रदान करने की भी क्षमता थी। सिक्ख मत के निर्माण में अपने पूर्ववर्ती गुरु साहिबान की बाणी को सुरक्षित रखने में इनका अहम् योगदान है।

इन्होंने सिरीराग, माझ, गउड़ी, आसा, गूजरी, देवगंधारी, बिहागड़ा, वडहंस, सोरठि, धनासरी, जैतसरी, टोडी, बैराड़ी, तिलंग, सूही, बिलावल, गोंड, रामकली, नटनाराइन, माली गउड़ा,. मारू, तुखारी, केदारा, भैरउ, बसंत, सारंग, मलार, कानड़ा, कलिआन और प्रभाती राग में बाणी की रचना की। आपकी कुछ विशेष बाणियां भी मिलती हैं-“पहरे, बारह माहा, दिन रैणि, बावन अखरी, सुखमनी, थिती, बिरहड़े, गुणवंती, रुती, अंजुलीआ, सोलहे, गाथा, फुनहे,

चउबोले, सवैये और मुंदावणी।

श्री गुरु अरजन देव जी ने सन् १६०१ से लेकर १६०४ ई तक श्री आदि ग्रंथ साहिब की संपादना की। बाणी में निहित विचारों को उचित स्थान पर स्थापित करना प्रतिभाशाली व्यक्तित्व द्वारा ही संभव हो सकता था। श्री गुरु अरजन देव जी की बाणी “सुखमनी साहिब” में उनकी विचारशीलता का बहुपक्षीय उद्घाटन हुआ है। अतः इसका पठन, पाठन, मनन, चिंतन, अधिकांशतः हमारे जीवन की दैनिकचर्या का अंग बन गया है। यह बाणी प्रातः स्मरणीय है, सुख देने वाली है। इसमें वर्णित विचार सुख-रूपी मणियां हैं, इसी लिए इसे “सुखमनी” कहा गया है।

“सुखमनी साहिब” के आरंभ में आदि पुरख को, युगों से जिसकी सत्ता विद्यमान है, – उस ‘जुगादि’ पुरख को, सतिगुरु को और श्री गुरदेव को प्रणाम किया है :

आदि गुरए नमह ॥ जुगादि गुरए नमह ॥ सतिगुरए नमह ॥ स्री गुरदेवए नमह ॥ (पन्ना २६२)

प्रभु के नाम का ठिकाना भक्त का हृदय है। यहीं परमात्मा का विश्राम स्थल है, यहीं परमात्मा को आनंद मिलता है। जीव के लिए सुखकारी है परमात्मा का नाम-स्मरण, क्योंकि सभी जीव इसका लाभ उठाते हैं। जिसके हृदय में परमात्मा के नाम का अंश बसता है उसकी महिमा का बखान नहीं किया जा सकता। जो मनुष्य आपके दर्शनों की अभिलाषा रखते हैं, उनकी संगत में आप मुझे अपने दर्शन देकर कृतार्थ करो। प्रभु के नाम का स्मरण क्यों आवश्यक है? क्योंकि यह अमरता प्रदान करने वाला है, सुखों की मणी है, जो भक्तों के हृदय में विराजमान है।

प्रभु के नाम-स्मरण से विषय, विकार,भ्रम, संताप, भय, ताप, दुख सब मिट जाते हैं। जीवन में किसी प्रकार की बाधा नहीं आती, यम का भय नहीं सताता, अकाल मृत्यु का भय दूर हो जाता है, यहां तक कि जीव का गर्भ में वास नहीं होता अर्थात् प्रभु का स्मरण करने से जीव इस संसार में जन्म नहीं लेता ।

प्रभु का स्मरण सबसे उच्च है। माया-मोह मनुष्य को स्पर्श नहीं कर पाते, आशा पूर्ण होती है, मन की मलिनता दूर होती है। गुरमुखों की जिह्वा पर भगवान का वास है। श्री गुरु अरजन देव जी की यही मनोकामना है कि मैं गुरमुखों

के सेवकों का सेवक बनूं :

नानक जन का दासनि दसना ॥ (पन्ना २६३)

प्रभु का नाम रूपी धन धारण करने वाले ही धनवान हैं। उन्हीं को प्रसिद्धि प्राप्त होती है।

उन्हें किसी के आश्रय की आवश्यकता नहीं पड़ती। प्रभु-नाम से परोपकार की भावना उपजती है, संयम की भावना पैदा होती है, जीवन-शैली पवित्र होती है। संत-कृपा से ही स्मरण की वृत्ति जागती है।

प्रभु का स्मरण करने से हृदय रूपी पुष्प खिला रहता है। यह स्मरण अनहद नाद उत्पन्न करता है। स्मरण से जुड़कर ही सच्चे ज्ञानी अध्यात्म-ज्ञान से भरपूर ग्रंथों की रचना

करते हैं। सम्पूर्ण धरती को आश्रय देने वाला वही प्रभु है। जहां स्मरण है वहां परमात्मा स्वयं बसते हैं। जहां कोई भी सहारा नहीं बनता वहां प्रभु का नाम ही आश्रय देता है। प्रभु का नाम ही माया के आवरण को दूर करने वाला है।

नाम-स्मरण से ही मनुष्य सिध, यती और दाता बन गया। प्रभु-स्मरण करोड़ों पापों का नाश करने वाला है।

प्रभु के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। सिमरन ही भक्त का धन है। प्रभु का नाम पारिजात वृक्ष है। उसका गुणगान ही कामधेनु है। अकाल पुरख के समान दूसरा कोई नहीं है। अहं भावना की जो मैल शरीर को थोड़ा-थोड़ा करके कटा देने से भी दूर नहीं होती वह केवल नाम-सिमरन से ही धुल जाती है। तृष्णा की आग और माया की प्यास भी मिट जाती है।

