केशों की महानता

हिन्दी
March 25, 2026

दुनिया में जहां कहीं भी गुरु, पीर, फकीर, ऋषि, मुनि, साधु, संत, भक्त हुए हैं, वे सभी केशधारी, साबत सूरत वाले हुए हैं। वे अपने कर्म-व्यवसाय, नाम-सिमरन में तल्लीन तो रहते ही थे, साथ ही अपने प्राकृतिक स्वरूप की संभाल भी किया करते थे। वे केशों को नहीं काटते थे। वे सभी केशों के महत्त्व तथा उपयोगिता से भली-भांति परिचित थे। जब भी कोई बच्चा पैदा होता है तो केश लिए ही पैदा होता है, फिर बड़ा होने पर सिर के केश, दाढ़ी-मूंछ वगैरह काटकर या कटवाकर वाहिगुरु द्वारा दी गई साबत सूरत को क्यों बिगाड़ा जाए? बालों में शक्ति होती है। इस बात को स्वास्थ्य-विज्ञान (मेडिकल साइंस) ने भी सिद्ध किया है।

सिक्खों में रहित मर्यादा के तहत केश, कंघा, कड़ा, कृपाण और कछहिरा इन पांच ककारों का बहुत महत्त्व है। केश शक्ति व ताकत का प्रतीक हैं। कंघे से केशों को संवारा जाता है। जब केशों में कंघा फेरा जाता है तो एक विशेष किस्म की ऊर्जा पैदा होती है। इस ऊर्जा का संचार सिर से लेकर पांव तक पूरे शरीर में होता है। यह अनुभव की बात है।

लोहे से बना कड़ा पहनने से भी शरीर को बहुत लाभ मिलता है। लोहे के कड़े द्वारा शरीर के साथ रगड़ खाते रहने से नये लाल रक्त-कणों का निर्माण होता रहता है। जो लोग लोहे के बर्तनों में भोजन पकाते हैं, खाते हैं, उन्हें कभी खून की कमी नहीं होती। वे एनीमिया का शिकार नहीं होते हैं।

कृपाण धारण करने से आत्मविश्वास
बढ़ता है; अपनी व अन्य की मुश्किल समय में सुरक्षा करने की भावना सुदृढ़ होती है। कृपाण अन्याय, जुल्म, अत्याचार के विरुद्ध जूझने का, रण-क्षेत्र में धर्म की खातिर कुर्बान होने का जज़्बा पैदा करती है। कृपाणधारी सिक्खों को सदैव सत्कार मिला है और मिलता रहेगा। जिस पर वाहिगुरु की विशेष कृपा हो, उसे ही कृपाण धारण करने का मौका मिलता है। ‘कृपाण’ शब्द कृपा आन से बना है।

कछहिरा केवल नंगेज़ ढंकने का वस्त्र मात्र नहीं है, यह तो जत्-सत् का प्रतीक है। यह उच्च आचरण, सदाचार का प्रतीक है। कछहिरा हमें उच्च आचरण, सदाचार हेतु जत्-सत् देता है, शक्ति देता है, प्रेरणा देता है। पांच ककारों में इसका खास महत्त्व है।

पांच ककारों में ही केशों का भी खास महत्त्व है। हमने केशों की शक्ति व ताकत की बात की है। यह बात बिलकुल सही सिद्ध हो चुकी है। केश काटने या कटवाने से शरीर में फास्फोरस की कमी हो जाती है। इस कमी को पौष्टिक आहार या दवाओं द्वारा पूरा करना पड़ता है। जैसे-जैसे केश काटे जाते हैं, तैसे-तैसे पुनः बढ़ने में फास्फोरस की काफी खपत हो जाती है। अगर बालों को न काटा जाए तो इसकी कमी नहीं होती है। शरीर में प्रोटीन, कैल्शियम और शर्करा पचाने के लिए फास्फोरस का होना बहुत ज़रूरी होता है। हमारा शरीर फास्फोरस का इस्तेमाल इसके संयुक्त तत्वों के रूप में करता है। ये तत्व हमें दूध, पनीर, सभी अनाजों, सूखे मेवों आदि से प्राप्त होते हैं।
फास्फोरस की कमी से शरीर का वज़न कम हो जाता है, खून की कमी हो जाती है और शरीर का पूर्ण व सही विकास नहीं हो पाता है। इससे पता चलता है कि फास्फोरस हमारे लिए बहुत जरूरी है और केशों का रखरखाव उससे भी जरूरी है।

