श्री गुरु नानक देव जी के समय एवं उनसे कुछ समय बाद भी जहां ‘संगत’ तथा सत्य की विचार करने वाले सिक्ख गुरु के पास बैठकर तत्ववेत्ता एवं ज्ञाता बनते थे उस पवित्र स्थान को ‘धरमसाल’ (धर्मशाला) कहते थे। गुरु नानक पातशाह ने गुरसिक्खी की मूल बाणी ‘जपु’ के शिखर पर पहुंच कर ‘धरमसाल’ की बड़ी गहरी, गंभीर तथा स्पष्ट व्याख्या की है। इस बाणी के अनुसार धरमसाल वो है जहां सगुण एवं निर्गुण साथ-साथ चलते हैं। दुनिया के अन्य मतों वाले मतवान या तो वाहिगुरु के निर्गुण स्वरूप की प्रशंसा करते हैं तथा दुनिया त्याग देने की ताकीद करते हैं या उसके सगुण स्वरूप को आगे रखकर अंधाधुंध ऐसे भागते हैं कि उनको अपनी होश ही नहीं रहती। वे मदमस्त हो, रसों-कसों में फंसकर, स्वादों में खचित होकर, जीवन को व्यर्थ गंवा कर चले जाते हैं। गुरु नानक साहिब निर्गुण एवं सगुण स्वरूप को इकट्ठा देखते हैं तथा इकट्ठा रखते हैं। गुरमति द्वारा बताए इस संतुलन को जब जीवन में ढाल लिया जाता है तो सारी धरती ही ‘धरमसाल’ बन जाती है।
‘धरमसाल’ वो जगह है जहां निर्गुण तथा सगुण का खूबसूरत संगम होता है। रात, ऋतु, थित, वार इनका कोई स्थूल स्वरूप नहीं। इनको पकड़ा नहीं जा सकता, इनको तो केवल महसूस किया जा सकता है। यह वाहिगुरु का एक बहुत बड़ा गुण है। पवन, पानी, अग्नि व पाताल इनको हासिल भी किया जा सकता तथा
इनका आनंद भी लिया जा सकता है। ये सब रचनाएं वाहिगुरु का सगुण स्वरूप हैं। इसकी समझ ‘धरमसाल’ अथवा ‘गुरुद्वारे’ से होती है। जब मनुष्य दुनिया भर के पाखंडों से हटकर, निकम्मे भ्रमों तथा कर्मों को त्याग कर, वाहिगुरु के सुगण स्वरूप का आनंद लेता हुआ, निर्गुण की आराधना कर, मन को गुरु की कृपा द्वारा साघ कर ‘गुरु’ तथा ‘गुरुद्वारे’ द्वारा दी हुई जीवन-जाच को जीयेगा तो वह मनुष्य गुरसिक्ख बन जायेगा तथा उसका घर ‘धरमसाल’ कहलायेगा। भाई गुरदास जी के कथन के अनुसार गुरु नानक साहिब के चरणों के स्पर्श से हर घर ‘धरमसाल’ का रुतबा प्राप्त कर गया और उसके अंदर किरत के साथ-साथ, कर्ता की कीर्ति की धुनें भी सुनाई देने लगीं। ऐसी है ‘धरमसाल’, यह है कार्य ‘गुरुद्वारे’ का और यही संकल्प है गुरुद्वारे सम्बंधी महान गुरु, गुरु नानक साहिब का।
