-डॉ. कशमीर सिंघ ‘नूर’
जिस समाज में तथाकथित ऊंची जाति के लोगों द्वारा अन्य लोगों के साथ अमानवीय, अति घटिया, पशुओं के तुल्य व्यवहार सदियों तक किया जाता रहा हो, उस समाज में भक्त रविदास जी के जन्म लेने की घटना अत्यंत महत्त्वपूर्ण तथा क्रांतिकारी घटना थी । भक्त रविदास जी ऐसे महान भक्त, महान समाज-सुधारक और महान क्रांतिकारी पथ-प्रदर्शक हुए हैं, जिन्होंने अपने विचारों से, कार्यों से हमारे समाज एवं जीवन में नई क्रांति लाने का काम किया। उन्होंने नई एवं प्रभावशाली क्रांति की नींव रखी। भक्ति लहर क्रांतिकारी लहर बन गई। श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी के समकालीन संत करम दास के कथनानुसार भक्त रविदास जी का जन्म दुखी लोगों के कल्याण के लिए हुआ था :
संमत चौदां सैतीसा, माघ सुदी पंद्रास ।
दुखिओं के कल्याण हित, प्रगटे श्री रविदास ।
इस तरह भक्त रविदास जी का जन्म संवत् १४३३ अर्थात् सन् १३७६ ई में हुआ माना जाता है । माघ मास की पूर्णिमा वाले दिन रविवार को उन्होंने जन्म लिया था, शायद इसीलिए इनके माता-पिता ने इनका नाम ‘रविदास’ रखा। इनके माता-पिता के नामों के बारे में विद्वान एकमत नहीं हैं। इनके पिता का नाम श्री राघव (रघुनाथ मल्ल) था, जिन्हें बाबा संतोख भी कहा जाता है। भक्त रविदास जी की माता का नाम माता करमा देवी था, जिन्हें माता कलसां भी कहा जाता है । इस बात की पुष्टि ‘भविष्य पुराण’ ग्रंथ से होती है। ‘भक्त रविदास जी का जन्म – स्थान बनारस (काशी) था और भक्त कबीर जी इनके समकालीन थे, जो कि उस समय बनारस में निवास करते थे। भक्त रामानंद जी, जो कि ब्राह्मण थे, इन दोनों महान् समाज-सुधारक संतों के आध्यात्मिक गुरु थे । भक्त रामानंद जी स्वयं भी बहुत बड़े समाज सुधारक थे। वे जात-पात, ऊंच- नीच, भेदभाव, छुआ-छूत को बिलकुल नहीं मानते थे ।
भक्त रविदास जी की क्रांतिकारी विचारधारा एवं भक्ति से प्रभावित होकर चित्तौड़ राज्य का राजा राणा सांगा इनकी शरण में आया । राणा की पत्नी झाली और पुत्र- वधू मीरा ने इनसे दीक्षा प्राप्त की । राणा सांगा की विनम्रता भरी विनती स्वीकार कर भक्त रविदास जी चित्तौड़ के ‘राज- गुरु’ बन गए।
उस समय तथाकथित ऊंची जातियों वाले लोग दलितों पर बहुत अत्याचार किया करते थे। उन्हें हर तरह से प्रताड़ित किया करते थे । प्रभु भक्ति, पूजा-पाठ करने पर भी कठोर दंड दिया करते थे। ऐसे में भक्त रविदास जी ने निर्भीकतापूर्वक निर्गुण भक्ति लहर चलाई; परमात्मा की अराधना की, सतिनामु का जाप किया। शंखनाद किया और हर तरह के कर्मकांडियों को ललकारा तथा उनके सामने चट्टान की तरह डटकर खड़े हो गए। दलितों को शेरदिल बनाया । अत्याचार, जात-पांत के भेदभाव के विरुद्ध जूझने के लिए दलितों में जज़्बा-ओ-जोश भरा। सामाजिक क्रांति व आंदोलन हेतु उन्हें प्रेरित किया । भक्त रविदास जी ने मज़बूत समाज का निर्माण किया ।
