श्री गुरु ग्रंथ साहिब विश्व के धार्मिक एवं साहित्यिक ग्रंथों में विशेष महत्त्वपूर्ण है। इसमें विभिन्न बाणीकारों की बाणी है जो कि ३१ रागों पर आधारित है। यह बाणी आध्यात्मिक गुणों का ही नहीं मानवीय गुणों का भी बखान करती है। भक्त रविदास जी इन बाणीकारों में से एक हैं। भक्त रविदास जी के श्री गुरु ग्रंथ साहिब में ४० शबद हैं जिनका मुख्य विषय परमात्मा के अस्तित्व के बारे में जानकारी के अलावा नाम-सिमरन, प्रभु-प्रेम, परमात्मा से मिलाप के साथ-साथ किस प्रकार परमात्मा की कृपा से सांसारिक पदार्थों का, माया की तृष्णा का, दुविधा, दुख-कलेश आदि का सर्वनाश किया जा सकता है, आदि है।
सामान्यतः भक्त रविदास जी एक क्रांतिकारी, समाज-सुधारक और धर्मोपदेशक के रूप में विख्यात हैं। उन्होंने जहां अपनी बाणी द्वारा परमात्मा से मिलन की अवस्था का व्याख्यान किया है वहीं आनंद-मग्न समाज का भी सुंदर चित्रण किया है। दैवी एवं नैतिक गुणों का अनुसरण करने की प्रेरणा आपकी बाणी में मिलती है।
आओ, भक्त रविदास जी की बाणी के कुछ मुख्य सिद्धांतों को अवलोकित करें :
१) परमात्मा एवं जीव का सम्बंध : भक्त रविदास जी ने अपनी बाणी में मुख्य रूप में परमात्मा की उपमा का हीं वर्णन किया है।
उनके सारे शबद दैवी प्रेम से ओत-प्रोत हैं।
उनके अनुसार परमात्मा के अस्तित्व के बारे में कोई भ्रांति नहीं है अपितु हम सब में मौजूद है, इसलिए परमात्मा और जीव में कोई अंतर नहीं है।
भक्त रविदास जी परमात्मा और अपने (जीव) में कोई विभिन्नता न समझते हुए कहते हैं, हे परमात्मा ! तेरे और मेरे में कौन-सी भिन्नता है? हम दोनों एक ही हैं। हमारा तुम्हारे साथ वही सम्बंध है जो सोने के कड़े का सोने (स्वर्ण) के साथ और पानी (समुद्र) का पानी की तरंगों के साथ होता है। कहने से तात्पर्य, सोने का कड़ा भी मूल रूप में सोना ही होता है और पानी की तरंगें भी पानी ही होती हैं :
तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा ॥
कनक कटिक जल तरंग जैसा ॥ (पन्ना ९३)
भक्त जी प्रभु को पवित्र, कृपालु, दयालु, परोपकारी मानते हुए फरमान करते हैं :
— हम सरि दीनु दइआलु न तुम सरि(पन्ना ६८६)
–हउ अउगन तुम्ह उपकारी ॥ (पन्ना ४८६)
२) परमात्मा सर्वनिवासी है: भक्त रविदास जी अपनी बाणी में मानव को उपदेश करते हुए फरमान करते हैं कि परमात्मा सृष्टि के हर कण में मौजूद है। उसने ही सृष्टि की रचना की है और वही उसमें निवास कर रहा है। परमात्मा ने ही सृष्टि में अनेक रूप वाले प्राणी बनाये हैं। उन सब में परमात्मा स्वयं ही मौजूद
है। हर जगह पर विद्यमान होकर वो संसार के हर रंग को देख रहा है। वो हमसे जरा भी दूर नहीं है, हमारे हाथों से भी समीप है और जो कुछ भी जगत में घटित हो रहा वो सब कुछ उसकी रज़ा में ही हो रहा है :
