स. गुरदीप सिंघ*
‘घल्लूघारा’ शब्द का सम्बंध अफगानी भाषा के साथ है । ‘घल्लूघारा’ का मतलब है– सब कुछ बर्बाद हो जाना। मुगल बादशाह अहमदशाह अब्दाली २० वर्ष की आयु में बादशाह बन गया था । उसने भारत पर दस बार आक्रमण किया। वह अपने जासूसों को तंबाकू आदि का व्यापार करने के बहाने भारत भेजता, जो भारत आकर यहां का सारा भेद ले जाते। इन्हीं जासूसों के द्वारा ही बहुत सारे भारतीयों को तंबाकू की त लग गई। उसने सन् १७६२ ई में जो आक्रमण भारत पर किया, उसका मुख्य उद्देश्य सिक्खों की शक्ति को नष्ट करना था। अब्दाली के सिक्खों पर किए गए इस आक्रमण को सिक्ख इतिहास में ‘बड़ा घल्लूघारा’ के नाम से याद किया जाता है। यह अब्दाली का छठा आक्रमण था । अहमदशाह अब्दाली अपने २२०० सैनिकों के साथ जनवरी, १७६२ ई में रोहतास के मार्ग से भारत में दाखिल हुआ। अब्दाली और उसके सैनिकों के हौसले बुलंद थे क्योंकि इससे पहले जनवरी १७६१ ई में अब्दाली ने मराठों को पानीपत की तीसरी लड़ाई में कम- तोड़ पराजय दी थी ।
तुर्कों को यदि कोई ललकारता था तो वे सिक्ख सरदार ही थे। सिक्ख अन्य धर्म के लोगों की बहू- बेटियों को मुगल सिपाहियों के कब्ज़े से छुड़ाकर सुरक्षित उनके घरों तक पहुंचा देते और लूटा हुआ माल भी मुगलों से वापिस ले आते। मुगल सिपाही सूबेदार के पास जाकर शिकायत करते। सिंघों ने कई बार मुगल सूबेदारों, जरनैलों को उल्टे पांव भगाया था। अब्दाली को सिंघों की चढ़दी कला का पता चला। उसने नूरदीन की अगुआई में पंजाब में फुर्तीली फौज भेजी, जिसका सामना चिनाब दरिया के किनारे स. चढ़त संघ शुकरचक्किया के साथ हुआ। ज़बरदस्त टकराव से मुगलों में भगदड़ मच गई। काफी मुगल सेना भाग कर वापिस चली गई ।
सन् १७६१ की दीवाली समूचे सिक्ख पंथ ने धूमधाम से मनाई। स. जस्सा सिंघ आहलूवालिया की प्रधानगी में मीटिंग हुई। गुरमते पास हुए, सिक्ख कौम की चढ़दी कला के लिए विचारें हुईं। सबको बताया गया कि जंडियाला का आकलदास मुखबिर है और वह सिक्खों की कार्यवाही की सारी रिपोर्ट सरहिंद के कमांडर जैन खां को देता है। जैन खां सारी सूचनाएं अब्दाली तक पहुंचाता है।
जैन खां ने आकलदास के साथ मिलकर अब्दाली को सिक्खों पर हमला करने हेतु संदेश भिजवाया। सिक्खों को पता चल गया कि अब्दाली बहुत बड़ी फौज लेकर केवल सिक्खों के साथ ही युद्ध करने आ रहा है। सिक्खों का ख़्याल था कि अब्दाली चार-पांच दिनों तक आयेगा, इसलिए वे अपने परिवारों को सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचाने हेतु सतलुज पार के क्षेत्र की ओर चल पड़े। सिक्खों के अंदाजे के विपरीत अब्दाली पंजाब दो दिन में ही पहुंच गया। सिक्खों को उसकी कार्यवाही का पता न लग सका । मलेरकोटला के जंगलों में रात के समय सिंघ विश्राम कर रहे थे । अब्दाली के सिपाहियों ने लाल रंग की वर्दी पहनी हुई थी और दूसरी तरफ केसू के पौधों पर भी लाल रंग के फूल खिले हुए थे। सुबह चार बजे का समय था। अब्दाली की सेना ने मलेरकोटला की तरफ से अचानक हमला कर दिया। सिंघों को जब दुश्मन की फौज का पता चला तो वे जत्थेदारों की अगुआई में एक तूफान की तरह उठे और जो भी हथियार या शस्त्र आदि हाथ लगे उसी से मुकाबला करने लगे। अचानक हुए इस हमले से सिंघों का काफी जानी एवं माली नुकसान हुआ। जैन खां की टक्कर सरदार शुकरचक्किया के साथ हुई। अहमदगढ़ की ओर से स. जस्सा सिंघ अपने सिंघों के साथ अब्दाली के जवानों को पछाड़ रहे थे। स. राम सिंघ, स. बघेल सिंघ अपने सिंघों के साथ अब्दाली के प्रमुख जवानों से जूझ रहे थे। सिक्ख जवान जख़्मी होकर भी तन-मन से लड़ रहे थे । सिक्ख अपने परिवारों के गिर्द फौलादी दीवार बनकर डटे हुए थे। बेशक सिंघों पर हुआ यह हमला अचानक था मगर सिंघ मुकाबला करने में किसी किस्म की कसर नहीं छोड़ रहे थे। सिंघों के साथ उनके परिवार होने के कारण शहीदों में महिलाओं, बच्चों एवं बूढ़ों की संख्या सर्वाधिक थी। बचे-खुचे सिंघ काफिले के रूप में बरनाला की तरफ चले गये। इस घमासान की लड़ाई में ३०-३५ हज़ार सिंघ शहीद हो गए। सिक्ख इतिहास को नया मोड़ प्रदान करने वाली यह घटना ५ फरवरी, १७६२ ई को मलेरकोटला के निकट कुप्प रुहीड़ा की धरती पर घटित हुई। सिक्ख इतिहास में यह घटना ‘बड़ा घल्लूघारा’ के नाम से जानी जाती है।
स. जस्सा सिंघ आहलूवालिया के शरीर पर २२ जख़्मों और स. चढ़त सिंघ के शरीर पर अनगिनत जख़्मों के निशान थे। बड़े घल्लूघारे के थोड़े समय बाद ही १७६३ ई में सिंघों ने सरहिंद पर पुनः कब्ज़ा कर लिया। सरहिंद से लगभग ७ मील की दूरी पर स्थित गांव पीर जैन में एक ही झड़प में जैन खां को मौत के घाट उतार दिया। मुखबिर आकलदास को भी मौत की नींद सुला दिया। बड़े घल्लूघारे में बेशक सिंघों का जान-माल का भारी नुकसान हुआ मगर सिंघों ने पंजाब में अब्दाली की दाल नहीं गलने दी। सिंघों के धैर्य और बुलंद हौसलों से भयभीत अब्दाली लाहौर की तरफ भाग खड़ा हुआ और बाद में अफगानिस्तान की ओर चला गया। इस प्रकार मुगल साम्राज्य की जड़ें खोखली होनी शुरू हो गईं और खालसा राज्य की पुन: सृजना के लिए आधार-भूमि तैयार हो गई। सिंघ उसी मार्ग पर चल पड़े जो सिक्ख राज्य की स्थाप्ति कीतरफ जाता था ।
