-डॉ. जोरावर सिंघ*
प्रस्तावना : संसार के समस्त प्राणियों में मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसे प्रकृति ने आध्यात्मिक जीवन जीने योग्य बनाया है। इसके अतिरिक्त अन्य प्राणी – मात्र भौतिक जीवन ही जी सकते हैं। मनुष्य की भौतिक क्रियाएं अन्य प्राणियों की भांति ही हैं । अध्यात्म के कारण ही मनुष्य अन्य प्राणियों से भिन्न है। आध्यात्मिक जीवन परमात्मशक्ति निहित आंतरिक चेतना द्वारा संचालित होता है और भौतिक पदार्थ, अमीरी-गरीबी आदि का यहां कोई महत्त्व नहीं रह जाता है। आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त मानव अपने शरीर, भावों, संवेगों तथा संकल्पों का भली प्रकार उपयोग कर सकता है । वह कठिनाइयों से घबराता नहीं, बल्कि उनसे ऊपर उठकर कुशलतापूर्वक उनका सामना करता है ।
आध्यात्मिकता : गुरबाणी के अनुसार अपने असली स्वरूप को पहचानना ही आध्यात्मिकता है। इ लक्ष्य है– आत्म साक्षात्कार । हम आनंद स्वरूप हैं, किंतु मोह आसक्ति ने हमें इस प्रकार से जकड़ रखा है कि हम अपना वास्तविक स्वरूप ही भूल गए हैं :
मन तूं जोति सरूपु है आपणा मूलु पछाणु ॥ (पन्ना ४४१)
भौतिकवाद से त्रस्त मानव के लिए अध्यात्म जीवन-पथ है । विषयासक्ति द्वारा भ्रमित होकर हमारा चित्त विकृत हो जाता है और विवेकहीनता के वशीभूत हम विनाश की ओर अग्रसर होते हैं। इसके विपरीत अध्यात्म जीवन का उन्नायक पथ है, जीवन का शुद्धीकरण है। जिस प्रकार आंख संपूर्ण विश्व को देखती है, लेकिन स्वयं को नहीं देख पाती, ठीक उसी प्रकार आत्मतत्व, आत्मनिरीक्षण व अनुभव की वस्तु है। स्वयं अंत:प्रेरणा से इसकी सिद्धि होती है। आध्यात्मिकता का संबंध किसी धर्म – विशेष, जाति अथवा क्षेत्र से नहीं है । आध्यात्मिकता विश्वव्यापी है; हर व्यक्ति के लिए एक समान है ।
आध्यात्मिक जीवन में गुरु का स्थान : आध्यात्मिक जीवन में गुरु का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है और यह बात पूर्णतः मानने योग्य है कि गुरु के बिना मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन का सफल होना असंभव है:
मत को भरमि भुलै संसारि ॥
गुर बिनु कोइ न उतरसि पारि ॥ ( पन्ना १३८)
जिस प्रकार भूल-भुलैया वाली इमारत के अंदर जाने और वहां से सकुशल वापिस आने के लिए एक ऐसे मार्गदर्शक की आवश्यकता होती है जो उस इमारत के समस्त भेदों को अच्छी तरह जानता हो, उसी प्रकार आध्यात्मिक जीवन को सफल बनाने के लिए ऐसे आध्यात्मिक गुरु की जरूरत पड़ती है जो उसके रहस्यों से भली-भांति परिचित हो और साधक को उचित ज्ञान करा सके। गुरु के निर्देशन में सफलता प्राप्त की जा सकती है। गुरु जीवन रूपी नाव के लिए मल्लाह भी है और पतवार भी । इस मल्लाह और पतवार के अभाव में आध्यात्मिक जीवन की नाव सांसारिक भंवर में फंसकर डूब जाती है :
बाझु गुरू डुबा संसारु ॥ (पन्ना १३८)
गुरु अपने ज्ञान एवं निर्देशन से सिक्ख के अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश कर देता है। वह सिक्ख के भौतिक नेत्रों को खोलने के साथ ही उसके अंत:चक्षु में भी विराट ज्योति उत्पन्न कर देता है। ईश्वर क्या है, कहां है और उसकी प्राप्ति कैसे हो सकती है आदि प्रश्नों के उत्तर गुरु की कृपा द्वारा सहज ही प्राप्त हो जाते हैं। गुरु के बिना संसार अंधकारमय है, चाहे अनगिनत सूर्य व चंद्रमा उदय होते रहें :
जे सउ चंदा उगवहि सूरज चड़हि हज़ार ॥
एते चानण होदिआ गुर बिनु घोर अंधार ॥ (पन्ना ४६३)
यद्यपि जीव ब्रह्म (प्रभु) का ही अंश है तथापि भौतिकता के वशीभूत होकर वह आत्मस्थ चैतन्यस्वरूप परम प्रभु का साक्षात्कार नहीं कर पाता है। प्रभु -मिलाप में बाधक बने भौतिक आवरण को विच्छिन्न करने के लिए शक्तिशाली माध्यम की आवश्यकता होती है । यह शक्तिशाली माध्यम गुरु ही है ।
गुरबाणी के अनुसार ‘शब्द’ (शब्द) : गुरबाणी में ‘शब्द’ को अत्यंत व्यापक रूप में लिया गया है। यहां ‘शब्द’ अनादि है, नित्य है, सर्वव्यापी है, अविनाशी है और सृष्टि की उत्पत्ति का स्रोत है :