सरबे एकु अनेकै सुआमी सभ घट भोगवै सोई ॥ कहि रविदास हाथ पै नेरै सहजे होइ सु होई ॥
(पन्ना ६५८)
३) मानव-जीवन का लक्ष्य बड़ी विडंबना की बात है कि जीवात्मा अहंकाररत होकर परमात्मा से दूर होती जाती है, सांसारिक विषय-विकारों के बंधन में बंध जाती है और यह भूल ही जाती है कि संसार में आने का मुख्य लक्ष्य क्या है। भक्त जी मनुष्य को इन विषय-विकारों में न फंसने से आगाह करते हुए कहते हैं कि मानव-जीवन का मुख्य लक्ष्य है- परमात्मा की प्राप्ति तथा उसका नाम-सिमरन करके उसकी भक्ति करने में लीन रहना। आगे वे बड़े ज़ोरदार शब्दों में कहते हैं कि मानव जीवन दुर्लभहै। इसको पदार्थ एकत्र करने में, धन-संपत्ति एकत्र करने में व्यर्थ नहीं गंवाना चाहिए। धन-पदार्थ सब यहीं रह जाने वाले हैं :
करि बंदिगी छाडि मै मेरा ॥
हिरदै नामु सम्हारि सवेरा॥ (पन्ना ७९४)
मानुखा अवतार दुलभ तिही संगति पोच ॥(पन्ना ४८६)
४) संसार नश्वर है : भक्त रविदास जी संसार को मिथ्या मानते हैं। वे कहते हैं कि इस संसार की प्रत्येक वस्तु नाशवान है। इस संसार की सृजना करने वाला प्रभु और उसका नाम ही सात्विक एवं स्थाई है जिसका कदापि नाश नहीं हो सकता। जगत को नाशवान मानते हुए भक्त जी इसकी तुलना कसुंभे के पुष्प से करते हैं कि जिस प्रकार कसुंभे के पुष्प का रंग कुछ ही
समयं के लिए होता है अर्थात् अस्थाई होता है, उसी तरह संसार भी कुछ ही समय के लिए है अर्थात् नाशवान है, मिथ्या है, केवल मेरे प्रभु का नाम-रंग ही मजीठ रंग की भांति है अर्थात् सर्वदा कायम रहने वाला है :
जैसा रंगू कसुंभ का तैसा इहु संसारु ॥ मेरे रमईए रंगु मजीठ का कहु रविदास चमार ॥
(पन्ना ३४६)
५) प्रभु नीचों को भी ऊंचा करने के समर्थ है: इस मिथ्या संसार में मनुष्य द्वारा बनाए गए तथाकथित नीच, गरीब आदि लोगों को संसार के तथाकथित उच्च जाति के लोग बुरा समझते हैं अर्थात् उनसे नफरत करते हैं। वे उनकी परछाईं भी अपने तन पर नहीं पड़ने देते। वे उसके स्पर्श-मात्र से अपना जन्म भ्रष्ट हुआ समझते हैं। अपने सद्गुणों के कारण जो भी मनुष्य प्रभु-भक्ति करता है, प्रभु उसे ही गले से लगा लेते हैं। भक्त रविदास जी ने गरीबों का एक-मात्र सहारा परमात्मा को मानते हुए सब कुछ उसी पर छोड़ दिया है। भक्त रविदास जी फरमान करते हैं कि प्रभु गरीबों को भी यश प्रदान कर देता है, उनके सर पर भी छत्र डुला देता है। हे प्रभु! ऐसा कार्य तेरे अतिरिक्त अन्य कौन कर सकता है अर्थात् कोई नहीं :
ऐसी लाल तुझ बिनु कउनु करै ॥गरीब निवाजु गुसईआ मेरा माथै छत्रु धरै॥
(पन्ना ११०६)
