बंदी छोड़ दिवस

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October 22, 2025

सिक्ख गुरु साहिबान के जन्म तथा ज्योति-जोत समाने के दिवसों (गुरुपर्वो) के अलावा होला-महल्ला, वैसाखी तथा बंदी छोड़ दिवस (दीपावली) सिक्ख जगत के प्रमुख त्योहार हैं, जो प्रत्येक वर्ष सिक्ख संगत बड़ी श्रद्धा तथा उत्साह से मनाती है। होला महल्ला तथा वैसाखी तख़्त श्री केसगढ़ साहिब, श्री अनंदपुर साहिब (ज़िला रोपड़) में तथा बंदी छोड़ दिवस श्री दरबार साहिब, श्री अमृतसर में मनाया जाता है। हस्त लेख में हम बंदी छोड़ दिवस सम्बंधी विचार करते हैं।
सिक्खों के लिए इस दिवस का बड़ा अहम ऐतिहासिक महत्त्व है। सिक्खी रहन-सहन तथा पर्वो के साथ मौलिकता एवं यथार्थवाद जुड़ा है अर्थात् सिक्ख संस्कारों तथा त्योहारों के पीछे ऐतिहासिक प्रमाणिकता है, जिससे अंधविश्वास तथा फिजूल के कर्मकांडी जीवन से ऊपर उठी हुई जीवन की सार्थकता जुड़ी है।
सिक्ख गुरु साहिबान ने संगत के रूप में आपसी मेल-मिलाप के महत्त्व को उजागर किया है। गुरबाणी सिक्ख को संगत में मिल बैठने, आपसी मतभेद दूर करने तथा ऊंच-नीच का भेद मिटाकर सांझीवालता कायम करने का पैग़ाम देती है। सिक्ख-त्योहारों पर होने वाले विशेष समारोहों के पीछे भी मुख्य भावना यही होती है। गुरबाणी में फरमान है :

होइ इकत्र मिलहु मेरे भाई दुबिधा दूरि करहु लिव लाइ ॥(११८५)

मिलबे की महिमा बरनि न साकउ नानक परे परीला॥(४९८)

सिक्ख धर्म में ‘बंदी छोड़ दिवस’ के नाम से विख्यात इस पर्व की पृष्ठभूमि छठम पातशाह श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब जी से जुड़ती है। भाई कान्ह सिंघ नाभा रचित ‘महान कोश’ के पन्ना ४७६ पर दर्ज इंदराज के मुताबिक सिक्खों में इस पर्व पर दीये जलाने की रस्म बाबा बुड्ढा जी ने चलाई, क्योंकि श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब दीपावली वाले दिन ग्वालियर के किले से श्री रिहा हुए थे, इसलिए खुशी में रोशनी की गयी।

कई ऐतिहासिक हवालों के मुताबिक मुगल बादशाह जहांगीर ने श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब को इसलिए गिरफ्तार किया था क्योंकि उन्होंने श्री गुरु अरजन देव जी को मुगल राज्य द्वारा किए गए जुर्माने की अदायगी नहीं की थी। किंतु यह बात सही नहीं लगती। एक अन्य मत इस सम्बंधी ज्यादा सार्थक लगता है कि श्री गुरु अरजन देव जी की शहादत के बाद सिक्ख सिर्फ ‘संत’ ही नहीं रहे थे, वे ‘सिपाही’ भी बन गये थे। छठम पातशाह द्वारा ‘मीरी-पीरी’ की दो कृपाणें धारण करने तथा सिक्खों के श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब की अगुआई तले शस्त्रधारी होने को इतिहासकारों ने एक ऐतिहासिक मोड़ कहा है।

प्रो: एच. आर. गुप्ता के अनुसार, “सिक्खों के शस्त्रधारी होने पर मुगल हकूमत को भय लगने लग गया था कि सिक्ख कहीं बगावत न कर दें। जहांगीर बादशाह ने श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब को गिरफ्तार करके ग्वालियर के किले में नज़रबंद कर दिया, जहां उस समय के बागी राजाओं (जिनमें से ज्यादातर हिंदू थे) को भी बंदी बनाया हुआ था।