‘गुरुद्वारा’ अपने आप में महान पवित्रता समोये बैठा है। ‘गुरुद्वारे’ का क्या भाव है, क्या । भावना है, यह विचारने तथा समझने की | जरूरत है। ‘गुरुद्वारे’ का अर्थ है ‘गुरु-घर’, ‘गुरु का दुआरा (द्वारा)’। इसको गुरु जी का दरवाजा या किवाड़ कह सकते हैं अर्थात् वह घर जिसमें गुरु पातशाह निवास करते हैं। श्री गुरु नानक देव जी के मुताबिक ‘गुरु का द्वारा’ अर्थात् ‘गुरुद्वारा’ वह स्थान है जहां से गुरमति की समझ आती है। हम इस दुनिया में आये हैं। हमें यह शरीर रूपी पात्र प्राप्त हुआ है। इसको इस प्रकार से तराशना है कि इस दुनिया के मालिक व समस्त सृष्टि के सृजनहार को अच्छा लगने लग जाये। इस पात्र का भीतरी मन दौड़ता-भागता है। यह पल भर भी टिकता नहीं अर्थात् टिकने नहीं देता। इस अफरा-तफरी में यह अति मलीन हो चुका है। शरीरों को केवल धोने, श्रृंगारने एवं संवारने से ही हम वाहिगुरु को अच्छे नहीं लगेंगे, आवश्यकता है कि हमारे तथा वाहिगुरु के दरमियान झूठ की कतार टूटे और हम ऐसे बोल बोलें कि पिता-वाहिगुरु हमें स्वयं प्यार करने लग जाये। ‘गुरु का द्वारा’ अर्थात् ‘गुरुद्वारा’ वो स्थान है जहां से आदर्श
जीवन-जाच की सूझ पड़ती है: भांडा हछा सोइ जो तिसु भावसी ॥
भांडा अति नलीणु धोता हछा न होइसी ॥ गुरू दुआरै होइ सोझी पाइसी ॥ एतु दुआरै धोइ हछा होइसी ॥
मैले हछे का वीचारु आपि वरताइसी ॥
मतु को जाणै जाइ अगै पाइसी ॥ (पन्ना ७३०)
श्री गुरु नानक देव जी के इस शबद से यह दिशा मिलती है कि गुरुद्वारे से गुरु द्वारा दिया हुआ ज्ञान मिलता है ताकि मनुष्य तरह-तरह के भ्रमों में ही न पड़ा रहे। गुरु की दी गई समझ से इस जन्म को किस प्रकार संवारा जा सकता है। लिया हुआ अमोलक जन्म निष्फल न जाये क्योंकि हमने तो आगा संवारने के लिए यह जन्म पाया है। गुरमति का हुक्म है :
आगाहा कू त्राधि पिछा फेरि न मुहडड़ा ॥ नानक सिझिं इवेहा वार बहुड़ि न होवी जनमड़ा ॥
(पन्ना १०९६)
अगर इस बार मिली जिंदगी भली-भांति संवार ली जाये तो तीनों लोकों में अपने-आप डंका बजेगा। पिछले जन्मों का चक्र छोड़कर वर्तमान में विचरन करना है, उत्साह से आगे चलना है, पीछे नहीं मुड़ना। इस प्रकार अगर यह जन्म संवार
लिया जाये तो पुनः जन्म नहीं होगा।
सभी दुनियादार जीव तथा मनुष्य अपने शरीर के भरण-पोषण में लगे हुए हैं। नौ द्वार प्रकट हैं। इनकी भूख को तृप्त करने में ही ज़िंदगी व्यतीत हो जाती है। दसवें द्वार का कैसे पता चले? वो द्वार सूक्ष्म है, गुप्त है, उसका पता तो केवल गुरु से तथा गुरुद्वारे के साथ सुरति जोड़ने पर ही लगता है:
–हरि जीउ गुफा अंदरि रखि कै वाजा पवणु वजाइआ ॥
वजाइआ वाजा पउण नउ दुआरे परगटु कीए दसवा गुपतु रखाइआ ॥
गुरदुआरै लाइ भावनी इकना दसवा दुआरु दिखाइआ ॥ (पन्ना ९२२)
–नउ दरवाजे दसवा दुआरु ॥ बुझु रे गिआनी एहु बीचारु ॥
कथता बकता सुनता सोई ॥
‘ आपु बीचारे सु गिआनी होई ॥ (पन्ना १५२)
