श्री गुरू नानक देव जी की इलाही ज्योति के आलोक में नौवें गुरू श्री गुरू तेग बहादर साहिब जी ने भारतीय संस्कृति को नया संदेश दिया। श्री गुरू तेग बहादर साहिब जी ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपना शीश कुर्बान कर दिया। वे सही अर्थों में मानव जाति के रक्षक थे। वे धार्मिक स्वतंत्रता को मानव जाति का प्रथम धर्म मानते थे। इसी वजह से जब कश्मीरी पंडितों का एक दल गुरू साहिब के सामने अपनी फरियाद लेकर आया, जिसका नेतृत्व किरपा राम दत्त (जो बाद में भाई किरपा सिंघ बने) कर रहे थे। उन्होंने गुरू साहिब को बताया कि मुगल बादशाह औरंगजेब उन पर अत्याचार करके उन्हें जबरदस्ती मुसलमान बनाना चाहता है और कोई भी उनकी सहायता नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि उन्हें सिर्फ गुरू नानक साहिब के घर से उम्मीद है तो श्री गुरू तेग बहादर साहिब ने उन्हें धैर्य दिलाया और कहा कि वाहिगुरू तुम्हारी मदद करेगा। उन लोगों की जान व धर्म की रक्षा के लिए गुरू साहिब कुर्बानी देने को तैयार हो गए।
तिलक जंजू राखा प्रभ ता का ॥ कीनो बडो कलू महि साका ॥
साधन हेति इती जिनि करी ॥ सीसु दीआ पर सी न उचरी ॥३॥
(बचित्र नाटक, पाः १०)
यहां पर एक बात विचारयोग्य है कि तिलक व जनेऊ दोनों का ही श्री गुरू नानक देव जी ने बहिष्कार किया है परंतु नवम पातशाह श्री गुरू तेग बहादर साहिब जी ने उसी तिलक व जनेऊ की रक्षा के लिए स्वयं अपना जीवन तक हंसते-हंसते न्यौछावर कर दिया और सी भी नहीं की। इसका कारण है कि श्री गुरू नानक देव जी द्वारा बख्शिश किया गया गुरमति सिद्धांत ही था जिसके आधार पर नवम पातशाह का कहना था कि सभी मनुष्यों को धार्मिक स्वतंत्रता प्राप्त होनी चाहिए। सभी धर्म अपने-अपने स्थान पर ठीक हैं परंतु किसी को भी जबरदस्ती व अत्याचार करके उसका धर्म छुड़ाकर, डराकर दूसरा धर्म ग्रहण नहीं कराना चाहिए। उनका सिद्धांत था-‘जीओ और जीने दो।’ उन्होंने कहा है:
भै काहू कर देत नहि नहि भै मानत आन ॥
(पन्ना १४२७)
यहां पर मैं एक विषय पर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं कि क्या आज के भारतवर्ष में हम नवम पातशाह द्वारा दी गई कुर्बानी के भाव को स्मर्ण रखने में सक्षम हैं? जिन कश्मीरियों के लिए गुरू साहिब ने चाँदनी चौक, दिल्ली में अपना शीश तक न्यौछावर कर दिया वे आज भी अपने कश्मीर से बाहर हैं तथा अपना घर-बार सब कुछ छोड़कर अपनी जान, इज्जत, धर्म की रक्षा के लिए आज भी अपना जीवन-यापन ‘रिफ्यूजी कैंपों’ में कर रहे हैं। सोचने की बात है कि जिन लोगों के लिए हमारे गुरू ने आत्म-बलिदान किया वे लोग आज भी अपने जीवन की रक्षा के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं, कोई उनकी सुध लेने वाला नहीं है। वे पूर्ण रूप से निराश हो चुके हैं। इस समय में हमारा फर्ज बनता है कि हम गुरू-घर के सेवक अपने गुरू साहिब की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन लोगों की सहायता के लिए हर संभव प्रयास करें तथा अपने देश की सरकार, राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री से आग्रह करें कि जिन कश्मीरियों के लिए हमारे गुरू ने कुर्बानी दी वे आज भी हताश हैं। उनकी समस्या का समाधान किया जाए तथा उनका घर-बार जो
उनसे छिन गया है, वो उन्हें वापस दिलाया जाये जिससे देश में शांति का माहौल कायम हो. सके। इस प्रकार हम हरेक युग में गुरू साहिब जी द्वारा दी गई कुर्बानी का सदका मानवतावाद, भ्रातृभाव और प्यार व एकता को मजबूत कर सकते हैं। श्री गुरू गोबिंद सिंघ जी के ये पावन बोल रहती दुनिया तक गूंजते रहेंगे:
तेग बहादर के चलत भयो जगत को सोक ॥
है है है सभ जग भयो जै जै जै सुर लोक ॥१६।।
(बचित्र नाटक)
-श्री प्रवीन ग्रोवर
