साचे नाम की लागै भूख

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January 22, 2026

अनगिनत भूखों का मजमूआ (संग्रह) मानव शरीर है। फिर सारा जीवन उन भूखों को तृप्त करने में लग जाता है। जब एक भूख की पूर्ति होती है तो कई-कई भूखें जन्म ले लेती हैं और इन भूखों में ही एक दिन जीवन का अंत हो जाता है।
पदार्थ का सारा रस भूख में ही छिपा पड़ा है।

भूख और पदार्थ के रस का चोली-दामन का साथ है। दो दिन का भूखा मनुष्य जो सूखी रोटी में स्वाद महसूस करता है वह तृप्त मनुष्य छत्तीस प्रकार के भोजन में भी आनंद नहीं प्राप्त कर सकता ।

बे-औलाद इंसान जो तीर्थों पर, संतों की कुटिया में एक पुत्र की प्राप्ति के लिए भटक रहा है अगर कहीं उसके घर में एक पुत्र हो जाए तो उसकी खुशी को नापना कठिन है, पर जिसके घर पहले ही पांच पुत्र हों उसके घर एक और पुत्र हो जाए तो वह इस घटना को अति कष्टदायक समझता है। नंगे मनुष्य को एक खादी का कुर्ता जो प्रसन्नता दे जाता है वह प्रसन्नता उसको नसीब नहीं हो सकती जिसके पास कपड़ों के सूटकेस भरे पड़े हों।

इन कुछ उदाहरणों से यह बात स्पष्ट हुई कि भूख का और रस का आपसी गहरा जोड़ है। भूख सारे जानदार जीवेन के अंदर पाई जाती है लेकिन भूख की पूर्ति हर जानदार अलग-अलग वस्तुओं से करता है। पक्षी, कीड़े-मकौड़े, पशु, चौपाए सबके जीवन में भूख है। पर कोई तृण खाकर, कोई दाने चुग कर और
कोई मांस खाकर अपनी भूख की पूर्ति करता है।

इसी तरह सारे मानव जीवन के अंदर भी भूख है, पर हर मनुष्य अपनी भूख की तृप्ति अलग-अलग पदार्थों से करता है। पंजाब का निवासी जितने शौक से गेहूं खाता है, मद्रास, केरल और बंगाल का रहने वाला अपना शौक चावल खाने में रखता है। मध्य भारत का कुछ हिस्सा ज्वार और बाजरा बहुत शौक से खाता है।

इस तरह प्यास सारे जीवन में है। कोई कुएं का और कोई सरोवर का जल पीकर अपनी प्यास शांत करता है, कोई घर के नल से और कोई नदी या झरने का जल पीकर अपनी प्यास दूर करता है। प्यास सारे जीवन में है, पर पानी अलग-अलग जगह का है। भूख सब में एक जैसी है, पर भोजन अलग-अलग है। शरीर ढकने की रुचि भी हर मनुष्य में है, पर कपड़े पहनने का ढंग अलग-अलग है। इसी तरह धन-धर्म की भूख भी सारे जीवन में है, पर धर्म कमाने का तरीका आज तक एक-सा नहीं हो सका। कोई दुकानदारी और कोई नौकरी कर धन कमा रहा है। कोई खेतीबाड़ी और कोई व्यापार करके धन कमा रहा है। कोई नमाज पढ़ कर, कोई पूजा-पाठ करके, कोई जप-तप करके धर्म कमाने में लगा हुआ है।

भोजन की भूख जिस मनुष्य को न लगे उसको रोगी समझा जाता है। आध्यात्मिक तौर पर वह भी रोगी है जिसको धर्म की भूख नहीं है। दरअसल भूख का न लगना ही रोगों की निशानी है। मनुष्य की शारीरिक तथा मानसिक भूखों के नीचे धर्म की भूख छुपी पड़ी है। यह भूख जागृत हो सके इसलिए कथा-कीर्तन का
‘चूरन’ लेना जरूरी है। आध्यात्मिक भूख जब पैदा हो जाती है तब सारे दुखों का अंत हो जाता है:

साचे नाम की लागै भूख ॥ उतु भूखै खाइ चलीअहि दूख ॥

हर भूख एक दुख को जन्म देती है। धन की भूख है तो दुख है, रोटी की भूख है तो दुख है, औलाद, मकान या प्रभुता की भूख है तो दुख खड़ा है। भूख और दुख हमेशा इकट्ठे रहते हैं,
पर एक भूख प्रभु के नाम की ऐसी है अगर कहीं मनुष्य-जीवन में पैदा हो जाए तो सारे दुखों का अंत कर सकती है।

कोई भी पदार्थ केवल उसी भूख की तृप्ति कर सकता है जो भूख उस पदार्थ के लिए पैदा हो, पर ‘नाम’ (प्रभु-सिमरन) सब भूखों का अंत कर सकता है, इससे सब दुखों का अंत हो जाता है।

-ज्ञानी संत सिंघ जी मसकीन