जो इस द्वार को जान ले वही ज्ञानी है। ज्ञान का दाता गुरु है। सूझ प्रदान-कर्ता गुरु है। गुरुद्वारा इसी की सूझ करायेगा तथा गुरसिक्ख गुरु से ज्ञान प्राप्त करके ज्ञानी बन जायेगा, क्योंकि उसने यह पहेली जान ली है एवं गुरु-कृपा द्वारा अपने आप को पहचान लिया है।
हम इस जीवन में देखते हैं कि जब कोई मनुष्य अपने किसी मित्र के साथ ज्यादा घुल-। मिल जाये, हर दम उसका ही संग चाहे तो कहते हैं, “तू तो उसके साथ ऐसे रहता है जैसे उसके साथ ब्याहा हुआ है।” भाव यह कि । जिसका साथ अच्छा लगे, जिसका संग मन को भाये, उस सम्बंधी ही हम ऐसा कहते हैं। यही हाल पुरुष औरत के विवाहित सम्बंधों के बारे में है। विवाहित दंपत्ति विवाह के उपरांत इकट्ठे एक जगह पर रहते हैं। गुरु नानक साहिब इस
सम्बंध में बड़ी खूबसूरत बात कहते हैं :
गुरू दुआरै हमरा वीआहु जि होआ जां सहु मिलिआ तां जानिआ ॥
तिहु लोका महि सबदु रविआ है आपु गइआ मनु मानिआ ॥
(पन्ना ३५१)
इसमें गुरदेव कहते हैं-“मैं गुरुद्वारे के साथ जुड़ गया हूं। गुरु की मति का प्रकाश हृदय में हो गया है। उसके साथ मेरा आत्मिक मिलन हो गया है। उसके साथ मैं ब्याहा गया हूं तथा गुरु-कृपा द्वारा मुझे अकाल पुरख सम्बंधी इस तरह प्रकाश हुआ है कि मेरा मन सदैव खुशी में है। ऐ दुनिया के लोगो ! वह शब्द अनाहद मेरे अंदर रच गया है, जिससे मेरा अहं दूर हो गया है।” बस, समझने की बात यह है कि यदि जगत-पिता गुरु नानक साहिब का मन गुरुद्वारे के साथ ब्याहे जाने या जुड़ जाने से अनहद खुशियां प्राप्त कर सकता है तो फिर यदि हम जुड़ जायें तो हम भी सदीवी खुशियां प्राप्त कर सकते हैं, हमारा अहं खत्म हो जायेगा। सांप्रदायिकता, भेदभाव, मनमुटाव, दुश्मनियां तथा बंटने का नाश होगा; प्रभु से एक हो जायेंगे। गुरुद्वारा : एक संस्था : ‘गुरुद्वारा’ ईंट, मिट्टी, चूना, सीमेंट, लोहा, लकड़ी, संगमरमर, ग्रेनाइट या अन्य कीमती नक्काशियों, कला-कृतियों से नहीं बनता। ये सब वस्तुएं तो होटलों, क्लबों, बहुमंजिली इमारतों, नाच-घरों, शराबखानों तथा मकबरों में भी लगी हुई हैं, परंतु वे ज़िंदगी नहीं दे रहे, अपितु वे तो ज़िंदगी से बहुत दूर हैं। बात तो है आत्म और परमात्म की। गुरुद्वारे की खूबसूरती तथा स्तुति आध्यात्मिक वस्तुओं के साथ है। जब ये स्रोत गुरुद्वारे में से निकल कर अतृप्त ज़िंदगी को शांति प्रदान करते हैं तो सब वस्तुएं सुंदर तथा शोभनीय लगने लग जाती है।
गुरुद्वारे का सबसे पहला तथा मुख्य अंग है संगत’। “सतसंगति कैसी जाणीऐ ॥” का उत्तर – है : “जिथै एको नामु वखाणीऐ ॥” यही महान कार्य गुरुद्वारे का है। यहां पर साधसंगत एकत्र – होती है। संगत की इकत्रता साध-रूप होती है। गुरु के सम्मुख एकत्र होकर सुरति लगती है तथा दुविधा दूर होती है; मन मिलते हैं, सच्चे प्रशबद के स्वभाव का ज्ञान प्राप्त होता है। कथा-कीर्तन एवं शबद-बाणी की व्याख्या हउमै का पर्दा उतार कर प्रतापी पुरख, सतिपुरख, आनंददायक अकाल पुरख के साथ मिला देती है:
साध संगि जउ तुमहि मिलाइओ तउ सुणी तुमारी बाणी ॥
अनदु भइआ पेखत ही नानक प्रताप पुरख निरबाणी ॥
(पन्ना ६१४)
गुरुद्वारे का दूसरा महान अंग है ‘पंगत’। पंगत में सब गुरु के प्यारे ऊंच-नीच, अमीर-गरीब, जात-पात के भेदभाव के बिना इकट्ठे बैठकर अन्न-पानी ग्रहण करते हैं। सदियों से इन भेदभावों के कारण मनुष्य जाति बंटी हुई है। इसी बांट से खंड-खंड हुई मानवता कमजोर और दुर्बल होकर भटकती है।
गुरु पातशाह ने गुरुद्वारों के साथ लंगर अथवा – पंगत स्थापित कर मनुष्य की जिंदगी के सफर को – आसान कर दिया, भ्रम मिटा दिया, फोकट कर्म – खत्म कर दिये। दो प्रकार के लंगर का जिक्र है– – ‘शबद लंगर’ और ‘लंगर दौलत’। ‘रामकली दी – वार’ में भाई सत्ता जी-भाई बलवंड जी ने इसका – विस्तार से उल्लेख किया है।
तीसरा अंग-हर गुरुद्वारे के साथ एक – ‘निशान साहिब’ लगा होता है। यह भली प्रकार – परखने की जरूरत है कि निशान साहिब का भाव क्या है? प्राचीन पोथियों तथा लिखितों में ‘जपु जी साहिब’ की जगह पर ‘जपु नीसाणु’ लिखा मिलता है। इसका भाव है कि ‘जपु’ अब जंगलों, गुफाओं में छुप कर नहीं किया जायेगा। ‘जपु’ वाले को किसका डर है? ‘जपु’ तो निर्भय करता है। ‘नीसाणु’ का शब्दी अर्थ है-धौंसा, नगाड़ा। यह निडरता तथा अभय राज्य की निशानी है। जहां पर यह लगा है वहां भय कोई नहीं, डर कोई नहीं। जो डर या भय संयम या अनुशासनता का था, वह अकाल पुरख की चाकरी से खत्म हो गया और हमारी दशा क्या बनी कि हम स्वयं अपने साहिब के अंग-संग होने के कारण उसका अंग ही बन गये। यह पद प्राप्त हुआ खसम (प्रभु) की चाकरी के
कारण :
एह किनेही चाकरी जितु भउ खसम न जाइ ॥ नानक सेवकु काढीऐ जि सेती खसम समाइ ॥
(पन्ना ४७५)
गुरुद्वारा साहिब में झूलता निशान साहिब इस बात का प्रतीक है कि यहां पर निर्भयता है, अभय-दान है। यहां पर गुरु को मानने वाले पवित्र आत्माओं के मालिक इकट्ठे होते हैं। यहां पर आने वालों को बराबरी तथा एकता का वातावरण मिलेगा और सतिसंग प्राप्त होगा; शरीर को पालने के लिए एक जैसा, एक समान अटूट लंगर मिलेगा। यहां पर आने वालों का मन नीचा तथा मति ऊंची होगी। इसके साथ जुड़ने वालों की आबरू महफूज होगी। वे सम्मान पायेंगे यहां भी और साईं के दरबार में भी।
