होली भारत का प्रसिद्ध, प्राचीन एवं प्रतीकमयी त्योहार है, जो देश भर में भारी उत्साह, उमंग और उल्लास से मनाया जाता है। इस त्योहार की आरंभता हिरण्यकश्यप के समय से मानी जाती है।
होलिका की कुटिलता की पराजय और प्रहलाद की विजय की खुशी में लोग झूम उठे और होलिका का उपहास करना शुरू कर दिया। इस तरह होलिका की सारे संसार में भारी निंदा हुई। तत्पश्चात् प्रत्येक वर्ष इस दिन लोग इकट्ठा होते और धूल-मिट्टी उड़ाते थे। समय बीतने के साथ रंग और फिर कीचड़ आदि फेंकने की प्रथा भी चल पड़ी। दशहरे की भांति होली का त्योहार भी सच्चाई और नेकी की निर्माणकारी शक्तियों की कूड़ व बदी की विनाशकारी ताकतों पर हुई दिविजय का प्रतीक है।
‘होली’ का दूसरा नाम ‘फाग’ है अर्थात् फाल्गुन माह या बसंत ऋतु। बसंत ऋतु उमंगों व खुशियों भरा त्योहार है, जिसके आध्यात्मिक एवं अंतरीय भाव को श्री गुरु अरजन देव जी इस प्रकार कथन करते हैं:
गुरु सेवउ करि नमसकार ॥
आजु हमारै मंगलचार ॥
आजु हमारै महा अनंद ॥
चिंत लथी भेटे गोबिंद ॥१ ॥
आजु हमारै ग्रिहि बसंत ॥
गुन गाए प्रभ तुम्ह बेअंत ॥१ ॥ रहाउ ॥
आजु हमारै बने फाग ॥
प्रभ संगी मिलि खेलन लाग ॥
होली कीनी संत सेव ॥
रंगु लागा अति लाल देव ॥
(११८०)
अर्थात् गुरसिक्खों की आध्यात्मिक मंडलों की आनंदमयी होली का अजब नज़ारा बांधा गया है और मनुष्य को नाम रूपी रंग में रंगे जाने के लिए प्रेरित किया गया है।
चेत वदी एकम को मनाया जाने वाला होला-महल्ला त्योहार खालसा पंथ के सृजक श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी की निजी तथा मौलिक खोज है और यह खालसा पंथ को आपकी अद्वितीय देन है। गुरु जी ने अनुभव कर लिया था कि होली का त्योहार खुशियों एवं उमंगों का त्योहार है, मगर इसे मनाने के ढंग-तरीके बहुत बिगड़ चुके हैं। एक-दूसरे पर गंदगी उछाली जाने लगी थी। कभी-कभी इस कारण गाली-गलौच तक की नौबत भी आ जाती थी। यही कारण था कि ऐतिहासिक महत्व होने के बावजूद भी भारतीय त्योहार भारतीय जीवन के निर्माण में कोई ठोस एवं शक्तिशाली योगदान नहीं दे रहे थे।
श्री गुरु गोबिंद सिंघ जी जैसी महान अनुभवी शख्सियत, जिसने अपनी जिंदगी के कुछ वर्षों में समूचे भारत की कायाकल्प करनी थी, उपरोक्त सामाजिक गिरावट से कैसे अनभिज्ञ रह सकती थी ? आपने समय की नब्ज को पहचानते हुए त्योहारों को मनाने के ढंग-तरीके ही बदल दिये। पहले १७५६ विक्रमी की वैसाखी वाले दिन आपने खालसा पंथ की साजना की, जिसका परिणाम यह हुआ कि वैसाखी का अति खुशियों भरा दिन खालसे के प्रकट दिन के रूप में मनाया जाने लगा और इससे अगले ही वर्ष से होली
के त्योहार को होला-महल्ला के रूप में मनाने की परंपरा जारी की। पहला होला-महल्ला वर्ष १७५७ बिक्रमी, चेत्र वदी एकम वाले दिन श्री अनंदपुर साहिब में होलगढ़ स्थान पर मनाया गया और वचन किया : औरन की होली मम होला।
कहयो क्रिपानिधि बचन अमोला।