एक अन्य रिवायत के अनुसार गुरु-घर के विरोधी चंदू ने भी श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब के खिलाफ जहांगीर को काफी भड़काया, जिस पर जहांगीर ने श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब को गिरफ्तार करके ग्वालियर के किले में कैद कर लिया। गुरु साहिब के इस किले में बंदी रहने की अवधि के बारे में विद्वानों का एक मत नहीं। कोई यह समय ज्यादा बताता है तो कोई कम। खैर, जब बादशाह जहांगीर की संतुष्टि हो गयी तो उसने गुरु साहिब की रिहाई के हुक्म जारी किए तथा गुरु साहिब के प्रति बड़े इज्जत-मान का प्रकटावा किया। गुरु साहिब के कहने पर ही अन्य कैदी (बागी) राजाओं, जिनकी संख्या ५२ के लगभग बतायी जाती है, भी जहांगीर को रिहा करने पड़े। इसी कारण श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब को ‘बंदी छोड़ दाता’ तथा इस दिवस को ‘बंदी छोड़ दिवस’ कहा जाता है।

दूसरे बंदियों की रिहाई ने जहां गुरु जी के यश में बढ़ावा किया, वहीं उन्होंने उदारता की गवाही भरते हुए सांप्रदायिकता तथा कौमप्रस्ती से कहीं आगे बढ़कर सर्वसांझीवालता का सबूत दिया। श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब दीपावली के दिन ग्वालियर के किले से रिहा होकर श्री दरबार साहिब, श्री अमृतसर पहुंचे तो सिक्खों ने दीपमाला करके, आतिशबाज़ी चलाकर, मिठाइयां बांटकर खुशी का प्रकटावा किया, जिस पर प्रत्येक वर्ष सिक्ख इस दिवस की याद को ‘बंदी छोड़ दिवस’ के रूप में ताज़ा करते हैं।

बंदी छोड़ दिवस का सम्बंध सिक्खों की एक और अहम शख़्सियत भाई मनी सिंघ जी से भी जुड़ता है। सिक्ख मर्यादा के अनुसार श्री अमृतसर साहिब के दर्शन-स्नान का सिक्खों के लिए विशेष महातम माना जाता है, तभी रोज़ाना ‘अरदास’ में श्री अमृतसर साहिब के दर्शन-स्नान का विशेष ज़िक्र आता है। गुरबाणी में इसकी महानता सम्बंधी फरमान है :

डिठे सभे थाव नही तुधु जेहिआ ॥
बधोह पुरखि बिधातै तां तू सोहिआ ॥
वसदी सघन अपार अनूप रामदास पुर ॥
हरिहां नानक कसमल जाहि नाइऐ रामदास सर ॥
(१३६२)

सिक्खों द्वारा इस अहम दिवस पर श्री दरबार साहिब, श्री अमृतसर ‘सरबत्त खालसा’ के रूप में एकत्रित होकर पंथक हितों के लिए ‘गुरमते’ के रूप में महत्त्वपूर्ण फैसले लेने की प्रथा थी। दशम पातशाह के ज्योति-जोत समाने के बाद इस समारोह में और भी बढ़ोत्तरी हो गयी। उनके ज्योति-जोत समाने के उपरांत कुछ समय तो पंथक अगुआई का कार्य बाबा बंदा सिंघ बहादर के सुपुर्द रहा। बाबा बंदा सिंघ बहादर की शहीदी के उपरांत यह कार्य गुरु-घर के अनन्य सिक्ख भाई मनी सिंघ जी के सुपुर्द हो गया।
जैसे-जैसे समय व्यतीत होता गया, समय की हकूमत सिक्खों पर कड़ी निगरानी रखने लगी। सिक्खों के कहने पर भाई मनी सिंघ जी ने मुगल हकूमत की ओर से बंदी छोड़ दिवस पर श्री दरबार साहिब, श्री अमृतसर में धार्मिक समारोह करने के लिए अनुमति ले ली, जिसके बदले भाई मनी सिंघ जी ने सरकारी खज़ाने में कुछ राशि टैक्स के रूप में जमा करवानी स्वीकार कर ली। रतन सिंघ (भंगू) के ‘प्राचीन पंथ प्रकाश’ के अनुसार :

दुआली को थो मेला लाया, तुरकन ने थो टका चुकाया।
दस हज़ार रुपय्या ठहिराया, टकन खातर तिन दरोगा बहाया ॥२०॥
(पृष्ठ २९६)

