संत भिंडरांवाले की शहादत और विरासत को समर्पित विशाल आयोजन में बंदी सिखों की रिहाई की मांग उठी
शहीदों का बलिदान कौम की अमूल्य धरोहर : संत ज्ञानी हरनाम सिंह खालसा
संत भिंडरांवाले की विरासत सिख कौम के लिए प्रेरणा स्रोत : हरजिंदर सिंह धामी
चौंक महिता-जून 1984 के तीसरे घल्लूघारे की 42वीं शहीदी वर्षगांठ आज दमदमी टकसाल के मुखी संत ज्ञानी हरनाम सिंह खालसा भिंडरांवाले की अगुवाई में टकसाल के केंद्रीय स्थान गुरुद्वारा गुरदर्शन प्रकाश, महिता में मनाई गई। इस अवसर पर अभूतपूर्व संगत एकत्रित हुई और शहीदों को श्रद्धापूर्वक नमन किया गया।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित इस समागम में विशाल पंथक एकत्रीकरण हुआ, जिसमें संत समाज के संत-महापुरुषों, दिल्ली कमेटी और शिरोमणि कमेटी के अध्यक्षों एवं सदस्यों, निहंग सिंह जत्थेबंदियों तथा अन्य संप्रदायों के प्रमुखों के अलावा अनेक धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक हस्तियों ने विशेष रूप से भाग लिया।
अपने शहीदों के सम्मान में लाखों की संख्या में दमदमी टकसाल पहुंची संगतों ने इस बात की पुष्टि की कि दमदमी टकसाल जत्था भिंडरां ने अपनी रहित मर्यादा और सिद्धांतों को अक्षुण्ण बनाए रखा है तथा अपने आदर्शों पर चलते हुए सदैव अपनी उच्च, सत्यनिष्ठ और पवित्र सोच की रक्षा की है।
इस अवसर पर संत भिंडरांवाले के सुपुत्र भाई ईश्वर सिंह सहित शहीद सिंहों के परिवारों तथा बंदी सिंहों और उनके परिवारों का सम्मान किया गया। इस वर्ष विशेष “सेवा रत्न सम्मान” संत बाबा राम सिंह ऋषिकेश को प्रदान किया गया।
संत ज्ञानी हरनाम सिंह खालसा ने अपने संबोधन में कहा कि गुरु काल के बाद यदि किसी महान सिख व्यक्तित्व को सबसे अधिक सम्मान और आदर प्राप्त हुआ है, तो वह संत जरनैल सिंह खालसा भिंडरांवाले हैं। उन्होंने कहा कि संत भिंडरांवाले जैसे परोपकारी, साहसी योद्धा और गुरसिख विरले ही होते हैं, जिन्हें गुरु महाराज विशेष गुणों और कृपा से विभूषित करते हैं।
उन्होंने कहा कि जून 1984 में सिख कौम की अस्मिता को कुचलने के उद्देश्य से तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार द्वारा श्री दरबार साहिब, श्री अकाल तख्त साहिब तथा अन्य 37 गुरुद्वारों पर हमला किया गया। इस दौरान दमदमी टकसाल के सिंहों ने अपने गुरुधामों की रक्षा करते हुए अत्याचार का डटकर सामना किया और सरकारी आदेशों के आगे झुकने के बजाय हंसते-हंसते शहादत स्वीकार की। उन्होंने कहा कि इस सैन्य कार्रवाई के दौरान श्री गुरु अर्जन देव जी का शहीदी गुरुपर्व मनाने आईं सैकड़ों निर्दोष संगतें भी सरकारी दमन का शिकार हुईं।
संत हरनाम सिंह खालसा ने कहा कि संत भिंडरांवाले ने उस समय सिख युवाओं को गुरसिखी की ओर प्रेरित किया, जब सिखी से दूर जाने की प्रवृत्ति बढ़ रही थी। उन्होंने सिख कौम को पुनः गुरबाणी, गुरसिखी और पंथक चेतना की ओर मोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने श्री अकाल तख्त साहिब की बेअदबी और अपमान का बदला लेने वाले भाई केहर सिंह, भाई बेअंत सिंह और भाई सतवंत सिंह को भी श्रद्धांजलि अर्पित की तथा उनकी कुर्बानियों को स्मरण किया।
संत ज्ञानी हरनाम सिंह खालसा ने केंद्र सरकार से बंदी सिंहों की तत्काल रिहाई की मांग करते हुए कहा कि पंजाब से जुड़े लंबे समय से लंबित मुद्दों के समाधान हेतु भी ठोस और गंभीर कदम उठाए जाने चाहिए। उन्होंने कहा कि न्याय, संवाद और संविधानिक अधिकारों के सम्मान के माध्यम से ही पंजाब और देश की एकता तथा शांति को और अधिक सुदृढ़ किया जा सकता है।