(गुरुपद प्रेम प्रकाश कृत बाबा सुमेर सिंघ) जैसे रोजाना इस्तेमाल होने वाली कच्ची शब्दावली की जगह खालसे को आक्रामक एवं प्रभावशाली शब्द दिये गये हैं, बिलकुल वैसे ही खालसे को ‘होली’ की जगह ‘होला-महल्ला’ मनाने का आदेश है। कवि निहाल सिंघ ने इस बारे में बहुत सुंदर छंद लिखा है:
बरछा, ढाल, कटारा, तेगा, कड़छा, देगा, गोला है। छका प्रसादि, सजा दसतारा, अरु कर दौना टोला है। सुभट, सुचाला, अर लक्ख बाहा, कलगा, सिंघ सचोला है। अपर मुछहिरा, दाढ़ा जैसे, तैसे होला बोला है।
गुरु साहिब के आदेशानुसार इस अवसर पर दूर दूर से सिंघ शूरवीर तथा सिक्ख संगत होला-महल्ला मनाने हेतु श्री अनंदपुर साहिब एकत्र होने लगी। भारी दीवान सजते और कथा-कीर्तन के समागम होते। मेले का विशेष कार्यक्रम अस्त्रों-शस्त्रों के तरह-तरह के करतब दिखाना होता। सिंघ अश्व-दौड़, गतकाबाजी, नेज़ाबाजी, तीरंदाजी आदि कार्यक्रमों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते। खालसा फौज को दो दलों में बांटा जाता और इनकी एक प्रकार की मसनूई (बनावटी) लड़ाई करवाई जाती। विजेता दल को इनाम-सम्मान दिया जाता। खालसा फौज का नगर कीर्तन निकलता तो गुलाल, गुलाब, कसतूरी आदि की बरसात की जाती। नगर के गली-बाज़ार और सिंघों के वस्त्र आदि लाल रंग में इतने रंग जाते कि चारों तरफ रंगीनियां ही नजर आती और सुगंध फैल जाती। हजूरी कवि भाई नंद लाल जी एक ऐसे ही होला महल्ला का जिक्र अपनी फारसी पुस्तक ‘दीवानि गोया’ की गजल नंबर ३२ में इस प्रकार करते हैं:
गुले होली ब बागे दहिर बू करद। लबे चूं गुंचह रा फरखंदह खू करद। गुलाबो, अंबरो, मुशको, अबीरो, चु बारां बारशे अज सू बसू करद। जहे पिचकारीए पुर जाफरानी, कि हर बेरंग रा, खुस रंगो बू करद। गुलाल अफशानी अज दसते मुबारक, ज़मीनो आसमां रा सुरखरू करद। दु आलम गशत रंगीं अज़ तुफैलश, चु शाहम जामह रंगी दर गुलू करद।
इन शेरों में स्पष्ट जिक्र है कि गुलाब, अंबर, कसतूरी व अंबीर सब तरफ बारिश की तरह बरसने लगे। केसर से भरी पिचकारी ने सबके सफेद वस्त्रों को सुंदर रंग में रंग दिया और सतिगुरु जी ने अपने हाथों से गुलाल उड़ा-उड़ा कर धरती एवं आकाश को गहरा लाल कर दिया।
होला-महल्ला त्योहार विशेषतः श्री अनंदपुर साहिब और श्री हजूर साहिब नांदेड़ में मनाया जाता है। दोनों गुरुधामों पर लाखों की संख्या में सिक्ख संगत एकत्र होती है और हजूरी दीवानों (कीर्तन-दरबार) की हाजिरी भरने के अलावा निहंग सिंघों के प्रदर्शन का भी लुत्फ उठाती है। श्री हजूर साहिब नांदेड़ में विशेष घोड़े, जो कि महल्ले के नगर कीर्तन का नेतृत्व करते हैं, संगत का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करते हैं। इस प्रकार झूलते निशान साहिब और शबद-कीर्तन करती भजन मंडलियां वायुमंडल को आकर्षक व सुहावना बना देती हैं। गतका पार्टियां अपने अद्वितीय प्रदर्शन द्वारा मन मोह लेती हैं। ये सचखंडी नज़ारे देख कर प्रत्येक के मुंह में से स्वतः धन्य गुरु ! धन्य गुरु ! की आवाज निकलती है।