किंतु जब भाई मनी सिंघ जी को मुगलों की इस चाल का पता चल गया कि मुगल हकूमत सिक्खों के इस समारोह के समय अचानक हमला करके सिक्खों का सामूहिक कत्लेआम करने की साजिश रच रही है तो उन्होंने सभी जगह संदेश भेजकर सिक्खों को बंदी छोड़ दिवस पर श्री अमृतसर इकट्ठा होने से मना कर दिया, जिस कारण समारोह न हो सका तथा भाई मनी सिंघ जी ने मुगल खज़ाने में टैक्स के रूप में राशि जमा न करवाई।

मुगल हकूमत ने इसी बहाने भाई साहिब को बंदी बना लिया तथा उनको इसलाम धर्म कबूल करने के लिए मज़बूर किया, किंतु भाई साहिब का सिक्खी सिदक कायम रहा और उन्होंने मुगल हकूमत को जवाब दिया : मैं बंद बंद अब चहीं कटाया, इम कहिकै उन इमै अलाया।
अब पैसे हम पै कछु नाहीं, लै जान हमारी नगदी माहीं। (पृष्ठ २९८)

तो इस सम्बंधी काज़ियों-मुल्लाओं ने फतवा दे दिया:

खान कहयो, होहु मुसलमान, तद छोडेंगे तुमरी जान ।
सिंघन कहयो, हम सिदक न हारै, कई जनम पर सिदक सु गारें ॥४०॥
तब काज़ी ने जिम ही कहयो, तिवें मुफत ने फतवा दयो ॥४१॥
बंद बंद जुदो सिंघ मनी करावो, इम कर चहीयत जगत दिखावो।
होनी सी सो उन मुख बोली, उन मुख भी स्राप कुंजी खोल्ही ॥४२॥
(पृष्ठ २९८)

इस तरह भाई साहिब भाई मनी सिंघ जी १७९१ बिक्रमी अर्थात् १७३४ ई को लाहौर के नखास चौक में शहीद कर दिए गये। कुछ विद्वान लिखते हैं कि भाई मनी सिंघ जी को बंदी छोड़ दिवस पर शहीद किया गया, किंतु ऐतिहासिक हवाले इसकी पुष्टि नहीं करते। विशेष बात इस सम्बंधी यह है कि भाई साहिब की शहीदी बंदी छोड़ दिवस मनाने के सम्बंध में हुई थी।
सिक्खों के लिए दीपावली का दिन दो महान शख़्सियतों श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब तथा शहीद भाई मनी सिंघ जी की याद को ताज़ा करके बंदी छोड़ दिवस के रूप में अपने इतिहास पर गर्व करने की याद दिलाता है।
कुछ पाठक इस वृतांत को पढ़कर इस तरह महसूस करेंगे कि सिक्खों के लिए गुरु पातशाह की रिहाई तथा भाई मनी सिंघ जी की शहादत एक समान ही थी। हां, सिक्खों को गुरु साहिबान द्वारा यही शिक्षा दृढ़ करवाई गई है :
दुख सुख गुरमुखि सम करि जाणा हरख सोग ते बिरकतु भइआ ॥
(९०७)

आवत हरख न जावन दूखा नह विआपै मन रोगनी ॥
सदा अनंदु गुरु पूरा पाइआ तउ उतरी सगल बिओगनी ॥(८८३)

अतः हम कह सकते हैं कि इस शुभअवसर पर सिक्ख अपने गौरवमयी इतिहास को याद करके इस पर फख्र का इज़हार करते हैं।

चाहे सारा सिक्ख जगत इस दिवस को, जहां कहीं भी कोई है, बड़ी श्रद्धा से मनाता है, परंतु विशेष तौर पर सिक्ख संगत में इस दिवस पर श्री दरबार साहिब, श्री अमृतसर में धूमधाम से पहुंचने के लिए विशेष उत्साह देखने को मिलता है। श्री दरबार साहिब को अलौकिक ढंग से सजाया जाता है। रात को दीपमाला तथा आतिशबाजी का नजारा संगत में विशेष आकर्षण का कारण होता है।

-डॉ जसमित्तर सिंघ