उस समय पंडित व पुजारी पाठ-पूजा, रीतियों – नीतियों के नाम पर लोगों का धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक शोषण किया करते थे। भक्त रविदास जी के पास जो भी धन व अन्न आता, वे उससे जरूरतमंदों की सेवा का प्रबंध करते। कट्टरपंथी लोग उन्हें अच्छा नहीं समझते थे और उनका विरोध करते थे। भक्त जी अपनी धुन एवं उद्देश्य के पक्के थे। वे अपने विरोधियों की परवाह नहीं करते थे। भक्त रविदास जी दृढ़ निश्चय व दृढ़ इरादे वाले थे। उन्होंने लगातार लोक-कल्याण के कार्य जारी रखे।
‘पीपा जी परचई’ साखी ( साक्षी) से साक्ष्य मिलता है कि भक्त रविदास जी अपने आध्यात्मिक गुरु भक्त रामानंद जी के संग शुभ कार्यों हेतु दूर-दूर तक जाते थे । तीर्थ स्थलों पर एकत्रित लोगों के बीच हक, सच की अलख जगाया करते थे । प्रभु के नाम – सिमरन का, नेक कमाई करने का, परोपकारी काम करने का उपदेश दिया करते थे ।
भक्त रविदास जी महान रहबर और संत थे। उन्होंने सभी मेहनतकशों का सम्मान बढ़ाने हेतु, समाज में श्रम को ऊंची जगह दिलाने हेतु स्वयं सच्चा व नेक श्रम किया। वर्तमान समय के कई तथाकथि की तरह वे कोई दिखावा नहीं करते थे । यह तो सबको पता है कि वे जूतियां गांठने का काम करते थे। भक्त रविदास जी के पवित्र एवं उच्च कोटि के व्यक्तित्व व जीवन से प्रेरणा तथा आगवानी ली जा सकती है। उनकी बाणी का पवित्र व अनमोल फरमान है :
चमरटा गांठ न जनई ॥
लोग गठावै पनही ॥१॥ रहाउ ॥
आर नही जिह तोपउ ॥
नहीं रांबी ठाउ रोपउ ॥१॥
लोग गंठि गठि खरा बिगूचा ॥
हउ बिनु गांठे जाइ पहूचा ॥२॥
रविदासु जपै राम नामा ॥
मोहि जम सिउ नाही कामा ॥३॥
( पन्ना ६५९)
‘भक्त रविदास जी फरमान करते हैं कि मेरे पास ऐसी कोई रंबी (खुर्पी) नहीं जिससे मैं लोगों की मेहनत-मशक्कत द्वारा अर्जित धनराशि को काटूं और न ही ऐसी कोई आर है, जिससे कमाई को अपने शरीर के साथ गांठूं। ये तथाकथित धर्मी लोग अपने शास्त्रों (ग्रंथों) के हथियारों से लोगों की नेक कमाई को काटकर अपने शरीर तुल्य जूती ( पनही) के साथ गांठते हैं अर्थात् ये निठल्ले लोग बिना मेहनत – मज़दूरी किए अपनी तोंद बढ़ाए जाते हैं। भक्त जी फरमाते हैं कि जिन यमदूतों की ये लोग दुहाई देते हैं, मेरा उनसे कोई संबंध नहीं, मगर ये लोग अपने गुनाहों की सज़ा अवश्य पाएंगे। भक्त जी नम्रता के पुंज थे। वे फरमान करते हैं:
मेरी जाति कुट बांढला ढोर ढोवंता
नितहि बानारसी आस पासा ॥
अब बिप्र परधान तिहि करहि डंडउति
तेरे नाम सरणाइ रविदासु दासा ॥ ( पन्ना १२९३ )
अर्थात् मेरी जाति के लोग बनारस के आस-पास से मुर्दा पशुओं को ढोते हैं। मेरे रोम-रोम में परमात्मा का निवास है। मैं उसका भजनीक हूं। यही कारण है कि समाज का (मुखिया) माना गया व्यक्ति ( ब्राह्मण) मुझे दंडवत् प्रणाम करता है ।
समाजवाद के सपने को साकार करने हेतु और बढ़िया समाज के निर्माण हेतु भक्त रविदास जी की बा से प्रेरणा व आगवानी प्राप्त की जा सकती है :
