सेवा

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February 07, 2026

सेवा से तात्पर्य है कि कोई भी काम निःशुल्क रूप में करना, जिससे व्यक्ति को मानसिक संतुष्टि हो, जिसमें परोपकार की भावना हो, जिससे अपना और दूसरों का भला हो। वास्तव में सेवा एक साधना मार्ग है, जिसमें अपनी मानसिक प्रसन्नता के साथ-साथ मानवता के भले की बात होती है। सांसारिक स्तर पर उपजीविका कमाने की खातिर किए गए काम को भी सेवा मान लिया जाता है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अनुसार सेवा हउमै का त्याग करके मानवता के भले के लिए किया गया ऐसा कार्य है, जिससे प्रभु-पिता की प्रसन्नता प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है।

गरीब एवं ज़रूरतमंद की सहायता भी सेवा है। गरीब के बच्चों की विद्या प्राप्ति में सहायता करना, मकान बनाकर देना, उनका विवाह करना भी सेवा है। गांव-शहर के रास्ते साफ करना, वातावरण प्रदूषण रहित बनाना, सार्वजनिक स्थानों पर पानी के नल आदि लगाना, बीमारों की मेडिकल सहायता इत्यादि सेवा की कोटि में आते हैं। इससे मन को प्रसन्नता मिलती है तथा विकारों एवं अहं का नाश होता है। संगत के बरतन साफ करने, जल सेवा, लंगर सेवा, पंखे की सेवा, गुरबाणी पढ़ने-पढ़ाने के लिए धार्मिक पुस्तकें, पोथियां आदि खरीदकर निःशुल्क बांटना, दूसरों दूसरों को श्री गुरु ग्रंथ साहिब के संग जोड़ना, खंडे बाटे का अमृत छकाना, कीर्तन करना आदि भी सेवा है।
सेवा किसी प्रकार की भी हो, सेवा करने का प्रथम चरण अपने अहं का त्याग करना और किसी प्रकार का दिखावा नहीं करना है।

गुरबाणी का पावन वचन है :

आपु गवाइ सेवा करे ता किछु पाए मानु ॥
(अंग ४७४)

अगर प्रभु-प्राप्ति की मन में इच्छा हो तो

मानवता की सेवा अनिवार्य है :

-विचि दुनीआ सेव कमाईऐ ॥

ता दरगह बैसणु पाईए ॥

(अंग २६)

-सा सेवा कीती सफल है जितु सतिगुर का मनु
मंने ॥

(अंग ३१४)

सेवा तन, मन, धन से की जा सकती है। सेवा की कोई गिनती-मिनती नहीं करनी चाहिए कि मैंने इतनी सेवा की, मैंने वो सेवा की, मैं इतने वर्षों से सेवा कर रहा हूं। गिनती-मिनती की सेवा कभी भी प्रवान नहीं होती। लोगों को दिखाने के लिए की गई सेवा व्यर्थ है :

गणतै सेव न होवई कीता थाइ न पाइ ॥

(अंग १२४६)

प्रभु-नाम-सिमरन से सांसारिक और आध्यात्मिक सभी प्रकार की वस्तुएं प्राप्त हो जाती हैं। नाम की सेवा सभी सेवाओं से श्रेष्ठ है। गुरु-शबद की विचार करनी भी सेवा है :

गुर की सेवा सबदु वीचारु॥
हउमै मारे करणी सारु ॥
(अंग २३३)

ऐसे महापुरुष जो आप नाम-सिमरन में
दिन-रात लीन रहते हैं, दूसरों को भी नाम-सिमरन में लगाते हैं, अपने संगी-साथियों को केवल एक ईश्वर के साथ जोड़ते हैं, धन्य हैं, गुरबाणी में ऐसी सेवा ही प्रवान है :

नामु हमारै पूजा देव ॥
नामु हमारै गुर की सेव ॥

(अंग ११४५)

कबीर सेवा कउ दुइ भले एकु संतु इकु रामु ॥ रामु जु दाता मुकति को संतु जपावै नामु ॥

(अंग १३७३)

सिक्ख इतिहास में दर्ज है कि सेवक अपने गुरु की सेवा करके उसमें विभेद हो गया। गुरु और सेवक में कोई अंतर न रहा। सेवक गुरु का हुक्म मानकर गुरु में ही समा गया। गुरु सेवक और सेवक गुरु बन गया। श्री गुरु अंगद देव जी, श्री गुरु अमरदास जी, श्री गुरु रामदास जी ने अपने सतिगुरु जी की निष्काम और त्याग-भावना से ऐसी सेवा की जिसके फलस्वरूप

उनको गुरु-पद की प्राप्ति हो गई :

हरि जनु हरि हरि होइआ नानकु हरि इके ॥

(अंग ४४९)

-डॉ. रछपाल सिंह*