६) सद्गुणों को ग्रहण करना : भक्त रविदास जी कहते हैं कि परमात्मा को पाने के लिए सद्गुणों को ग्रहण करना अनिवार्य है, क्योंकि सद्गुणों को ग्रहण किए बिना कोई भी मनुष्य धर्मी नहीं बन सकता। श्री गुरु नानक देव जी का फरमान है कि “विणु गुण कीते भगति न होइ ॥” अर्थात् अच्छे गुणों को धारण किए बिना
प्रभु-भक्ति असंभव है। भक्त जी भी बताते हैं कि हमें मन, बाणी एवं कार्यों द्वारा होने वाली बुराइयों से बचना चाहिए, मन में बुरे ख़्याल नहीं आने देने चाहिए, अपने मुख द्वारा बुरे शब्द नहीं बोलने चाहिए और न ही ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे किसी अन्य का बुरा हो या उसका परिणाम बुरा हो। हमें संत-जनों द्वारा बताए हुए सत्यता के मार्ग पर ही चलना चाहिए :
–मन बच क्रम रस कसहि लुभाना ॥(पन्ना ४८७)
— संत आचरण संत चो मारगु… (पन्ना ४८६)
भक्त जी आगे उपदेश करते हैं कि हमें मुख्य रूप से प्रेम, दया एवं सेवा आदि गुणों को ग्रहण करना चाहिए। परमात्मा से प्रेम पाने के लिए मनुष्य-मात्र से प्रेम करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य परमात्मा द्वारा ही बनाए हुए हैं : प्रेमु जाइ तउ डरपै तेरो जनु ॥ (पन्ना ४८६) ७) अवगुणों को त्यागना : भक्त रविदास जी ने जहां सेवा, सिमरन, दया, प्रेम, परोपकार आदि सद्गुणों को धारण करने को कहा है वहीं अवगुणों का त्याग करना भी अति आवश्यक माना है। अवगुण मनुष्य के हर मार्ग में बाधा डालते हैं, चाहे वो आध्यात्मिक हो या सामाजिक । मनुष्य-मात्र को भ्रम, निंदा, चुगली, अहंकार, पाप आदि को त्यागना चाहिए, क्योंकि ये मनुष्य की सामाजिक प्रगति में रुकावट तो डालते ही हैं, आध्यात्मिक क्षेत्र (प्रभु-मिलन) में भी रुकावट बनते हैं।
भक्त रविदास जी कहते हैं कि हे प्रभु!
जितनी देर तक हम जीवों के मन में अहंकार उपस्थित रहता है उतनी देर तक तुम हमारे हृदय में प्रकट नहीं हो सकते, किंतु जब तुम हमारे हृदय में प्रकट हो जाते हो तो मैं
(अहंकार) सदैव के लिए मिट जाती है : जब हम होते तब तू नाही अब तूही मै नाही ॥(पन्ना ६५७)
भक्त जी ने दूसरों की निंदा करने को भी बहुत बड़ा अवगुण माना है :
जे ओहु अठसठि तीरथ न्हावै ॥ जे ओहु दुआदस सिला पूजावै ॥ जे ओहु कूप तटा देवावै ॥ करै निंद सभ बिरथा जावै ॥ साघ का निंदकु कैसे तरै॥ सरपर जानहु नरक ही परै॥(पन्ना ८७५)
८) प्रभु से प्रीति : भक्त रविदास जी उपदेश करते हैं कि मनुष्य की प्रभु से प्रीति (प्रेम) होनी चाहिए। परमात्मा का नाम प्रतिपल हृदय में बसाये रखना, हमेशा उसे अपने अंग-संग समझना, सर्वदा उसका नाम-सिमरन करते रहना ही प्रभु से प्रीति है और यह प्रीति प्रभु की कृपा से ही
बनी रह सकती है।