सच्चखंड श्री हरिमंदिर साहिब के हेड ग्रंथी सिंह साहिब ज्ञानी अमरजीत सिंह तथा सिंह साहिब भाई पिंदरपाल सिंह, ग्रंथी श्री दरबार साहिब ने कहा कि तीसरे घल्लूघारे के दौरान दमदमी टकसाल के सिंहों ने गुरुधामों की रक्षा के लिए भारतीय सेना का सामना करते हुए शहादत प्राप्त की, किंतु आत्मसमर्पण नहीं किया। उन्होंने कहा कि ये गौरवपूर्ण शहादतें दमदमी टकसाल की विरासत हैं और इस संस्था का इतिहास ऐसे बलिदानों से भरा हुआ है।
उन्होंने कहा कि इस जत्थेबंदी ने सदैव सिद्धांतों पर चलते हुए बाणी और बाणे के सम्मान को बनाए रखा है तथा ‘शब्द’ गुरु के प्रचार और ‘पंथ’ के प्रसार के लिए महत्वपूर्ण सेवाएं निभाई हैं।
तख्त श्री हज़ूर साहिब, नांदेड़ के जत्थेदार सिंह साहिब ज्ञानी कुलवंत सिंह जी की ओर से पहुंचे ज्ञानी सरबजीत सिंह जी ने अपने संबोधन में संत जरनैल सिंह खालसा भिंडरांवाले द्वारा नांदेड़ साहिब की पवित्र धरती पर की गई सेवा और बंदगी का विशेष उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पंथ की चढ़दी कला और सिख कौम की आन-बान की रक्षा के लिए संत भिंडरांवाले और उनके साथियों ने महान बलिदान दिए। उन्होंने चढ़कर आई सेना का अद्भुत साहस और दृढ़ता के साथ मुकाबला किया। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र के सिख समाज में संत ज्ञानी हरनाम सिंह खालसा के निरंतर प्रयासों से पंथक चेतना, गुरमत प्रचार और सिख सरोकारों के प्रति विशेष जागरूकता आई है तथा संगतों का गुरु घर और पंथ के साथ जुड़ाव और अधिक मजबूत हुआ है।
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष सरदार हरजिंदर सिंह धामी ने दमदमी टकसाल के मुखी संत ज्ञानी हरनाम सिंह खालसा की प्रशंसा करते हुए कहा कि टकसाल आज भी बाणी, बाणे और सिख सिद्धांतों के साथ संगतों को जोड़ने का महान कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि दमदमी टकसाल का देश-विदेश में व्यापक प्रभाव है और यह संस्था सिख धर्म के प्रचार-प्रसार तथा पंथक चेतना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।
धामी ने कहा कि संत बाबा हरनाम सिंह खालसा ने सदैव शिरोमणि कमेटी का सहयोग किया है तथा पंथक मुद्दों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कौम की एकता की आवश्यकता पर बल देते हुए बंदी सिंहों की रिहाई के लिए प्रभावी प्रयासों की वकालत की।
दमदमी टकसाल के गौरवशाली इतिहास का उल्लेख करते हुए धामी ने संत जरनैल सिंह खालसा भिंडरांवाले को “पारस पुरुष” बताया। उन्होंने कहा कि संत भिंडरांवाले ने अपने व्यक्तित्व और विचारधारा से हजारों युवाओं के जीवन को बदलकर उन्हें गुरसिखी से जोड़ा।
उन्होंने कहा कि जून 1984 में श्री दरबार साहिब और अकाल तख्त साहिब पर चढ़कर आई सेना का संत भिंडरांवाले और उनके साथियों ने अद्वितीय साहस और दृढ़ता के साथ मुकाबला किया तथा शहादत प्राप्त करके बाबा दीप सिंह जी की महान विरासत और आध्यात्मिक परंपरा को जीवित रखा।
दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष सरदार हरमीत सिंह कालका ने अपने संबोधन में बंदी सिखों की रिहाई की जोरदार मांग की। उन्होंने पंजाब में हो रहे अवैध धर्मांतरण पर गंभीर चिंता व्यक्त की। उन्होंने भरोसा दिलाया कि दिल्ली कमेटी सिख सरोकारों की रक्षा और प्रचार के लिए शिरोमणि कमेटी को हरसंभव सहयोग देगी। साथ ही धर्म प्रचार को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए एक संयुक्त समिति के गठन का सुझाव भी दिया।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस की ओर से पहुंचे महाराष्ट्र सरकार के जल संसाधन मंत्री श्री गिरीश महाजन ने 6 जून को सिख इतिहास का एक काला दिन बताते हुए कहा कि इसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने श्री हरिमंदिर साहिब और अकाल तख्त साहिब पर हुए सैन्य हमले के दौरान हजारों निर्दोष लोगों की शहादत के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कड़े शब्दों में निंदा की।
