– डॉ. राजेंद्र सिंघ साहिल
किसी समाज का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि उस समाज में, उस समाज के क्रिया कलाप में स्त्रियों की क्या भूमिका है। गुरमति विचारधारा को प्रफुल्लित एवं स्थापित करने में अनेक कर्मठ एवं समर्पित स्त्रियों का योगदान रहा है। गुरु साहिबान, अद्वितीय सिक्खों एवं शहीद सिंघों के साथ-साथ गुरमति के पौधे को जिन अनगिनत स्त्रियों ने अपने प्रेम और समर्पण से सींचा, उनमें दूसरी पातशाही श्री गुरु अंगद देव जी की सुपत्नी माता खीवी जी का नाम विशेष महत्व वाला है। माता खीवी जी अपने गुरु – पति के साथ मिलकर मानवता का ऐसा बेमिसाल केंद्र निर्मित किया जो आज तक समस्त लोक को प्रेम और समर्पण का पाठ पढ़ाता आ रहा है।
जन्म एवं बालपल : श्री खडूर साहिब के पास एक गांव है — संघर। इस गांव में एक बड़े साहूकार थे– भाई देवी चंद जी । इन्हीं भाई देवी चंद जी के घर पुत्री रूप में माता खीवी जी का जन्म हुआ। प्राचीन स्रोतों में माता खीवी जी की जन्म- तिथि का कहीं कोई जिक्र नहीं मिलता। माता जी के जन्म-दिवस के बारे में केवल अनुमान लगाए जाते हैं। प्रो. करतार सिंघ के अनुसार माता खीवी जी का जन्म सन् 1506 ई. में हुआ ।
एक अन्य इतिहासकार ज्ञानी ऊधम सिंघ ने माता खीवी जी की माता का नाम ‘करम देई’ लिखा है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि माता खीवी जी का जन्म भाई देवी चंद जी और माता करम देई जी के घर संघर गांव में सन् 1506 ई. में हुआ।
माता खीवी जी का बचपन गांव संघर में ही बीता। माता जी बचपन से ही नेक और विनम्र स्वभाव वाले थे। विवाह : माता खीवी जी का विवाह सन् 1519 ई. में मत्ते दी सरां ( सराय नागा ) गांव के भाई फेरू जी के सुपुत्र भाई लहिणा जी के साथ हुआ। भाई फेरू जी ने कुछ समय गांव संघर तथा हरी के पत्तन में भी कारोबार किया और अंततः खडूर साहिब में जाकर अपना साहूकारा जमा लिया। व्यापार इस परिवार का खानदानी पेशा था यह परिवार आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध था। भाई लहिणा जी घर के कारोबार में हाथ बँटाते और माता खीवी जी घर का काम-काज संभालतीं ।
सन् 1526 ई. में भाई फेरू जी अकाल प्रस्थान कर गए। कारोबार की सारी जिम्मेदारी भाई लहिणा जी ने संभाल ली। माता खीवी जी की घर की देखभाल संबंधी जिम्मेदारी और भी बढ़ गई, जिसे माता जी बाखूबी निभाती रहीं ।
श्री गुरु नानक देव जी की सेवा में भाई लहिणा जी : सन् 1532 ई. में भाई लहिणा जी ने भाई जोध जी से श्री गुरु नानक देव जी की बाणी सुनी और इतने प्रभावित हुए कि श्री करतारपुर साहिब जाकर श्री गुरु नानक देव जी के दर्शन करने का मन बना लिया। भाई लहिणा जी श्री करतारपुर साहिब क्या पहुंचे कि श्री गुरु नानक देव जी के ही होकर रह गए। सन् 1532 ई. से लेकर सन् 1539 ई. तक पूरे सात वर्ष तक भाई लहिणा जी गुरु सेवा में लीन रहे ।
गुरु- पति का सहयोग : भाई लहिणा जी की गुरु सेवा अत्यंत प्रसिद्ध है। विनम्र आज्ञाकारी सेवक के रूप में अहं से कोसों दूर रहकर आपने ऐसी सेवा की, जिसकी मिसाल मिलना मुश्किल है। श्री गुरु अंगद देव जी को गुरुआई प्राप्त होने में सेवा- भाव और समर्पण के साथ-साथ माता खीवी जी के सहयोग की बहुत बड़ी भूमिका रही ।
करतारपुर साहिब में भाई लहिणा जी गुरुआई प्राप्त कर श्री गुरु अंगद देव जी बन गए और श्री गुरु नानक देव जी की आज्ञा के ‘अनुसार श्री खडूर साहिब वापस आकर धार्मिक प्रचार-प्रसार में जुट गए। माता खीवी जी गुरु-पति के हर कार्य में बढ़-चढ़ कर भाग लेतीं और जिम्मेदारियां संभालतीं।
गुरु के लंगर की व्यवस्थापक : लंगर प्रथा श्री गुरु नानक देव जी ने श्री करतारपुर साहिब में ही आरंभ कर दी थी। द्वितीय पातशाह श्री गुरु अंगद देव जी के काल में लंगर व्यवस्था को और पुष्ट तथा सुदृढ़ किया गया।