–कीता पसाउ एको कवाउ ॥
तस ते होए लख दरीआउ ॥ ( पन्ना ३)
— उतपति परलउ सबदे होवै ॥
सबदे ही फिरि ओपति होवै ॥ (पन्ना ११७)
यह ‘शब्द’ परमात्मा आप ही है, जिसे ‘ओअंकार’ कहा गया है। गुरबाणी में ओअंकार इस सर्वव्यापी ‘शब्द’ को ही अभिव्यक्त करता है। जहां एक तरफ ‘शब्द’ से सृष्टि की उत्पत्ति बताई गई है वहीं ओअंकार से भी इसकी उत्पत्ति का उल्लेख है :
ओअंकारि ब्रहमा उतपति ॥
ओअंकारु कीआ जिनि चिति ॥
ओअंकारि सैल जुग भए ॥
ओअंकारि बेद निरमए ॥ ( पन्ना ९२९ )
‘शब्द’ हुक्म रूप में सारी सृष्टि के अंदर समाया हुआ है। वह नाम रूप में चारों दिशाओं में हर जगह विद्यमान है, कण-कण में व्याप्त है :
चहुदिसि हुकमु वरतै प्रभु तेरा
चहुदिसि नाम पतालं ॥ (पन्ना १२७५)
गुरबाणी में ‘शब्द’ को अमृत कहा गया है। ‘शब्द’ ही अमृत है । ‘शब्द’ रूपी अमृत का प्रवाह निरंतर जारी है :
–अम्रितु एको सबदु है नानक गुरमुखि पाइआ ॥ (पन्ना ६४४)
— झिमि झिमि वरसै अम्रित धारा ॥
मनु पीवै सुनि सबदु बीचारा ॥ ( पन्ना १०२ )
‘शब्द’ ज्योति-रूप है, जो अज्ञानता रूपी भय का खंडन कर देता है । जिस प्रकार अंधेरे में पड़ी रस्सी को सर्प समझ लेने से भय उत्पन्न होता है और प्रकाश द्वारा वास्तविक स्थिति की समझ आ जाने
पर भय दूर हो जाता है, उसी प्रकार ‘शब्द’ रूपी ज्योति के प्रकाश में अज्ञानता रूपी अंधेरे का भय दूर हो जाता है :
सबदि जोति जगाइ दीपकु नानका भउ भंजनो ॥ ( पन्ना ८४३)
‘शब्द’ गुरु भी है। ‘शब्द’ रूपी गुरु के बिना अज्ञानता का अंधकार दूर नहीं हो सकता। गुरु के बिना जगत माया के प्रभाव से बौराया हुआ फिरता है:
— सबदु गुरु सुरति धुनि चेला ॥ ( पन्ना ९४३)
— सबदु गुर पीरा गहिर गंभीरा बिनु सबदै जगु बउरानं ॥ (पन्ना ६३५)
शबद-गुरु : श्री गुरु नानक देव जी का शब्द – गुरु – सिद्धांत अन्य मतों की अपेक्षा भिन्न है। यहां शरीर गुरु नहीं है। वास्तव में ज्योति ही गुरु है । परमात्मज्योति का नाम ‘नानक’ है। श्री गुरु नानक साहि से लेकर श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी तक एक ही गुरु-ज्योति विद्यमान रही है। वही गुरु-ज्योति अब श्री गुरु ग्रंथ साहिब के रूप में उपस्थित है। गुरबाणी में ज्योति की एकता की पुष्टि की गई है :
— जोति रूपि हरि आपि गुरू नानकु कहायउ ॥
ता ते अंगदु भयउ त सिउ ततु मिलाउ ॥ (पन्ना १४०८)
–जोति ओहा जुगति साइ
सहि काइआ फेरि पलटीऐ ॥ ( पन्ना ९६६)
समस्त गुरु साहिबान की बाणी में ‘नानक’ नाम की मुहर लगी है, जो गुरु-ज्योति की एकता का प्रमाण है। चूंकि गुरु-ज्योति अगम – अगोचर है, इसलिए जनसामान्य को उसका अनुभव नहीं हो सकता है । मानव-शरीर में प्रकाशित होकर गुरु-ज्योति इंद्रियगोचर बन जाती है। ज्योति उसी शरीर में प्रज्वलित होती है जो उसके योग्य होता है और जिस शरीर में गुरु-ज्योति प्रकाशित होती है वह शरीर भी गुरुमय हो जाता है। ऐसे शरीर तथा उसे जन्म देने वाले माता-पिता और उस कुल को धन्य कहा गया है:
धनु धनु पिता धनु धनु कुलु धनु धनु सु जननी जिनि गुरू जणिआ माइ ॥ (पन्ना ३१० )
श्री गुरु नानक देव जी का सिद्धांत अत्यंत व्यापक है । ‘शब्द’ हुक्म रूप में हर जगह विद्यमान है :
बाणी गुरू गुरू है बाणी विचि बाणी अम्रितु सारे ॥ (पन्ना ९८२)
श्री गुरु ग्रंथ साहिब की सम्पूर्ण बाणी अकथ्य की कथा है।
निष्कर्ष : सम्पूर्ण विचार में स्पष्ट रूप से यह निष्कर्ष निकल कर सामने आता है कि आध्यात्मिकता मानव जीवन का उन्नायक पथ है। परम तत्व की खोज ही इसका लक्ष्य है। आध्यात्मिक मार्ग पर चलकर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए गुरु रूपी माध्यम की विशेष आवश्यकता होती है।
आध्यात्मिक मार्ग अत्यंत कठिन है। खंडे की धार से भी अधिक तेज व बाल से भी ज्यादा बारीक है यह मार्ग। इस पर चलने के लिए इसी मार्ग के अनुरूप बनना पड़ता है। इस मार्ग पर चलने के अनुकूल बनाने वाला माध्यम ‘शबद – गुरु’ है। ‘शब्द – गुरु’ से अधिक उपयुक्त कोई अन्य माध्यम नहीं हो सकता ।