37

केशों से और सिर पर सजी दसतार से सिक्ख पूरी दुनिया में अपनी अलग व विशेष पहचान बनाए हुए हैं तथा शान से सरदार कहलाते हैं। हां, कुछेक विदेशी मुल्कों में सियासत व भेदभाव से ग्रस्त होकर सिक्खों की अलग पहचान के बारे में भ्रांतियां पैदा की जा रही हैं। हमें विचलित नहीं होना चाहिए बल्कि अपने सिक्खी स्वरूप को कायम रखने के लिए हर कुर्बानी के लिए तैयार रहना चाहिए। यही सिक्खी की महान परंपरा रही है। हमारी अलग व विशेष पहचान ही हमारी गौरवशाली विरासत है। सिक्खी सदाचार से, परोपकार की भावना से भरपूर फलसफा है; जीने का और हंसते-हंसते सिक्खी-उसूलों, सिद्धांतों के लिए कुर्बान होने का एक विशेष अंदाज़ है, ढंग है। यूं ही तो नहीं कहा गया- “केश गुरु की मुहर हैं।” सिक्खों का प्रथम उसूल ही केशों की हिफाज़त करना होता है। हमें पतित होने से बचना चाहिए तथा साबत सूरत बनना चाहिए। अनेक शहीदों ने शहादत देकर सिक्खी की आन, बान और शान को कायम रखा है। प्रतिदिन उन शहीदों को अरदास करते समय याद किया जाता है :

“जिन्हां सिंघां सिंघणीयां ने धरम हेत शीश दित्ते, बंद-बंद कटाए, खोपरीआं लुहाई, चरखड़ीआं ‘ते चढ़े, आरिआं नाल चिराए गए, गुरदुआरिआं दी सेवा लई कुरबानीआं कीतीआं, धरम नहीं हारिआ, सिक्खी केसां सवासां संग निभाई, तिन्हां दी कमाई दा धिआन धरके खालसा जी! बोलो जी वाहिगुरु।”
वाहिगुरु के आगे केशों का दान मांगते हुए अरदास की जाती है :

“सिक्खां नूं सिक्खी दान, केस दान, रहित दान, बिबेक दान, विसाह दान, भरोसा दान, दानां सिर दान, नाम दान, श्री अंम्रितसर जी दे खुले दरशन दीदार, चौकी, झंडे, बुंगे जुगो जुग अटल, धरम का जैकार, बोलो जी वाहिगुरु।”

प्रत्येक ककार स्वयं में महत्त्वपूर्ण है। एडमंड कैडलर कहते थे कि श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी हिंदोस्तान में पहले मनोविज्ञानी गुरु हैं, जिन्होंने हर चीज़ का एवं खासकर स्टील का सही इस्तेमाल सिक्खों को सिखाया है। गुरु जी का पांच ककार रखने का सिक्खों को आदेश देना वक्त की ही जरूरत नहीं थी, बल्कि हर समय के लिए एक जरूरी अंग है। केशों का सीधा संबंध जत्थेबंदी के पक्ष के साथ है। केशों ने सिक्खों की जत्थेबंदी को बचाए रखा है और अब तक बचाए आ रहे हैं। श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी ने केश एक ऐसी कसौटी के रूप में बताए हैं, जिससे पता चल जाता है कि कौम में कहां व कितनी कमी हो रही है। केशों से ही हमारी जत्थेबंदक एकता कायम है। केशों को खूबसूरती का आखिरी चिन्ह कहा गया है। श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी ने केशों की संभाल करना जरूरी बतलाया है। जिस स्थान पर खालसा की साजना की, उस स्थान को ‘केसगढ़’ (केशगढ़) कहा जाता है। केशों का सत्कार न करने वाला पूर्ण सिक्ख नहीं हो सकता। पूर्ण सिक्ख वही है,

जो केशों का सत्कार करे।

कुछ गैरसिक्ख स्त्री-पुरुष अपने सिर के बालों के बल से ट्रक, बस, रेलइंजन, हवाई जहाज़ आदि खींचकर इनकी ताकत का प्रदर्शन करते रहते हैं। जिनके सिर पर बाल न हों, वे स्त्री-पुरुष इनके लिए तरस जाते हैं और कई तरह के इलाज इन्हें पाने (उगाने) हेतु करवाते हैं।

-डॉ. कशमीर सिंघ ‘नूर’