ऐसे में लंगर की सेवा माता खीवी जी का मुख्य क्षेत्र हो गया। माता जी मुंह अंधेरे उठकर लंगर की व्यवस्था में लग जाते। सारा दिन अटूट लंगर बंटता। हर वर्ग-जाति के लोग बिना भेदभाव के एक ही पंगत में बैठकर लंगर छकते।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में दर्ज भाई सता जी- भाई बलवंड जी की ‘रामकली की वार’ में माता खीवी जी की इस सेवा की मुक्त कंठ से प्रशंसा की गई है।
भाई बलवंड जी के शब्दों में, माता खीवी जी अपने पति के समान ही नेक हैं। माता जी की जीवन- छाया घने पत्तों वाले वृक्ष के समान सुखदायी है। गुरु जी नाम की दौलत बांट रहे हैं और माता खीवी जी लंगर में घी वाली खीर वितरित कर रहे हैं :
बलवंड खीवी नेक जन
जिसु बहुती छाउ पत्राली ।
लंगरि दउलति वंडीऐ
रसु अंम्रितु खीरि घिआली ॥
गुरसिखा के मुख उजले मनमुख थीए पराली ॥
पए कबूलु खसंम नालि जां घाल मरदी घाली ॥
माता खीवी सहु सोइ जिनि गोइ उठाली ॥ ( पन्ना 967)
गुरु-पति के फैसलों का समर्थन माता खीवी जी बड़ी स्पष्ट और सिद्धांतवादी थीं। माता जी ने गुरु-पति श्री गुरु अंगद देव जी के हर निर्णय का सदा समर्थन किया और कहीं भी लौकिक- पारिवारिक मोह या स्वार्थ को आड़े नहीं आने दिया ।
जब सन् 1552 ई. में द्वितीय पातशाह श्री गुरु अंगद देव जी ज्योति जोत समाने लगे तो उन्होंने अपने परम सेवक गुरु अमरदास जी को सभी प्रकार से योग्य जान कर गुरुआई सौंपी, तो माता खीवी जी ने गुरु पति के इस निर्णय का पूर्ण समर्थन किया ।
इस निर्णय से नाराज होकर गुरु-पुत्र बाबा दातू और बाबा दासू तृतीय पातशाह श्री गुरु अमरदास जी से ईर्ष्या – भाव रखने लगे। इस स्थिति में भी माता खीवी जी ने श्री गुरु अमरदास जी का पक्ष लिया और दोनों पुत्रों को उनकी धृष्टता और उद्दंडता पर धिक्कारा |
तृतीय पातशाह के काल में माता खीवी जी : तृतीय पातशाह श्री गुरु अमरदास जी के गुरु-काल में भी माता खीवी जी श्री गोइंदवाल साहिब में निवास करते रहे। गुरु के लंगर की संपूर्ण जिम्मेदारी अभी भी माता जी के ही पास थी। माता जी निरंतर लंगर की सेवा में लगे रहे और बड़े समर्पित भाव से अपने कर्त्तव्य का पालन करते रहे। माता खीवी जी ने लंबे समय तक गुरु के लंगर का संचालन किया।
जब माता खीवी जी अत्यंत वृद्ध हो गए तो श्री गोइंदवाल साहिब से श्री खडूर साहिब आ गए और अपने पुत्र बाबा दासू के साथ रहने लगे।
चतुर्थ पातशाह के काल में माता खीवी जी: सन् 1574 ई. में तृतीय पातशाह श्री गुरु अमरदास जी ज्योति जोत समाए और श्री गुरु रामदास जी चतुर्थ पातशाह के रूप में गुरुआई पर सुशोभित हुए। इन दिनों में माता खीवी जी श्री खडूर साहिब में पुत्र बाबा दासू के साथ रह रहे थे।
जब श्री अमृतसर नगर की स्थापना हुई तो माता खीवी जी श्री अमृतसर साहिब आ गए और यहां कुछ समय तक रहे । पंचम पातशाह के काल में माता खीवी जी : सन् 1581 ई. में पंचम पातशाह श्री गुरु अरजन देव जी गुरुआई पर सुशोभित हुए। माता खीवी जी इस समय तक बहुत ही वृद्ध हो चुके थे। माता खीवी जी ने पुत्रों — बाबा दातू और बाबा दासू भूलें पंचम पातशाह से बख्शवाईं। पंचम पातशाह ने माता जी का भरपूर सम्मान किया ।
माता खीवी जी का देहावसान : श्री खडूर साहिब में ही सन् 1582 ई. (संवत् 1639) में अत्यंत वृद्ध हो चुके माता खीवी जी का देहावसान हुआ। इस समय माता जी की आयु लगभग 76 वर्ष थी। पंचम पातशाह स्वयं माता जी के अंतिम संस्कार में उपस्थित हुए :
संमत सोला सै उनताली जब भए ।
माता खीवी जी सुरपुर नूं गए।
गुरु अरजन जी बासरकीओ आए खडूर मुकाणी ।
दासू जी नूं पगि सी बनणी (बंसावलीनामा)
खुले हाथों से लंगर की दौलत बांटने वाले, धर्म की मूरत, सेवा-समर्पण के साकार रूप माता खीवी जी सिक्ख धर्म के मूल मानवतावादी रूप में रंग भरने वाले रहे हैं।