उन्होंने कहा कि इसी ऐतिहासिक भूल और पाप का परिणाम है कि कांग्रेस का देशभर में लगातार पतन हो रहा है। उन्होंने महाराष्ट्र में सिख समाज के कल्याण, धार्मिक अधिकारों की रक्षा और सामाजिक विकास के लिए राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की भी जानकारी दी।
अपने संबोधन में प्रसिद्ध सिख प्रचारक बाबा बंता सिंह मुंडा पिंड वालों ने कहा कि साका नीला तारा सिखों के अस्तित्व को समाप्त करने की कार्रवाई थी, लेकिन देश का बहुसंख्यक समाज यह भूल रहा है कि भारत की आजादी के लिए सिखों ने लगभग 80 प्रतिशत बलिदान दिए हैं। यदि सिख इतने बड़े स्तर पर कुर्बानियां न देते, तो आज हिंदुस्तान का नक्शा कुछ और होता।
इस अवसर पर संत बाबा निहाल सिंह हरियां वेलां वाले, बाबा बुद्ध सिंह निक्के घुम्मणा वाले, संत बाबा लखबीर सिंह रत्तवाड़ा साहिब वाले, बाबा गुरप्रीत सिंह रंधावा, भाई हरजिंदर सिंह राड़ा साहिब, बाबा निहंग मेजर सिंह सोढ़ी, रजिंदर सिंह महिता सहित अनेक वक्ताओं ने घल्लूघारे के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की और दमदमी टकसाल द्वारा कौम के लिए निभाई जा रही सेवाओं की सराहना की।
सभी वक्ताओं ने दमदमी टकसाल के मुखी संत ज्ञानी हरनाम सिंह खालसा की प्रशंसा करते हुए कहा कि टकसाल जहां शहादतों की परंपरा में अग्रणी रही है, वहीं पंथक स्तर पर भी उसने नेतृत्व करते हुए महान सेवाएं निभाई हैं।
उन्होंने संत ज्ञानी हरनाम सिंह खालसा द्वारा स्थापित शहीदी गैलरी, तीसरे घल्लूघारे के शहीदों की तस्वीरों के संरक्षण, श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के अर्थों के 16 भागों में प्रकाशन तथा अमर शहीद बाबा दीप सिंह जी के शहीदी स्थल के सौंदर्यीकरण जैसे कार्यों का विशेष उल्लेख किया।
वक्ताओं ने कहा कि दमदमी टकसाल एक विशिष्ट और विलक्षण संस्था है तथा गुरु की असीम कृपा से यह महत्वपूर्ण सेवाएं इसके हिस्से आई हैं। उन्होंने शहीद परिवारों और कौम के लिए कुर्बानी देने वाले सिंहों की सार-संभाल के लिए भी टकसाल मुखी की सराहना की और कहा कि दमदमी टकसाल आज भी गुरु साहिबान की इच्छा की पूर्ति के लिए निरंतर कार्यरत है।
मंच संचालन की सेवा भाई रणधीर सिंह और ज्ञानी साहिब सिंह ने निभाई। इस अवसर पर बंदी सिंहों, शहीद परिवारों तथा पंथक सेवाओं में योगदान देने वाली प्रमुख हस्तियों का विशेष सम्मान भी किया गया।
समारोह में संत बाबा प्रीतम सिंह जी आगरा वालों की ओर से बाबा रजिंदर सिंह जी, संत बाबा दर्शन सिंह जी टाहला साहिब वाले, संत बाबा अमर सिंह जी राड़ा साहिब वाले, संत बाबा गुरबचन सिंह जी घुड़ाणी वाले, सरदार सतविंदर सिंह टौहड़ा (सदस्य शिरोमणि कमेटी), एडवोकेट भगवंत सिंह सियालका, जत्थेदार कश्मीर सिंह बरियार, भाई अमरजीत सिंह चावला, सिख स्टूडेंट्स फेडरेशन के अध्यक्ष भाई अमरबीर सिंह ढोट, लखबीर सिंह सेखों, भाई शमशेर सिंह जेठूवाल तथा अनेक धार्मिक, सामाजिक और पंथक हस्तियां उपस्थित रहीं।
इसके अतिरिक्त विभिन्न गुरुद्वारों, टकसालों, निहंग दलों और देश-विदेश से आए संतों, विद्वानों, प्रचारकों, रागियों, बंदी सिंहों के परिवारों तथा अन्य प्रमुख व्यक्तियों ने भी समागम में भाग लिया और तीसरे घल्लूघारे के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की।