बेगम पुरा सहर को नाउ ॥
दुखु अंदोहु नही तिहि ठाउ ॥
नां तसवीस खिराजु न मालु ॥
खउफु न खता न तरसु जवालु ॥१॥
अब मोहि खूब वतन गह पाई ॥
ऊहां खैरि सदा मेरे भाई ॥१॥ रहाउ ॥
काइमु दाइमु सदा पातिसाही ॥
दो न सेम एक सो आही ॥
आबादानु सदा मसहूर ॥
ऊहां गनी बसहि मामूर ॥२॥
तिउ तिउ सैल करहि जिउ भावै ॥
महरम महल न को अटकावै ॥
कहि रविदासु खलास चमारा ॥
जो हम सहरी सुमीतु हमारा ॥३॥ ( पन्ना ३४५)
उन्होंने ‘बेगमपुरा शहर’ के रूप में सारे संसार को ही उसका निवासी बनाया है, जहां किसी भी प्रा को किसी प्रकार का गम या फिक्र न हो तथा न ही कोई दुख तकलीफ हो । किसी प्रकार का कर अदा करने का कष्ट न उठाना पड़े । न कोई भय हो, न खता यानि भूल हो । किसी की भी दयनीय दशा न हो । वे फरमान करते हैं कि मैंने उन स्थानों की अच्छी तरह खोज की है, जहां पर सदैव खैरियत है। वहां की सत्ता (बादशाही) सदैव कायम रहने वाली है। वहां सभी लोग एक समान हैं । कोई छोटा बड़ा नहीं। प्रकार का भेदभाव नहीं है। वहां का हर निवासी हद दर्जे का सम्माननीय है; इज्जत व आदर वाला है। उन्हें हर जगह आने-जाने की छूट यानि आज़ादी है। उन सबमें आत्मीय प्रेम का नाता है। एक-दूसरे के दिलों के महिरम (मीत ) हैं । हृदय से प्यार करने वाले हैं तथा एक-दूसरे के रास्ते में रुकावट नहीं डालते हैं। भक्त रविदास जी फरमाते हैं कि उस बेगमपुरा शहर का हर निवासी मेरा मीत भावार्थ मित्र है, सखा है।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब में भक्त रविदास जी की बाणी दर्ज है। श्री गुरु अरजन देव जी ने भक्त कबीर जी, भक्त सैण जी और भक्त नामदेव जी के साथ-साथ भक्त रविदास जी का सम्मान करते हुए फरमाया है:
भलो कबीरु दासु दासन को
ऊतमु सैनु जनु नाई ॥
ऊच ते ऊच नामदेउ समदरसी
रविदास ठाकुर बणि आई ॥
( पन्ना १२०७ )
भावार्थ कि भक्त रविदास जी के रूप में स्वयं ठाकुर यानि परमात्मा इस संसार में आए। भक्त रविदा जी परमात्मा में अभेद थे।
भक्त रविदास जी के संबंध में भक्त कबीर जी इस प्रकार फरमान करते हैं :
हरि सो हीरा छाडि कै
करहि आन की आस ॥
ते नर दोजक जाहिगे
सति भाखै रविदास ॥
( पन्ना १३७७)
अर्थात् जो व्यक्ति हरि जैसे हीरे को छोड़कर किसी अन्य की ओर देखता है, वह सीधा दोजख में जाता है। यह बात भक्त रविदास जी अपने मुख से कहते हैं ।
संवत् १५८४ (१५२६ ई) में वैसाखी के दिन चित्तौड़गढ़ में गांभीरी नदी के किनारे क्रांतिकारी समाज- सुधारक, युगदृष्टा भक्त रविदास जी परम पिता परमात्मा की ज्योति में लीन हो गए। इस संबंध में कवि अनंतदास अपनी परचई में लिखते हैं :
पंद्रह से चउ असी, चीतौरे भई भीर ।
जरजर देह कंचन भई, रवि रवि मिलयो सरीर ॥ २२०॥
भक्त रविदास जी की १५१ वर्ष आयु थी । उनकी बाणी हमें हर समय मार्गदर्शन देती है; समानता, सद्भावना, “भाईचारा, दया, शांति, लोक-कल्याण का संदेश देती है। उन्हें कोटि-कोटि नमन !