भक्त रविदास जी परमात्मा से अपनी प्रीति का बखान करते हुए कहते हैं कि हे प्रभु! तेरी और मेरी प्रीति इतनी प्रगाढ़ है कि अगर तू एक सुंदर पहाड़ है तो मैं उस पहाड़ का मोर हूं एवं तुझे देखकर खुशी से नृत्य करता हूं। तेरी-मेरी प्रीति चंद एवं चकोर की तरह है। तू चांद (शशि) है तो मैं तेरी चकोर हूं। तुझे देखकर ही मैं प्रसन्नता से बोलता हूं। तेरा-मेरा प्रेम बहुत बढ़ गया है। अब तू मुझसे नाता न तोड़ेगा तो मैं भी तेरे से जुदा नहीं हो सकता। मैं तुम से नाता तोड़कर और किसके साथ जोड़ सकता हूं? अन्य कोई तुम्हारे जैसा है ही नहीं है जिसके लिए मैं तुझे छोड़ सकता हूं : जउ तुम गिरिवर तउ हम मोरा॥
जउ तुम चंद तउ हम भए है चकोरा ॥ माधवे तुम न तोरहु तउ हम नही तोरहि॥
तुम सिउ तोरि कवन सिउ जोरहि ॥(पन्ना ६५८)
९) प्रभु का भक्त: प्रभु का नाम-सिमरन प्रभु-भक्त को इतना महान बना देता है कि उसके तुल्य अन्य कोई नहीं हो सकता। भक्त रविदास जी कहते हैं कि चाहे दुनिया का बड़ा विद्वान हो या विजेंद्र शूरवीर, चाहे छत्रपति नरेश हो या कोई भी मनुष्य, परमात्मा के भक्त के बराबर नहीं हो सकता अर्थात् प्रभु का भक्त सबसे उत्कृष्ट है। आगे वे कहते हैं कि भक्त-जनों का जन्म लेना ही विश्व में मुबारक है। वे तो प्रभु के चरणों में रहकर ही जी सकते हैं, जैसे चुपत्ती पानी के पास रहकर भी हरी रह सकती है : पंडित सूर छत्रपति राजा भगत बराबरि अउरु न कोइ ॥
जैसे पुरैन पात रहै जल समीप भनि रविदास जनमे जगि ओइ ॥
(पन्ना ८५८)
१०) प्रभु भक्तों के प्यार में बंधा है: प्यार मात्र शब्दों तक ही सीमित नहीं है, यह एक अद्वितीय वस्तु है। प्रेम के मार्ग द्वारा ही भक्त-जन अपने प्रभु तक पहुंचते हैं। जिस प्रकार भक्त-जन अपना
स्वभाव मिटाकर अपने प्रभु के प्यार में लीन रहते हैं उसी प्रकार परमात्मा भी अपने भक्त-जनों से बहुत प्रेम करता है; वो भी अपने भक्त-जनों के साथ प्रेम की डोर में बंधा हुआ है। प्रभु भक्ति में रंगे हुए भक्त रविदास जी परमात्मा को कहते हैं कि हे प्रभु! तेरे भक्त जैसा प्यार तेरे साथ करते हैं वो तुमसे छिपा हुआ नहीं रह सकता, तुम इसे अच्छी तरह से जानते हो। हम तुम्हारे मोह की डोर से बंधे हुए हैं और हमने तुम्हे भी अपने प्यार की डोरी से बांध लिया है। हम तो तुम्हे सिमर कर मोह (विषय-विकारों) के जाल से निकल जाएंगे, परंतु तुम हमारे प्यार के जाल से किस प्रकार निकलोगे?
जउ हम बांधे मोह फास हम प्रेम बधनि तुम बाधे॥
अपने छूटन को जतनु करहु हम छूटे तुम आराधे॥
(पन्ना ६५८)
भक्त रविदास जी ने भक्ति-विचारधारा के बारे में बड़ी गहराई से मानव-प्रेरणा की है। इसी विचारधारा से ही प्रभु-गुणों से सम्पन्न हुआ जा सकता है।
गुरप्रीत सिंह