चतुर्वग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की प्राप्ति के लिए मनुष्य को गुरमुखों की सेवा करनी चाहिए। सतसंग से अहंकार मिट जाता है।

गरीब का धन, निराश्रित का सहारा, आदर-सम्मान के दाता तुम ही हो। सर्वोपरि धर्म है प्रभु-नाम का जाप, पवित्र आचरण और भक्ति । उस प्रभु की कृपा से ही जीव धरती पर सुख-ऐश्वर्य का भोग करता है। मायाग्रस्त मूर्ख जीव रत्न-रूपी नाम-धन को छोड़कर कौडियों के पीछे भागता है। अहंकार, लोभ, मन का मैल उसे ज्ञान की बातें समझने नहीं देता। वैर, विरोध, काम, क्रोध, झूठ, मोह, कुकर्म, लालच, धोखा इसी मार्ग का अनुकरण करते हुए जन्म-जन्मांतर बीत गए हैं। हमारी सभी इंद्रियां जो स्वार्थवश कार्यरत हैं अथवा दूसरों की हानि में रुचि रखती हैं वे सब व्यर्थ हैं, क्योंकि यह शरीर परोपकार हेतु मिला है, इसी लिए मनुष्य को सदैव परमात्मा का धन्यवाद करना चाहिए।

प्रभु की कृपा से ही नाम-स्मरण संभव है। सतसंगति में रहकर विषय-विकारों को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। ब्रह्मज्ञानी के गुणों का मूल्यांकन नहीं हो सकता क्योंकि वही कर्त्ता, कारण और मुक्ति का दाता है। प्रभु को स्वयं में खोजने वाला और अपने मन को शिक्षा देने वाला ही सही अर्थों में पंडित (ज्ञानी, विद्वान) है। प्रभु का नाम सारे रोगों की औषधि है। प्रभु की रजा में राजी रहने वाला ही जीवन-मुक्त कहलाता है। हमारी सभी इंद्रियां परमात्मा से विरक्त हैं, निस्सार हैं। जिस परमात्मा की कृपा से मनुष्य को सुख, ऐश्वर्य मिला है उसका गुणगान करने से उसके सभी दोष ढके रहते हैं। प्रभु की कृपा-दृष्टि में सारे खजाने निहित हैं। सज्जनों की संगति से ही नाम रूपी अगोचर वस्तु प्राप्त होती है। ब्रह्मज्ञानी का स्वरूप कहना कठिन है। सब बुराइयों को छोड़ना ही प्रभु-भक्ति की ओर अग्रसर होना है। नौ खंडों और चारों दिशायों में करोड़ों की संख्या में जीव हैं, परंतु इस सारे जगत का मूल कारण एक अकाल पुरख है। संत-निंदक सदैव तिरस्कृत होता है। प्रभु तमाम शक्तियों से पूर्ण है। जिसके मन में प्रभु का विश्वास है उसके मन में सच्चा ज्ञान है। प्रभु के भजन के बिना कोई दूसरी वस्तु साथ नहीं जाती।

प्रभु के चरण-कमलों को हृदय में धारण करने पर जन्म-जन्मों के पाप कट जाते हैं। जिस मनुष्य ने पलक झपकने के बराबर भी प्रभु के गुण गाए हैं उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई है। जिस मन में छलरहित अविनाशी परमात्मा का निवास है वहां माया किस प्रकार रह सकती है?

आठों पहर प्रभु का दर्शन करने से, उसे अपने साथ महसूस करने से अज्ञानता मिट जाएगी। वह अकाल पुरख घट-घट की जानने वाला है। वह अनंत सभी भुवनों में मौजूद है। नश्वर वस्तुओं रूपी आशाओं की लहरें छोड़कर प्रभु-भक्ति में मन लगाना चाहिए। प्रभु सदाचारी व्यक्ति के माथे पर प्रकट होते हैं। प्रभु के नाम-रूपी धन से स्थिर सुख, मन का टिकाव, रिद्धियां-सिद्धियां, नौ भंडार, बुद्धि, ज्ञान और कुशलता उस मनुष्य में आ जाती है तथा विद्या, तप, योग, अकाल पुरख का स्मरण, ज्ञान, स्नान, चतुर्वग (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति), हृदय कमल में परमात्मा का प्रस्फुटन, सर्वत्र व्याप्त होने पर भी तटस्थता, सुंदरता, बुद्धिमता सबको समदृष्टि से देखना, ये सारे फल उस नाम-धन को प्राप्त करने वाले मनुष्य को अपने आप ही प्राप्त हो जाते हैं।

गुणों के खजाने को जपने से जीव यमों से भी बच जाता है। सभी मतों का निचोड़ प्रभु का नाम ही है। उसके मन से दुख, रोग, डर, भ्रम का नाश होता है। इन्हीं गुणों के कारण ही प्रभु का नाम सुखों की मणी है।

“सुखमनी साहिब” सुखों की मणियों को स्वयं में संजोए एक ऐसी बाणी है जो मनुष्य को प्रभु के नाम-स्मरण को प्रेरणा देती है। यह प्रभु से दूर रहने वालों के लिए आकर्षण-शक्ति उत्पन्न करने – वाली है। तर्क के आधार पर श्री गुरु अरजन देव जी ने प्रभु-नाम रूपी “सुखमनी” की सार्थकता, उपलब्धि और मनुष्य-जीवन में इसकी उपयोगिता को भली-भांति सरल और सरस भाषा में जनसाधारण तक प्रेषित किया है।

-डॉ. मधु बाला