भंडि जंमीऐ भंडि निमीऐ भडि मंगणु वीआहु ।। भंडछु होवै दोसती भंडहु चलै राहु ॥
भंडु मुआ भंडु भालीऐ भंडि होवै बंधानु ॥
सो किउ मंदा आखीऐ जितु जंमहि राजान ॥ भंडहु ही भंडु ऊपजै भंडै बाझु न कोइ ॥
नानक भंडै बाहरा एको सचा सोइ ॥
जितु मुखि सदा सलाहीऐ भागा रती चारि ॥
नानक ते मुख ऊजले तितु सचै दरबारि ॥(पन्ना ४७३)
आसा की वार में अंकित इस श्लोक में श्री गुरू नानक देव जी महाराज स्त्री-निंदा के रुझान को ज़ोरदार रूप में नकारते हुए स्त्री आधारित मानवीय सामाजिक व्यवस्था के तथ्य को हमारे दृष्टिगोचर करते हुए उस प्रभु के बनाये स्त्री-पुरुष संयोग के विधान को पूर्णतः स्वीकार करने हेतु पुरुष-समाज को सामाजिक और आध्यात्मिक दिशा बख़्शिश करते हैं।
गुरू जी फरमान करते हैं कि ‘भंड’ अथवा ‘स्त्री’ से जीव अथवा मनुष्य जन्म लेता है। जन्म लेने से पहले बच्चे का शरीर स्त्री की ही कोख में बनता है। स्त्री से ही सगाई और फिर विवाह होता है। स्त्री से और कइयों के साथ नाता जुड़ता है। स्त्री से ही रास्ता चलता है अर्थात जगत-उत्पत्ति का सिलसिला चलता है। स्त्री अथवा पत्नी की मृत्यु हो जाने पर पुरुष अन्य स्त्री की भाल में हो जाता है। सभी रिश्ते-नाते का संबंध भी तो स्त्री से ही बनता है। अतः स्त्री पारिवारिक जीवन का मूल आधार है चूंकि उसके बिना पारिवारिक– सामाजिक व्यवस्था आगे नहीं चल सकती। तो फिर स्त्री को बुरी क्यों कहें? स्त्री से राजन तक भी जन्म लेते हैं भाव मानव समाज में सर्वशक्तिशाली माने जाते राजा भी मूलतः स्त्री की कोख से ही जन्म लेते हैं। कहने से भाव हरेक मनुष्य स्त्री (मां) का ही पुत्र होता है।
गुरू जी आगे फरमान करते हैं कि स्त्री भी स्त्री से ही जन्म लेती है। स्त्री के बिना कोई नहीं हो सकता-न ही पुरुष न ही स्त्री। यदि स्त्री से कोई जन्म नहीं लेता तो वह है सच्चा मालिक प्रभु। मनुष्य-मात्र चाहे वह पुरुष रूप में है, चाहे स्त्री रूप में, जो भी अपने मुंह से उस सच्चे मालिक प्रभु की सच्ची स्तुति करता है उसके माथे के भाग्य उज्जवल हैं। हे नानक ! जो मुख प्रभु की स्तुति करते हैं वही प्रभु-दरबार में उज्जवल हैं।
सुरिंदर सिंह