गुरुद्वारे का चौथा मुख्य अंग है- ‘शफाखाना’। इस पवित्र परंपरा का विकास गुरु नानक साहिब से ही हो गया था। गुरु नानक साहिब ने कुष्ठ रोग से पीड़ित एक कुष्ठ रोगी का उपचार अपने पवित्र हाथों से करके उसको आरोग्य किया। इस महान ऐतिहासिक घटना के बाद सभी गुरु साहिबान ने गुरुद्वारों के साथ ‘शफाखाना’ बनाना अनिवार्य कर दिया। श्री गुरु हरिराय साहिब द्वारा कीरतपुर साहिब में कायम किया ‘शफाखाना’ इस परंपरा का शिखर है। उस शफाखाने में नायाब दवाइयां, जो शाही दवाखाने में भी नहीं थीं, वे भी उपलब्ध थीं तथा ये बिना किसी भेदभाव के जरूरतमंदों को दी जाती थीं। गुरुद्वारा जहां रोग-रहित बलशाली ऋष्ट-पुष्ट आत्मा तथा मन का निर्माण करता है वहीं शरीर को भी ऐसा ही रखता है। शरीर ही तो उस बलवान, पवित्र आत्मा का वाहक है। इसको ऐसे ही संवार कर रखना है, जिस प्रकार सवार अपने घोड़े को और आधुनिक मनुष्य अपनी कार या गाड़ी को रखता है।
दवाखाने तथा शफाखाने में एक विशेष अंतर है। दवाखाने में वैद्य, हकीम, डाक्टर को अपनी दवाई तथा हिकमत पर गर्व होता है। गुरमति में चतुराइयों तथा हिकमतों की कोई जगह नहीं। इंसान को लाखों हिकमतें क्यों न आती हों, इनकी जरा भी मान्यता उस परमात्मा के दर पर नहीं। दवाई शफाखाने में भी दी जाती है परंतु परवरदिगार पर भरोसा रख कर। शफाखाना चलाने वाले के मन में यह प्रबल इच्छा होती है कि रोगी ठीक हो; कर्त्ता (प्रभु) मुझे कारण बनाकर दवाई दिलवा रहा है। शफा तो उसके हाथ में है। वह अपनी लाज स्वयं पालता है तथा रोगी अच्छा-भला हो जाता है। दवाखाने वाला व्यापार करता है किंतु शफाखाने वाला प्यार। दवाखाने वाले की नज़र रोगी की जेब पर होती है, उसकी दर्द का एहसास उसको नहीं होता या बहुत ही कम होता है। शफाखाने वाले की नज़र रोगी की जेब के नीचे धड़कते दिल की अंदरूनी पीड़ा में है। वह उसका दर्द महसूस करता है। इस तरह के प्राफाखाने गुरू साहिबान गुरुद्वारों के साथ बनाते थे तथा हमसे भी इसी तरह चाहते हैं।
आधुनिक समय में जब मेडिकल विज्ञान तरक्की की चढ़ाइयां चढ़ कर शिखर पर पहुंच रही है तब गुरुद्वारों के प्रबंधक, सेवादार तथा कमेटियां अच्छी एवं आधुनिक डाक्टरी सेवाएं भी प्रदान करें। ऐसा करने से स्वाभाविक ही सिक्खी का प्रचार होगा तथा लोगों में श्री गुरु ग्रंथ साहिब एवं सिक्खी के लिए परिपक्व श्रद्धा उत्पन्न होगी। गुरुद्वारा साहिबान अपने वित्त के अनुसार शफाखाने कायम करें, महंगी दवाइयां बिना लाभ-हानि के आधार पर लोगों तक पहुंचाएं। हर गुरुद्वारा कमेटी मेडिकल कालेज, बड़े या छोटे अस्पताल तो खोल नहीं सकती किंतु पैथोलोजिकल लैबोरेट्रीज खोल कर, रोग की पहचान करके, सही रिपोर्ट देकर रोगियों को अनिश्चितता में से निकाल कर उनकी परेशानी तो कम कर ही सकती है।
गुरुद्वारे का पांचवां अंग है-‘शिक्षा’। गुरुद्वारा साहिब के स्वरूप को इस प्रकार देखा जाये कि गुरुद्वारे की इमारत या हाल एक स्कूल या पाठशाला है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अंदर दस गुरु साहिबान के रूप प्रकाश-दाता तथा ज्ञान-दाता अध्यात्म के रास्ते पर अध्यापक-स्वरूप हैं। सिक्ख संगत संतों की जमात है, जो गुरबाणी के पाठ रूपी शबद पढ़कर, अपना अज्ञान-अंधेरा दूर कर ज्ञानवान बनती है। तात्पर्य यह हुआ कि गुरुद्वारे का तो काम ही शिक्षा देना है। पिछले समय में गुरुद्वारे के साथ गुरमुखी सिखाने का कार्य किया जाता था। इतिहास सिखाने के लिए ‘श्री गुर प्रताप सूरज ग्रंथ’ की कथा एक परंपरा ही बन चुकी थी। इसके अलावा संगीत विद्यालय कीर्तन की शिक्षा दिया करते थे। ऐसी परंपराओं को पुनः अधिकाधिक उत्साह के साथ गतिशील करना चाहिए। धर्म की हानि होती देखकर उस युग में गुरु नानक साहिब ने कहा थाः
हउ भालि विकुंनी होई ॥ आधेरै राहु न कोई ॥
विचि हउमै करि दुखु रोई ॥
कहु नानक किनि बिधि गति होई ॥ (पन्ना १४५)
गति की विधि गुरु नानक साहिब खुद ही बता रहे हैं। गति संभव है, गुरु, गुरमति, गुरबाणी तथा श्री गुरु ग्रंथ साहिब द्वारा, जिसका द्वार है ‘गुरुद्वारा’। गुरु के प्रकाश में अति आवश्यक है कि गुरुद्वारा साहिबान के साथ गुरमति विद्यालय, संगीत विद्यालय, शिक्षण संस्थायें, स्कूल, कालेज, व्यवसायिक कॉलेज आदि वित्त के अनुसार खोलकर शिक्षा के माध्यम के साथ गुरसिक्ख, विद्वान, ज्ञानवान तथा वैज्ञानिक पैदा किए जाएं ताकि गुरुद्वारा साहिबान का वह कार्य जो गुरु साहिब की पवित्र सोचनी ने निश्चित किया था, साकार हो जाये। गुरुद्वारा एक शक्तिशाली संस्था है जो जीवनदाती तथा सुखदायी है।
कोई भी शहर, बस्ती अथवा मुहल्ला या गांव ‘शरीर’ के समान है तथा उसमें स्थापित गुरुद्वारा उस आबादी की ‘आत्मा’ के समान है। जैसे आत्मा के अस्तित्व से शरीर का जीवन है बिलकुल उसी तरह गुरुद्वारे के अस्तित्व से शहर, बस्ती या गांव का जीवन है। आज हरेक सिक्ख को यह अरदास करने की जरूरत है कि हे मालिक परमात्मा, ऐसा कभी न हो कि हम गुरुद्वारे से टूट या बिछुड़ जायें। गुरुद्वारे से बिछुड़ कर उजड़ जाएंगे।
श्री गुरु अरजन देव जी द्वारा स्थापित श्री हरिमंदर साहिब (श्री अमृतसर) में गुरदेव ने पहली बार श्री आदि (गुरु) ग्रंथ साहिब का प्रकाश किया। श्री हरिमंदर साहिब पवित्र ताल में कमल की तरह शोभायमान है। गुरसिक्खों ने जीवन में भी कमल की भांति निर्लेप तथा निरालम रहना है।
-प्रो. बलविंदर सिंह लुधियाना
